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Storybook paragraphs containing word (344)
""मैं तो घूमने जा रहा हूँ. यहाँ"
कहानी- बादल की सैर
"मैं नाचती वो भी मेरे साथ नाचती| मैं खेलती वो भी खेलती| मैं हँसती तो वो भी मेरे साथ हँसती| पर मुझ से बात नहीं करती| कभी मेरे पास नहीँ आती|"
मैं और मेरी दोस्त टीना|
"जब मैं रोती तो वो भी मेरे साथ रोने लग जाती| मैं क्या करूँ?"
मैं और मेरी दोस्त टीना|
"अरे, यह तो बिल्ली है। मैं नहीं डरती।"
मैं नहीं डरती !
"यह तो कुआँ है। मैं नहीं डरती।"
मैं नहीं डरती !
"अरे वह तो मेरी बहन कुएं से पानी निकाल रही है! मैं नहीं डरती।"
मैं नहीं डरती !
"अरे यह तो मेरी माँ हैं। वह खेत से काम कर के घर आई हैं।"
मैं नहीं डरती !
"गप्पू तो नाच सकती है! "
गप्पू नाच नहीं सकती
"वह घर लौटते समय बहुत ख़ुश था कि उसने आज बहुत से नए दोस्त बनाए थे। वह अपनी अम्मा से कसकर लिपट गया। उसने फुसफुसाते हुए कहा, “रात अकेली नहीं होती अम्मा! रात में तो बहुत से अद्भुत जीव मिलते हैं।”"
सो जाओ टिंकु!
"अलग-अलग परिवारों को लाजपत नगर के बाज़ार ले जाना, अर्जुन को बहुत पसंद था। सैलानी जब चार पहियों की जगह तीन पहियों की सवारी चुनते तो उसका मन खुशी से झूम उठता। शिरीष जी के साथ कुतुब मीनार के पास पेड़ की छाँव में आराम करना उसे बहुत अच्छा लगता।"
उड़ने वाला ऑटो
"लेकिन अर्जुन जानता था कि यह तो बस एक सपना है। ऑटो में हेलिकॉप्टर के पंख होना तो ठीक ऐसा था जैसे हाथी के पंख निकल आना, या फिर रॉकेट की तरह अंतरिक्ष में ढेर सारे डिब्बों वाली ट्रेन का होना।"
उड़ने वाला ऑटो
"शिरीष जी खुश होकर मुस्कराने लगे। मुस्कराते ही पान से रंगे उनके दाँत दिखने लगे। उन्होंने जल्दी से पानी पिया, फिर भीड़ छटने लगी। “लो जादू तो अभी हो गया,” शिरीष जी ने मज़ाक में कहा।"
उड़ने वाला ऑटो
"उसे सड़कों का बहुत बड़ा जाल दिखाई दिया मानो किसी शरारती मकड़े ने बनाया हो।
फटी आँखों से शिरीष जी खुशी में चीख रहे थे। न तो वह हैंडल बार को पकड़े हुए थे और न ही गाड़ियों से बचने की कोशिश कर रहे थे।"
उड़ने वाला ऑटो
"शिरीष जी ने शीशे में खुद को देखा तो उन्हें एक हीरो जैसा चेहरा दिखाई दिया। उनके दाँत बिलकुल स़फेद और शरीर चमक रहा था। जोश में चिल्लाकर उन्होंने कहा, “हमें और पानी पीना चाहिए!”"
उड़ने वाला ऑटो
"“लेकिन हम क्या कर रहे हैं?” अर्जुन ने सोचा। “हम कहाँ जा रहे हैं? अगर मुझे चलाया नहीं गया तो मेरा क्या होगा?” अर्जुन ने अब से पहले कभी इतना आज़ाद महसूस नहीं किया था, और न ही इतना परेशान।"
उड़ने वाला ऑटो
"“मैं तो अपनी बेटी और उसके बच्चों से मिलने जा रही थी,” उसने सोचा।"
उड़ने वाला ऑटो
"वे तो मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। यही तो है मेरे जीवन का असली जादू!”"
उड़ने वाला ऑटो
"शिरीष जी फिर से काम में जुट गए थे। उस शहर के जाने पहचाने जादू
के नशे में हर सिग्नल, हर साईन बोर्ड, हर मोड़ उनसे कुछ कह रहा था।
बहुत जल्द उनका पुराना जाना पहचाना चेहरा फिर शीशे में दिखने लगा था। वह जानते थे कि उन्हें कहाँ जाना है। वह तो वहाँ पहुँच ही गये थे।
उस औरत की साड़ी फिर से फीकी पड़ गई थी लेकिन उसका चेहरा चमक रहा था।
वे ज़मीन पर पहुँच गए थे। अर्जुन के पहियों ने गर्म सड़क को छुआ। इंजन ने राहत की साँस ली..."
उड़ने वाला ऑटो
"मकान बनाने के लिए सब से पहले तो जगह चाहिए होती है।"
सबसे अच्छा घर
"खेमा: मंगोलिया के लोग लकड़ी के ढाँचे और मोटे ऊनी नमदे के कालीनों से ख़ूब गर्म और हल्के घर बनाते हैं। जब कहीं और जाना हो तो लोग लकड़ी की पट्टियों और नमदों को घोड़ों और याकों पर लाद कर मकान को भी साथ ले जाते हैं।"
सबसे अच्छा घर
"इग्लू: क्या आप सोच सकते हैं कि बर्फ़ की बड़ी-बड़ी ईंटों से बने इग्लू बाहर बर्फ़ जमी होने पर भी अंदर से गर्म रहते हैं? जब बाहर का तापमान -40 डिग्री सेंटिग्रेड होता है तो लोग इग्लू के अंदर आराम से रहते हैं। इन्हें आप कनाडा के ध्रुवीय इलाकों और ग्रीनलैंड के थूले द्वीप में देख सकते हैं।"
सबसे अच्छा घर
"हमारी थालियों और हमारे दिमाग में हलवा-पूरी, खीर-पूरी और श्रीखंड-पूरी की एक ख़ास जगह होती है। छुट्टियों में तो छोले-पूरी या आलू-पूरी सबसे ज़्यादा पसंद किये जाते हैं। पूरी तलने की ख़ुशबू सब को अपनी ओर खींचती है। कढ़ाई में तैरती पूरी को देखना भी बहुत दिलचस्प होता है। ज़रा उस सुनहरे रंग की करारी, गर्मागर्म फूली-फूली पूरी को तो देखिये। थाली में रखते ही सबसे गोल और सबसे फूली पूरी को लेने की हम कोशिश करते हैं।"
पूरी क्यों फूलती है?
"इसकी वजह यह है कि इस आटे में कुछ है जिसे बहुत प्यास लगी है! आप को जब प्यास लगती है तो आप क्या करते हैं? आप पानी पीते हैं।"
पूरी क्यों फूलती है?
"अम्मा ने आटे को गूँध लिया है। वह अब अपनी हथेली में थोड़ा सा तेल लगा कर उसे अच्छी तरह गूँधने के लिये कह रही है। आटे को अच्छी तरह गूँधने के लिये मजबूत हाथ चाहिए। उनका कहना है कि अगर आटे को अच्छी तरह गूँधा नहीं जाता है तो पूरी नहीं फूलती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"जब हम आटे को गूँधते हैं तो एक दूसरे से चिपके कण, फैलने लगते हैं और फिर इस तरह फैलने के बाद एक नया प्रोटीन बन जाता है, जिसे कहते हैं ग्लूटेन। ग्लूटेन, रबर की तरह लचीला होता है, इसलिए गूँधे हुये आटे को हम कोई भी आकार दे सकते हैं।"
पूरी क्यों फूलती है?
"दर असल पूरी के साथ यह होता है - गूँधे हुये आटे में ग्लूटेन होने की वजह से उसे बेला जा सकता है। जब इस आटे की एक छोटी सी लोई को बेला जाता है तो पूरी में ग्लूटेन की एक सतह बन जाती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"और जब पूरी को गर्म तेल में डालते हैं तो उसकी निचली सतह तेल की वजह से बहुत गर्म हो जाती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"आप ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि भेल-पूरी और दही-पूरी में इस्तेमाल होने वाली पूरियाँ फूली नहीं होती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"इसके अलावा अगर पूरियों को कम तापक्रम पर तला जाता है तो उनमें भाप बहुत धीरे-धीरे बनती है, प्रेशर ठीक से नहीं बनता और फिर पूरी फूल नहीं पाती।"
पूरी क्यों फूलती है?
"अब फिर इसे एक बड़े बर्तन में रख देते है अब बर्तन के अंदर रखे गूँधे आटे पर इतना पानी डालते है जिससे वो उसमे डूब जाए। पानी के अंदर डूबे आटे को गूँधते रहते है जब तक पानी का रंग सफ़ेद नहीं हो जाता। इस पानी को फैक कर बर्तन में थोड़ा और ताजा पानी लेते है इसे तब तक करते रहे जब तक गुँधे आटे को और गूंधने से पानी सफ़ेद नहीं होता। इसका मतलब यह है कि आटे का सारा स्टार्च खत्म हो गया है और उसमें बस ग्लूटेन ही बचा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्टार्च पानी में घुल जाता है लेकिन ग्लूटेन नहीं घुलता। अब इस बचे हुए आटे यानि ग्लूटेन से थोड़ा सा आटा लेते है इसे हम एक रबड़बैंड कि तरह खीच सकते है। अगर इसे खीच कर छोड़ते है तो यह वापस पहले जैसा हो जाता है। इससे इसके लचीलेपन का पता चलता है आप इसे चोड़ाई में फैला सकते है इससे पता चलता है कि इसमें कितनी प्लाटीसिटी है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"विश्व के सबसे पहले एनसाइक्लोपीडिया, “अभिलाषितार्थ चिंतामणि” या मनासोललास जिसे राजा सोमेश्वर ने 12 सदी में लिखा था, के अनुसार उस समय में पूरी जैसी कोई चीज बनाई जाती थी जिसे पहालिका कहा जाता था तो पूरी कम से कम 800 साल पुरानी है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"क्या ज्वार, बाजरे या चावल के आटे से पूरियाँ बन सकती है, अगर नहीं तो क्यों? गेहूँ के आटे से पूरियों के अलावा हम और क्या चीज़ें बना सकते हैं? अगर आटे में ज़्यादा पानी डाल दिया जाये तो क्या होगा? अगर हम आटे को खाना पकाने के दूसरे तरीकों, जैसे तंदूर या तवा पर पकाते हैं तो क्या होता है?"
पूरी क्यों फूलती है?
"फिर जब वही मधुमक्खियाँ किसी और फूल के पास जा कर भन-भन करते हुए ज़ोर-शोर से नाचती हैं, तो इस धमा-चौकड़ी में दाने दूसरे फूलों पर गिर जाते हैं। फिर मधुमक्खियाँ और फूलों तक उड़ती हुई जाती हैं, कुछ दाने उठाती हैं व कुछ गिराती चलती हैं। यह कार्यक्रम इसी तरह चलता रहता है।"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"अपने परिवार से दूर उगने वाले कई नए पौधों के लिए तो मधुमक्खियाँ ही सब-कुछ होती हैं।"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"वैसे क्या तुम अपनी साँसे सुन सकते हो? नहीं ना! पर मधुमक्खियाँ सुन सकती हैं। भन-भन की आवाज़ मधुमक्खियों के साँस लेने से भी होती है। उनका शरीर छोटा व कई टुकड़ों में बँटा होता है। तो जब साँस लेने से हवा अंदर जाती है, तो उसे कई टेढ़े-मेढ़े व ऊँचे-नीचे रास्तों को पार कर के जाना पड़ता है। और इसी वजह से भन-भन की आवाज़ होती है।"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"3. इन्सानो की तरह मधुमक्खियाँ भी चेहरे पहचानती है! चेहरे के हर हिस्से को वो पहले ध्यान से देखती है फिर उसे जोड़ कर चेहरा याद कर लेती है! तो याद रखे कि किसी भी मधुमक्खी को कभी छेड़े नहीं!"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"5. बंबल बिज़, मधुमक्खी और दूसरी तरह कि बीज़ से ज्यादा बड़ी होती है! उन्हे छत्ते में रहना और मिलना जुलना अच्छा लगता है! कई बंबल बीज में डंक नहीं होता है! वो ज्यादा शहद तो नहीं बनाती लेकिन वो बेहतरीन पोल्लीनेटर होती है!"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"1. मधुमक्खी नाच कर, छत्ते में रहने वाली बाकी मधुमक्खीयों को यह बताती है कि शहद कहाँ मिलेगा तो आप भी कोशिश कीजिये नाच कर कुछ बताने की और देखिये कि क्या आपके दोस्त आपकी बातों को समझ पाते है या नहीं!"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"जब विमान की इंजिन ईंधन को जलाती है तो वे बहुत ही तेज़ गति से गर्म गैसें छोड़ती हैं, जिससे इंजिन के पीछे हवा का दबाव बनता है और उससे विमान आगे बढ़ता है।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"2. 'फ़्लाइ - डोंट फ़्लाइ' गेम: मित्रों का एक समूह बनाओ और एक -दूसरे को बिना छुए कमरे के चारों तरफ़ जहाज़ की तरह उड़ो। डेन (चोर) एक कोने में खड़ा होकर उड़ने वाली और ना उड़ने वाली चीज़ों के नाम कहेगा। जैसे ही वह किसी ना उड़ने वाली चीज़ (जैसे कि मेज़/टेबुल) कहे तो जहाज़ों को ज़मीन पर उतरना (बैठ जाना) होगा। जो ग़लती करेगा, वह अगला डेन होगा।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"वह आज बहुत खुश थे! आज तो मुत्तज्जी जी का जन्मदिन था और उन दोनों को रेलगाड़ी से उनसे मिलने जाना था।"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""नहीं," पुट्टा ने कहा। "बुज़ुर्गों के जन्मदिन पर केक नहीं काटा जाता। और फिर 200 मोमबत्तियां लगाने के लिये तो बहुत बड़े केक की जरूरत होगी।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"अम्मा मुस्कराई, "उनसे मिलने तो जा ही रहे हो। ख़ुद ही पूछ लेना।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""ओह! दावत! फिर तो वहाँ बहुत सारे केक रहे होंगे!" पुट्टी बोली। "वह कौन से राजा थे, मुत्तज्जी? अगर आप को यह पता हो तो हम जान सकते है कि वह यहाँ कब आए थे। फिर उसमे 5 जोड़ देने से पता चल जाएगा कि आप कब पैदा हुईं थीं।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""फिर कुछ साल बाद," मुत्तज्जी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, "मेरी शादी हो गयी। उस समय कानून था कि शादी के लिए लड़की की उम्र कम से कम 15 साल होनी चाहिए, और मेरे पिता कानून कभी नहीं तोड़ते थे। तो उस समय मेरी उम्र करीब 16 साल की रही होगी। और मेरी शादी के बाद जल्द ही तुम्हारे मुत्तज्जा को बम्बई में नौकरी मिल गयी और हम मैसूर छोड़कर वहाँ चले गए।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""जरूरी तो नहीं," पुट्टा ने कहा, "क्योंकि मुत्तज्जी ने यह तो नहीं कहा कि उनका पहला बच्चा, उनकी शादी के 2 साल बाद पैदा हुआ था। उन्होंने तो बस यह कहा कि जिस साल उनकी शादी हुई उसी साल मैसूर में एक बांध बनाया गया था।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"अज्जी ने ज़रा सोच कर जवाब दिया, "पक्का तो नहीं, लेकिन तुम दोनों दोपहर के खाने के बाद अपने अज्जा के साथ लाइब्रेरी जाकर वहाँ पता कर सकते हो।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""और मुत्तज्जी का कहना है कि वह तब करीब 9 साल की थीं। अगर वह ठीक कह रही हैं, तो मुत्तज्जी 1916* मे पैदा हुई थीं!""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"अज्जा सोचने लगे, "1911... यह तारीख़ इतनी जानी-पहचानी सी क्यो लग रही है? आह! हाँ, उसी साल तो बम्बई में गेटवे ऑफ़ इंडिया बनाया गया था। और वह तो भारत पर राज करने वाले ब्रिटिश राजा, जॉर्ज (पंचम) के स्वागत में बनवाया गया था। और तब एक नहीं, बल्कि कई बड़ी-बड़ी दावत हुई होंगी!" अज्जा ने ख़ुश होते हुए कहा।"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""तुम दोनों तो बहुत बड़े जासूस हो गए हो!" अम्मा मुस्कायीं। "और मुझे लगता है तुम दोनों और मुत्तज्जी की ख़ास दावत होनी चाहिए - यानि एक बड़ा सा केक, गुलाबी आइसिंग और जिसके ऊपर लगा हो एक गुलाब!""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"धनी और उसके माता-पिता, बड़ी ख़ास जगह में रहते थे। अहमदाबाद के पास, महात्मा गाँधी के साबरमति आश्रम में-जहाँ पूरे भारत से लोग रहने आते थे। गाँधी जी की तरह, वे सब भी भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे। जब वे आश्रम में ठहरते तो चरखों पर खादी का सूत कातते, भजन गाते और गाँधी जी के व्याख्यान सुनते।"
स्वतंत्रता की ओर
"”नमक?“ धनी चौंक कर उठ बैठा, ”नमक क्यों बनायेंगे? वह तो किसी भी दुकान से खरीदा जा सकता है।“
”हाँ, मुझे मालूम है।“ बिन्दा हँसा, ”पर महात्मा जी की एक योजना है। यह तो तुम्हें पता ही है कि वह किसी बात के विरोध में ही यात्रा करते हैं या जुलूस निकालते हैं, है न?“"
स्वतंत्रता की ओर
"”हाँ, बिल्कुल। मैं जानता हूँ वे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ सत्याग्रह के जुलूस निकालते हैं जिससे कि उनके खिलाफ़ लड़ सकें और भारत स्वतंत्र हो जाये। पर नमक को लेकर विरोध क्यों कर रहे हैं? यह तो बेवकूफ़ी की बात हुई!“"
स्वतंत्रता की ओर
"”लेकिन यह तो सरासर नाइंसाफ़ी है!“ धनी की आँखों में गुस्सा था।"
स्वतंत्रता की ओर
"”गाँधी जी तो थक जायेंगे। वे दाँडी बस या ट्रेन से क्यों नहीं जा सकते?“"
स्वतंत्रता की ओर
"”क्योंकि, यदि वे इस लम्बी यात्रा पर दाँडी तक पैदल जायेंगे तो यह खबर फैलेगी। अखबारों में फ़ोटो छपेंगी, रेडियो पर रिपोर्ट जायेगी!
और पूरी दुनिया के लोग यह जान जायेंगे कि हम अपनी स्वतंत्रता के लिये लड़ रहे हैं। और ब्रिटिश सरकार के लिये यह बड़ी शर्म की बात होगी।“"
स्वतंत्रता की ओर
"”हाँ, वो तो हैं ही!“ बिन्दा की आँखों के आस-पास हँसी की लकीरें खिंच गईं, ”उन्होंने वायसरॉय को चिट्ठी भी लिखी है कि वे ऐसा करने जा रहे हैं! ब्रिटिश सरकार को तो पता ही नहीं कि उसकी क्या गत बनने वाली है!“"
स्वतंत्रता की ओर
"”मैं आपसे कुछ पूछना चाहता था,“ धनी थोड़ा घबराया। ”क्या मैं आपके साथ दाँडी आ सकता हूँ?“ हिम्मत करके उसने कह डाला। गाँधी जी मुस्कराये, ”तुम अभी छोटे हो बेटा! दाँडी तो 385 किलोमीटर दूर है! स़िर्फ तुम्हारे पिता जैसे नौजवान ही मेरे साथ चल पायेंगे।“"
स्वतंत्रता की ओर
"”पर आप तो नौजवान नहीं हैं,“ धनी बोला, ”आप नहीं थक जायेंगे?“"
स्वतंत्रता की ओर
"”हाँ, ठीक बात है,“ कुछ सोचकर गाँधी जी बोले, ”मगर एक समस्या है। अगर तुम मेरे साथ जाओगे तो बिन्नी को कौन देखेगा? इतना चलने के बाद, मैं तो कमज़ोर हो जाऊँगा। इसलिये, जब मैं वापस आऊँगा तो मुझे खूब सारा दूध पीना पड़ेगा, जिससे कि मेरी ताकत लौट आये।“"
स्वतंत्रता की ओर
"”हूँ... यह बात तो ठीक है, गाँधी जी! बिन्नी तभी खाती है, जब मैं उसे खिलाता हूँ,“ धनी ने प्यार से बिन्नी का सर सहलाया, ”और स़िर्फ मैं जानता हूँ कि इसे क्या पसन्द है।“"
स्वतंत्रता की ओर
"”बिल्कुल सही। तो क्या तुम आश्रम में रह कर मेरे लिये बिन्नी की देखभाल करोगे?“ गाँधी जी प्यार से बोले।"
स्वतंत्रता की ओर
"यह डॉ. शेफील्ड का बेटा ल्यूसियस था, जिसने अब अपने दातुन को टूथपेस्ट के मर्तबान में डुबाने से इनकार कर दिया और फैसला किया कि वह आगे से दंतमंजन का उपयोग करेगा। लेकिन एक विचार उसके दिमाग में घूमता रहा - टूथपेस्ट के उपयोग का इससे बेहतर कोई तो तरीक़ा होगा!"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"जब टूका और पोई इन्हें हिलाते हैं, तो इन फलियों से"
आओ, बीज बटोरें!
"“मुझे केले के बीज दिखाई दे रहे हैं! ये तो सोते हुए गोजर, वो कई पैरों वाले कीड़े, की तरह दिख रहे हैं,“ टूका उत्साहित होकर बोला।"
आओ, बीज बटोरें!
"मिर्च हर आकार, रूप और रंग की होती हैं और पूरे विश्व में इनका उत्पादन होता है। इसके बीज छोटे, गोल और चपटे होते हैं और इनका इस्तेमाल दाल या भाजी में चटपटापन लाने के लिए किया जाता है। जब आप इन्हें छुएं तो सावधान रहें, ये आपकी उंगलियों में जलन पैदा कर सकतीं हैं।"
आओ, बीज बटोरें!
"कॉफी के बारे में तो आप सभी जानते होंगे, जिसे आपके मम्मी-पापा हर सुबह पीते हैं? ये कॉफी बैरीज़ से बनती है। बैरीज़ से मिलने वाले दानों को सुखाकर, भूनकर और पीसकर पाउडर बना दिया जाता है। दक्षिण भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में कॉफी के बागान हैं।"
आओ, बीज बटोरें!
"चावल सामान्य नाम: राइस या चावल। वैज्ञानिक मुझे कहते हैं: ऑरिज़ा सटाईवा। चावल, सबसे लोकप्रिय अनाजों में से एक है। जहां तक मुझे मालूम है, भारतीय घरों में अन्य अनाजों की तुलना में चावल सबसे ज़्यादा खाया जाता है। जब चावल पौधे पर लगा होता है तो उसके दानों पर जैकेट की तरह एक खुरदुरा, भूरे रंग का छिलका होता है जिसके कारण इसके दाने अंदर सुरक्षित और साबुत बने रहते हैं।"
आओ, बीज बटोरें!
"बनारस वाली शुभा मौसी ने मुझे कुछ सुंदर गीत सिखाए हैं। इन गीतों को कजरी कहते हैं। क्या आपको मालूम है कि सम्राट अकबर के दरबार में एक प्रसिद्ध गायक थे मियाँ तानसेन? कहा जाता है कि वो “मियाँ की मल्हार” नाम का एक राग गाते थे तो वर्षा आ जाती थी। मैं भी संगीत सीखूँगी-शास्त्रीय संगीत।"
गरजे बादल नाचे मोर
"हम सभी वर्षा की प्रतीक्षा करते हैं पर किसान तो वर्षा के देवताओं की पूजा करते हैं।
मानसून में मेरा आम का पौधा काफी लम्बा हो गया है। अब मुझे उसे सींचने की ज़रूरत नहीं पड़ती! पिछले महीने जब बड़ी तेज़ आँधी चली थी, मेरा पौधा मज़बूती से खड़ा रहा। क्या मेरा आम का पेड़ इस पेड़ के जितना बड़ा हो जायेगा?"
गरजे बादल नाचे मोर
"“जब उस पर चढ़कर मैंने नीचे देखा तो बादलों के टुकड़े तैर रहे थे।"
तारा की गगनचुंबी यात्रा
"और जब ऊपर देखा तो वहाँ हँसती हुई पत्तियाँ थीं।”"
तारा की गगनचुंबी यात्रा
"“मैंने सोचा, पत्तियाँ तो हँसती नहीं! "
तारा की गगनचुंबी यात्रा
"“हाँ बहुत अच्छा। ये तो बहुत सुंदर महल बन गया है!”"
मलार का बड़ा सा घर
"अचानक कॉकपिट से *टीटीटी* जैसी आवाज़ आई। यह क्या आवाज़ थी? कहीं जेट शत्रु देश की सीमा में तो नहीं? या इंजन में कोई तकनीकी गड़बड़ी?"
राजू की पहली हवाई-यात्रा
""अरे वाह! आज तो तुम बिना जगाए उठ गए बेटा। अब जल्दी से तैयार हो जाओ। इतने महीनों बाद आज आर्या से मिलेंगे।""
राजू की पहली हवाई-यात्रा
"इसे अंग्रेजी में कन्वेयर बेल्ट कहते हैं। वर्दी पहने हुई, एक बहुत कठोर दिखने वाली महिला, मशीन के पीछे रखी स्क्रीन में देख कर सामान की जाँच कर रही थी। राजू स्क्रीन को देखकर हैरान रह गया। स्क्रीन में तो अटैची के साथ-साथ उसमें रखा सामान भी दिख रहा था।"
राजू की पहली हवाई-यात्रा
""इस मशीन में तो एक्स-रे दृष्टि है! बिलकुल कप्तान राजू जैसी... आर-पार देखने वाली।" राजू आश्चर्यचकित था।"
राजू की पहली हवाई-यात्रा
"सूरज मेरे जैसा दहकता है। अगर धूप होती है तो आधा अम्ब्रेला भी मेरे जैसा दहकता है।"
ग़ोलू एक ग़ोल कि कहानी
"जब ऐसा होता है तो मुझे भी दुखी लगता है आपको इसे बदलने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी!"
ग़ोलू एक ग़ोल कि कहानी
"“नहीं, बेटे! केवल तभी, जब बारिश होगी। और अभी तो आसमान साफ़ है।”"
लाल बरसाती
"“नहीं मनु, आज नहीं। आज बरसाती मत पहनना नहीं तो तुम अजीब लगोगे,” माँ बोलीं।"
लाल बरसाती
"“आज नहीं बेटा! आज तो आसमान मे स़िर्फ एक नन्हा सफ़ेद बादल है,” माँ बोलीं।"
लाल बरसाती
"“ये तो बड़ी गहरी खाई है! मुझसे नहीं पार होने वाली!” स्टेल्ला बोली।"
कोयल का गला हुआ खराब
"पर परवेज़ तो पहले ही उस पार कूद चुका था। फिर वापस फांद कर स्टेल्ला के पास आ जाता है।"
कोयल का गला हुआ खराब
"अब तो सबको देखनी है गले में खिचखिच वाली चिड़िया।"
कोयल का गला हुआ खराब
"“मुझे तो एक कोयल उस डाल पर बैठी दिख रही है!” उमा ने इशारा किया।"
कोयल का गला हुआ खराब
"“और मुझे यह मोटा-सा चश्मा नहीं पसंद, मगर मैं तो पहनती हूँ न इन्हें, कि नहीं?” दादी ने पूछा।"
कोयल का गला हुआ खराब
"घूम-घूम ने छलाँग लगाई तो पहले उसकी नाक पानी से टकराई! और..."
घूम-घूम घड़ियाल का अनोखा सफ़र
""माफ़ करना, पर आराम करने के लिए सपाट चट्टान चाहिए तो मैं बता दूँ!" घोंघे ने कहा।"
घूम-घूम घड़ियाल का अनोखा सफ़र
""तब तो मैंने तुम्हारे परिवार को ज़रूर देखा है।"
घूम-घूम घड़ियाल का अनोखा सफ़र
""चोट लगे तो फिर रोते हुए मेरे पास मत आना," दीदी कहती।"
सत्यम, ज़रा संभल के!
"उस के हाथ-पैर तो हरदम हरकत करते रहते हैं!"
सत्यम, ज़रा संभल के!
"वह घर पहुँचा तो उसे कीचड़–मिट्टी से सना देख बाबा, दीदी और दादा खूब हँसे।"
सत्यम, ज़रा संभल के!
"“अरे तुमने एक पैर तोड़ लिया? अगर मेरे पास इतने पैर होते तो मैं भी एक तोड़ लेती! देखो! देखो मुझे!! मेरे दो पैर हैं। एक दूसरे के साथ चलते है। कोई परेशानी नहीं! आसान!”"
एक सौ सैंतीसवाँ पैर
"“अगर एक टूट भी गया तो उसकी इतनी परवाह क्यों करती हो। बंद करो ये सब नाटक!”"
एक सौ सैंतीसवाँ पैर
"नहीं, बिल्ली तो इससे नहीं चिपकती।"
जादुर्इ गुटका
"लो जी! यह तो और दूर सरक गया।"
जादुर्इ गुटका
"कुनुंक, टुक! हाँ, यह तो चिपक गया।"
जादुर्इ गुटका
"तीन झींगुर उसकी मदद करने के लिए आगे बढ़े। फिर नारियल वाले मोटू भँवरे ने अपने दोस्तों को गिनना शुरू किया, “एक, दो, तीन, चार! चार तो एक सम संख्या है!”"
एक, तीन, पाँच, मदद! मदद!
"“अरे वाह, यह तो पूरे सोलह हैं! सोलह एक सम संख्या है।”"
एक, तीन, पाँच, मदद! मदद!
"“ओहो, यह तो कुल मिलाकर पूरे पच्चीस हो गये! थके-हारे नारियल वाले भँवरे ने कहा कि पच्चीस होती है...”"
एक, तीन, पाँच, मदद! मदद!
"मैं तो भूखा ही मर जाऊँगा।"
मेंढक की तरकीब
"“वो तो मैं भी जानूँ ”, रॉकी मिमियाया।"
रोज़ और रॉकी चले कम्पोस्ट बनाने
"ज़रा मेरी पूँछ को पकड़ कर तो देखो।"
अरे...नहीं!
"ज़रा मेरे सामने चिल्ला कर तो देखो लल्लू!"
अरे...नहीं!
"जब मैं कोई गाना सुनता हूँ तो कुछ अजीब-सा होने लगता है।"
अरे...नहीं!
"ओए तुम, चाहो तो अपना सबसे भयानक चेहरा बनाकर मुझे दिखाओ।"
अरे...नहीं!
"इसके पत्ते तो बहुत छोटे हैं।"
द्रुवी की छतरी
"‘अरे नहीं! इससे तो बारिश का पानी पूरी तरह अंदर आ रहा है।’"
द्रुवी की छतरी
"ये पत्ते न तो बहुत बड़े हैं और न ही बहुत छोटे।"
द्रुवी की छतरी
"फिर बोली, ‘‘मुझे मालूम है कि नयी जगह पर यह खेल खेलने में तो और भी मज़ा आयेगा!’’"
एक सफ़र, एक खेल
"मुनिया जानती थी कि एक पंख वाले उस विशालकाय गजपक्षी ने घोड़े को नहीं निगला है। हाँ, वह इतना बड़ा तो था कि एक घोड़े को निगल जाता, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि उसने उसे निगल ही लिया था! नटखट झील के पास वाले उस जंगल से ग़ायब हुआ था जहाँ वह गजपक्षी रहता था। अधनिया गाँव में दो घोड़ों - नटखट और सरपट द्वारा खींचे जाने वाली केवल एक ही घोड़ागाड़ी थी। जंगल के अंदर बसे इस छोटे से गाँव में पीढ़ियों से लोगों को इस विशालकाय एक-पंख गजपक्षी के बारे में मालूम था। चूँकि वह किसी के भी मामले में अपनी टाँग नहीं अड़ाता था, इसलिए गाँव का कोई भी बंदा उसे छेड़ता न था।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"दिन के समय वह गजपक्षी झील के पास आया करता या तो धूप तापने या फिर झील में पानी छपछपाते हुए अकेला खुद से ही खेलने। कभी-कभी वह पानी में आधा-डूब बैठा रहता और बाकी समय उसका कोई सुराग़ ही न मिलता। तब शायद वह घने जंगल के किसी बीहड़ कोने में बैठा आराम कर रहा होता। विशालकाय एक-पंख गजपक्षी एक पेड़ जितना ऊँचा था। उसकी एक लम्बी और मज़बूत गर्दन थी, पंजों वाली हाथी समान लम्बी टाँगें थीं और भाले जैसा एक भारी-भरकम भाल था। उसके लम्बे-लम्बे पंजे और नाखून डरावने लगते थे।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"पर मुनिया जल्द ही यह जान गयी कि वह शर्मीला और घासफूस खाने वाला एक शान्त पक्षी है। वह बस झील के किनारे लगे पौधे और पत्तियाँ चबाता रहता। मुनिया को महसूस हुआ कि उसमें और उस गजपक्षी में कुछ समानता है। सही तो है, विशालकाय एक-पंख गजपक्षी उड़ नहीं सकता था और मुनिया दौड़ नहीं सकती थी! गाँव के बाकी सारे बच्चे उसके लँगड़ाने का मज़ाक उड़ाते और अपने खेलों में उसे शामिल न करते। इसलिए उसे अकेले रहना ही अच्छा लगता।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"एक दिन, मुनिया ने बाहर खुले में आने की हिम्मत बटोरी। अपना सिर घुमाये बिना उस विशालकाय ने पहले तो अपनी आँखें घुमाकर मुनिया को देखा और फिर उन्हे बंद कर उसने मुनिया के आगे बढ़ने की कोई परवाह नहीं की। उसके सिर पर भनभनातीं मक्खियों से ज़्यादा ध्यान न खींच पाने के चलते मुनिया धम्म से अपने पैर पटक उसकी ओर बढ़ी। अचानक उस विशालकाय ने अपना एक पंजा उठाया। मुनिया चीखी और झील के उथले पानी में सिर के बल गिर पड़ी। पानी में भीगी-भीगी जब वह झील से बाहर आयी तो क्या देखती है कि गजपक्षी का समूचा बदन हिलडुल रहा है। वह समझ गयी कि वह हँस रहा था!"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"इस प्रकार मुनिया की दोस्ती गजपक्षी से हो गई। अन्ततः जब उसे एक दोस्त मिला भी तो नटखट घोड़ा ग़ायब हो गया!"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"अधनिया एक छोटा, अलग-थलग गाँव था जिसमें हर कोई हर किसी को जानता था। गाँव में तो कोई चोर हो नहीं सकता था। दूधवाले ने कसम खाकर कहा था कि उसने नटखट को झील की ओर चौकड़ी भरकर जाते हुए देखा है। लेकिन वह इस बात का खुलासा न कर पाया कि आखिर नटखट बाड़े से कैसे छूट कर निकल भागा था। दिन में बारिश होने के चलते नटखट के खुरों के सारे निशान भी मिट चले थे और उन्हें देख पाना मुमकिन न था।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“उस विशालकाय एक-पंख गजपक्षी के अलावा और कौन हो सकता है भला? उसे तो ख़त्म कर देना चाहिए!” दूधवाले ने कहा, “बरसों से यूँ चुपचाप पड़े-पड़े वह दुष्ट अपनी योजनाएँ बनाता रहा है!”"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"सब लोगों ने सहमति में हुंकारा। मुनिया यह सारी कार्यवाही चुपचाप देखे जा रही थी। वह बोलना चाहती थी, लेकिन जिसकी अनुमति नहीं थी उसकी सज़ा क्या होगी? और अगर वह बोलती भी तो कौन उसकी बात पर यकीन करता?"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“यही कि वह राक्षस मेरा दोस्त है, यह काम उसका नहीं है!” “इस लड़की का तो दिमाग़ फिर गया है!” पीछे से कोई आदमी चिल्लाया। बाकी सारे बच्चों ने मुँह बिचका दिये। “वह तो सिर्फ पत्तियाँ खाता है! तो फिर वह घोड़ा कैसे खा सकता है?” अपनी जगह से हिले-डुले बिना ही मुनिया चिल्लाकर बोली।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“अपनी चुटिया तो बना नहीं सकती और चली हो हमें सलाह देने?” मुनिया के बाबूजी आँखें तरेरते हुए उसकी तरफ़ बढ़े। “जाओ, जाकर अपने दोस्तों के साथ खेलो!”"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“एक वही राक्षस तो बस मेरा दोस्त है।” उसके पिताजी ने उसकी तरफ़ गुस्से से देखा। लेकिन वह रोयी नहीं और वहीं पर गाँव वालों के सामने खड़ी रही। “अरे लड़की को छोड़ो, हम लोग उस राक्षस को सवेरे-सवेरे धर लेंगे,” एक हट्टा-कट्टा आदमी बोला। “तो फिर कल सुबह की बात पक्की,” मुखिया ने कहा और सभा विसर्जित हो गयी।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"मुनिया एक पल को तो ठिठकी पर अगले ही पल उसे जंगल में आराम से सोते उस महाकाय का ख़याल आया। वह अगर नहीं गयी तो वह शायद अगली रात भी न देख पाये। एक गहरी साँस लेकर उस आधी रात को ही जंगल से होकर चन्देसरा जाने वाले रास्ते पर लँगड़ाते-लँगड़ाते चल पड़ी।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“ठहरो!” सारे शोर-शराबे को चीर कर मुनिया की पतली सी आवाज़ आयी। भीड़ और उस महाकाय के बीच से लँगड़ाती हुई वह आगे बढ़ी। “मुनिया! तुरन्त वापस आ जाओ!” मुनिया के बाबूजी का आदेश था। “उसे पकड़ो तो!” मुनिया के बाबूजी और एक ग्रामीण उसकी ओर दौड़ पड़े। महाकाय को दो कदम आगे बढ़ता देख वे लोग रुक गये। “कोई बात नहीं... अगर तुम लोग यही चाहते हो तो हम लोग तुम दोनों से इकट्ठे ही निपटेंगे!” अपने हाथ में भाला उठाये वह हट्टा-कट्टा आदमी चीखा।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“जैसा कि आप जानते हैं, कुछ साल पहले मैंने नटखट को बेच दिया था। कल मैं नटखट के भाइयों - बाँका और बलवान के द्वारा खींची जाने वाली बग्घी में सवार आपके गाँव से गुज़र रहा था। मुझे नहीं मालूम कि किस तरह से नटखट अपने आपको छुड़ा हमारे पीछे-पीछे भागकर चन्देसरा चला आया। मैं उसे पहचान न सका और यह समझ न पाया कि इसका करूँ तो करूँ क्या। फिर आज सुबह मैंने इस नन्ही-सी बच्ची को एक झोंपड़ी से दूसरी झोंपड़ी जाते और एक गुमशुदा घोड़े के बारे में पूछते हुए देखा। लेकिन या इलाही ये माजरा क्या है?” तीसरी बार उसने अपना वही सवाल किया।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"जब ठंड पड़ती है तो हम रज़ाइयाँ निकाल लेते हैं।"
मेरा घर
"जब गर्मी पड़ती है तो हम एक पंखा चला लेते हैं।"
मेरा घर
"जब हमारे यहाँ ख़ास मेहमान आते हैं तो हम कुर्सियाँ निकालते हैं।"
मेरा घर
""चीनू, तुम्हारी आवाज़ से तो सभी हर सुबह जाग जाते हैं।
क्या तुम मुझे भी जगा दोगे?""
भीमा गधा
"अब तो भीमा निराश हो गया।"
भीमा गधा
"“मगर अब डिब्बे कहाँ बनाऊँ?” सलेट पर तो जगह ही नहीं थी।"
छुक-छुक-छक
"भालू बोला, “वाह, यह तो अनोखा है।"
सैर सपाटा
"मैदान में पत्थर पड़ा था। ठोकर लगी तो गिर पड़ा।"
वह हँस दिया
"“ओहो! तुमने तो फाटक को दो रंगों में रंग डाला!” पुताई वाला भैया भन्नाया। “चलो अब इसे ऐसे ही रहने देते हैं!” माँ ने कहा।"
नन्हे मददगार
"कोई समझाता तो लड़ने लगते।"
पहलवान जी और केला
"पहलवान फिर फिसला और गिरा धड़ाम से। ‘‘अच्छी कलाबाज़ी खाते हो। तुम्हें तो सर्कस में काम करना चाहिये।’’ गप्पू हँस पड़ा।"
पहलवान जी और केला
"गप्पू हँसा तो सब हँस पड़े।"
पहलवान जी और केला
"जब माँ के कमरे से चुप्पी हो, तो सोना जान जाती माँ ठप्पे पर अच्छे से रंग लगा रही होंगी। तब वह भी रंग लगाती। जब आवाज़ आती ठप्प तो सोना भी अपना ठप्पा कपड़े पर दबा देती।"
सोना बड़ी सयानी
"यह तो पतीले में लगने ही लगी थी।""
सोना की नाक बड़ी तेज
"अब तो सृंगेरी श्रीनिवास को बहुत लम्बे समय तक बाल नहीं काटने पड़ेंगे।"
सालाना बाल-कटाई दिवस
"सो ही तो कहलाता वीर।"
सबरंग
"दादी ने जो नज़र घुमाई तो न दिया महाराज दिखाई।"
सबरंग
""बाँस में फ़ूको तो सुर बन जाता,"
संगीत की दुनिया
"फुसफुसाया, “ल...ल... लेकिन मुझे तो पानी से डर लगता है। मुझे तो तैरना भी नहीं आता।”"
नौका की सैर
"“रहने भी दे डरपोक! विक्की के रहते, तुझे किस बात का डर? मैं तो कितनी बार नाव पर गया हूँ।”आगे-आगे विक्की अकड़ते हुए चला।"
नौका की सैर
"काटो ठंड से काँपते हुए धूप में अपने को सुखाने की कोशिश कर रहा था। पास में विक्की चुपचाप बैठा हुआ था। जब काटो के बाल थोड़ा सूख गये और शरीर में थोड़ी गर्मी आ गयी, वह बोल उठा, “कितना मज़ा आया! जब मेरे साथी इस किस्से को सुनेंगे तो उन्हें विश्वास ही नहीं होगा।” काटो को लग रहा था मानो वह एक बहुत बड़ा हीरो और जहाज़ का जाँबाज़ कप्तान बन गया हो!"
नौका की सैर
"कभी उनकी ऐनक बाथरूम में, कभी बिस्तर पर तो कभी माथे के ऊपर होती।"
नानी की ऐनक
"मगर, इस बार नानी की ऐनक मुझे नहीं मिली...अब तक तो नहीं!"
नानी की ऐनक
"तुम्हें तो पता ही है कि वह कितनी गप्पी है! हम दोनों ने कई बार चाय पी और वे सारे लड्डू खा गई जो तुम्हारी माँ ने बनाए थे।" नानी बोलीं।"
नानी की ऐनक
"ओह! हो! किताबें भी तो मेरी दोस्त हैं।"
मेरे दोस्त
"जब टीचर फिर घूमे तो कक्षा में कोई भी नहीं था।"
जंगल का स्कूल
"माँ कहती हैं, “ज़रा रुको अभी तो हम ट्रेन में बैठे भी नहीं।
भूख लगी है, तो मेरे पास मिठाइयाँ हैं।
प्यास लगी है, तो मेरे पास पानी है।
लेकिन जब तक ट्रेन न आये, तब तक इन्तज़ार करो।”"
चाचा की शादी
"ऐसा बड़ा सुनने वाला रोज़ तो नहीं मिलता!"
बारिश में क्या गाएँ ?
"हर सुबह, जैसे ही उसके पापा दाढ़ी बनाना शुरू करते हैं, अनु भी उनके पास आकर बैठ जाती है। बड़े ध्यान से उन्हें दाढ़ी बनाते हुए देखती है। उसके पापा अपनी दो उँगलियों में एक छुटकू-सी कैंची पकड़े, कच-कच-कच... अपनी मूँछों को तराशने में जुट जाते हैं।
और अनु है कि कहती जाती है, “थोड़ा बाएँ... अब थोड़ा-सा दाएँ... पापा नहीं ना! आप अपनी मूँछों को और छोटा मत कीजिए!
आप ऐसा करेंगे तो मैं आपसे कट्टी हो जाऊँगी!”"
पापा की मूँछें
"पापा जब नहा कर बाहर निकलते हैं तो अनु एक छोटी कंघी से बड़ी सफ़ाई से उनकी मूँछों के बाल काढ़ती है।"
पापा की मूँछें
"अनु हमेशा सोचा करती है, पापा अगर एक अच्छा कुरता पहन लें, सिर पर एक पगड़ी रख अपनी कमर पर एक तलवार लटका लें और एक घोड़े पर सवार हो जायें, तो कितने शानदार लगेंगे पापा!"
पापा की मूँछें
"सच बात तो यह है कि अनु को सारे मूँछ वाले आदमी अच्छे लगते हैं। जैसे कि उसकी दोस्त तुती यानि स्मृति के पापा।"
पापा की मूँछें
"तुती के पापा टेनिस बहुत अच्छी खेलते हैं। लेकिन सच में, उन्हें तो एक पहलवान होना चाहिये था।"
पापा की मूँछें
"वे यदि एक चुन्नट डली पगड़ी पहन लें, और अपने कंधे पर एक बड़ी-सी गदा उठा लें, तो बहुत रौबीले दिखेंगे!"
पापा की मूँछें
"अगर वे एक काला टोप और एक लम्बा काला ओवरकोट पहन लें... अपनी आँखों पर एक काला चश्मा लगा लें, तो वे एकदम उस टीवी वाले जासूस की तरह लगेंगे जो सब चोरों को पकड़ लेता है!"
पापा की मूँछें
"चींटी दाने को लेकर आगे बढ़ी तो रास्ते में उसे बाल्टी मिली।"
दाल का दाना
"जब चींटी उसके मुँह के पास से गुज़री तो कुत्ते को ज़ोर से छींक आ गयी। चींटी उछलकर दूर जा गिरी। दाना कुत्ते के मुँह के पास जा गिरा।"
दाल का दाना
"चूज़े ने फिर चोंच मारी। चींटी ने सोचा, अब तो दाना गया।"
दाल का दाना
"उसका घर... अरे! उसका घर तो अब सामने दिख रहा था।"
दाल का दाना
"कभी फुदक कर पेड़ के ऊपर तो कभी पेड़ के नीचे। कभी दोनों पैरों पर खड़ी होकर छलाँगें लगाती तो कभी चिड़ियों के पीछे दौड़ लगाती।"
चुलबुल की पूँछ
""ठीक है, अगर तुम नहीं मानती हो तो मैं तुम्हारी पूँछ बदल देता हूँ," डॉक्टर बोम्बो ने नाक पर चश्मा ऊपर खिसकाया।"
चुलबुल की पूँछ
"लेकिन यह क्या? वह तो एक इंच भी पेड़ पर नहीं चढ़ पाई। कई बार उसने कोशिश की, हर बार वह गिर जाती। आखिर थक कर वह बैठ गई।"
चुलबुल की पूँछ
""डॉक्टर दादा, डॉक्टर दादा, यह पूँछ तो बहुत भारी है। कोई हल्की पूँछ लगा दो," चुलबुल ने थकी आवाज़ में कहा।"
चुलबुल की पूँछ
"डॉक्टर बोम्बो ने बन्दर की पूँछ हटा कर बिल्ली की पूँछ लगा दी। "यह पूँछ बन्दर की पूँछ से तो हल्की है," सोचते हुए चुलबुल चल पड़ी। पूँछ की अदला-बदली में वह अब तक बहुत थक गई थी। वह पास के एक पेड़ के पीछे लेट कर आराम करने लगी।"
चुलबुल की पूँछ
""ओफ़! इस पूँछ के साथ तो मैं भाग भी नहीं पा रही हूँ। मेरी अपनी पूँछ कितनी हल्की थी। मैं कितने आराम से भाग सकती थी," चुलबुल अपनी गलती पर पछताने लगी। किसी तरह गिरते पड़ते वह फिर से डॉक्टर बोम्बो के अस्पताल पहुँची।"
चुलबुल की पूँछ
"अगर मैं अपनी उंगलियाँ अपनी कलाई पर रखूँ तो मैं अपनी नब्ज़ सुन सकती
हूँ!"
चुप! मेरी नाक कुछ कह रही है...
""अगर आप इस से देखें, तो आपको सब कुछ दिखेगा बड़ा और बेहतर!""
गुल्ली का गज़ब पिटारा
""धन्यवाद बेटा! यह तो कमाल का है।अब मैं एक-एक शब्द साफ़ पढ़ सकता हूँ।" दादा जी बोले।"
गुल्ली का गज़ब पिटारा
""धन्यवाद गुल्ली बेटा, तुम तो बहुत सयाने हो। और तुम्हारा यह छोटा, भूरा बक्सा सचमुच गज़ब का है," दादी माँ मुस्कुराते हुए बोलीं।"
गुल्ली का गज़ब पिटारा
"अब तो ठेले को धक्का देने के लिए चीनू को पिता जी का हाथ बँटाना पड़ा!"
कबाड़ी वाला
"मगर चन्दू ने अपने आप उन्हें बता दिया, “अब तो बहुत ही अच्छा लग रहा है।”"
उड़ते उड़ते
"चन्दू ने माँ को प्यार किया और बोला, “सबसे अच्छा तो अब लग रहा है।”"
उड़ते उड़ते
"चीकू तो छुपम-छुपाई तक भी नहीं खेल सकती थी।"
कचरे का बादल
"एक दिन वो सोना से बोली, "हम साथ-साथ स्कूल चलते हैं।" सोना तो फ़ौरन दूर भाग गई।"
कचरे का बादल
"अगले दिन जब चीकू सो कर उठी तो चारों तरफ मक्खियाँ भिनभिना रही थी, हर तरफ बदबू ही बदबू थी।"
कचरे का बादल
"उसने तो बादल को कूड़ेदान में फेंकने की भी"
कचरे का बादल
"रीमा आंटी थैलियाँ उठाकर वहाँ से चली गई! अगले दिन जब चीकू सो कर उठी, तो बादल और भी छोटा हो गया था।चीकू मुस्कराई, वह समझ गई थी कि उसे क्या करना है।"
कचरे का बादल
"सच तो यह है कि उसे भी साफ़ गाँव में रहना अच्छा लगता था।"
कचरे का बादल
"जब भी हम केले के छिलके या पेंसिल की छीलन सड़क पर फेंकते है, तो यह कचरा सड़क के किनारे इकठ्ठा हो जाता है। कुछ उन नालियों के अंदर चला जाता है और उन में जमा हो जाता है। रूकी हुई नालियों में मक्खी-मच्छर पैदा होते हैं जो बीमारियाँ फैलाते हैं! इससे हमारा पर्यावरण गन्दा होता है और अपने आसपास कूड़ा- कचरा तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता। चीकू के दिल से पूछिये।"
कचरे का बादल
"“ए मुन्नी! परे हट, मैं तेरे अंडे खाने आया हूँ,” वह चहक कर बोला। मुन्नी समझदार गौरैया थी। वह झटपट बोली, “काका किसी की क्या मजाल कि तुम्हारी बात न माने? लेकिन मेरी एक विनती है। मेरे अंडों को खाने से पहले तुम ज़रा अपनी चोंच धो आओ। यह तो बहुत गन्दी लग रही है।”"
काका और मुन्नी
"काका खुद को बहुत बाँका समझता था। उसे यह बात अच्छी नहीं लगी कि वह सा़फ -सुथरा नहीं दिख रहा। वह झटपट पानी की धारा के पास पहुँचा। वह धारा में अपनी चोंच डुबो ही रहा था कि धारा ज़ोर से चिल्लाई, “काका! रुको! अगर तुमने अपनी गन्दी चोंच मुझ में डुबोई तो मेरा सारा पानी गन्दा हो जायेगा। तुम एक कसोरा ले आओ। उस में पानी भरकर अपनी चोंच उसी में धो लो।”"
काका और मुन्नी
"कुम्हार बोला, “मैं तो बड़ी खुशी से तुम्हारे लिए कसोरा बनाऊँ, लेकिन मुझे उसके लिए मिट्टी की ज़रूरत है। तुम ज़रा फटाफट मिट्टी ले आओ।”"
काका और मुन्नी
"काका जंगल में जा पहुँचा। उसे नुकीले सींगो वाला एक हिरन दिखा तो वह उससे बोला,"
काका और मुन्नी
"हिरन चिढ़ कर बोला “अरे अकलमन्द की पूँछ, ज़रा यह बता तो सही कि जब तक मैं ज़िन्दा हूँ तू मेरा सींग कैसे ले सकता है?”"
काका और मुन्नी
"“इतनी गर्मी में तो यह बहुत कड़ा काम है,”"
काका और मुन्नी
"“सूखा पुआल खा कर दूध कहाँ से दूँ? हाँ थोड़ी रसीली घास खाने को मिल जाए तो मैं ज़रूर तुम्हें दूध दे दूँ,” भैंस ने रम्भा कर जवाब दिया।"
काका और मुन्नी
"“लेकिन तुम मुझे काटोगे कैसे?” घास फुसफुसाई, “पहले लुहार से हँसिया तो ले आओ।”"
काका और मुन्नी
"यह तो नहीं बताता हाथी"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"बालू है, तो होने दो,"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"जब पापा बाज़ार गए, तो गया संग में छाता।"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"यह झगड़ा बढ़ गया तो दोनों मुखिया के पास गए। मुखिया ने दोनों की बात सुनकर दोनों को एक-एक बोरी कंकड़ मिला चावल दिया और बोला, “कल साफ़ करके ले आना। फिर मैं फ़ैसला सुनाऊँगा।""
मेहनत का फल
"सुबह मुखिया ने दोनों को चावल दिखाने को कहा। ओम ने आधे से ज़्यादा चावल साफ़ कर दिए थे। घनश्याम से बोला गया तो उसने कहा, “मैंने भगवान से प्रार्थना की है, चावल साफ़ हो गए होंगे।""
मेहनत का फल
"जब देखा गया तो चावल की पूरी बोरी उसी तरह थी। फिर मुखिया ने फ़ैसला सुनाया – “मेहनत करने से ही कार्य सफ़ल होता है। केवल ईश्वर के ऊपर आश्रित होकर प्रार्थना करने से कोई भी काम पूरा नहीं होता। अतः ओम ने ज़्यादा मेहनत की है। अतः उसे ज़्यादा रुपया मिलेगा।”"
मेहनत का फल
"उस दिन भी यही सिलसिला चल रहा था। पर वह समाचार का आखिरी हिस्सा सुन पाई। उसे बहुत खुशी हुई कि कम से कम इतना तो सुनने को मिला।"
मछली ने समाचार सुने
"लेकिन वह समाचार तो खुश करने वाला नहीं था, "नदी में दवाई छिड़क कर मछलियों को पकड़ने वाले आ रहे हैं। अनेकों नदियों से ऐसे ही वे लोग मछलियाँ पकड़ कर ले गये हैं।" यह सुनकर उसे गहरा धक्का लगा। बाकी मछलियों को भी यह समाचार पता चला।"
मछली ने समाचार सुने
"सभी को लगा कि दादा मछली ने अगर उस दिन वह समाचार न सुना होता तो यह दुर्घटना घट ही जाती।"
मछली ने समाचार सुने
"अब्बू अच्छा-ख़ासा कमा लेते थे। इसलिए अम्मी को कढ़ाई का काम नहीं करना पड़ता था। कमरु और मेहरु पढ़ने के लिए मस्ज़िद के मदरसे जाती थीं जबकि अज़हर लड़कों के स्कूल जाते थे। कमरु और मेहरु थोड़ी-बहुत कढ़ाई कर लेती थीं लेकिन उनके काम की तारीफ़ कुछ ज़्यादा ही होती थी। उनके अब्बू ठेकेदार जो थे। आसपास रहने वाली सभी औरतों को काम मिलता रहे, उनके चार पैसे बन जाएँ-यह सब अब्बू ही तो करते थे।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"एकाएक अज़हर मियाँ रुक गए, “घर पर बैठी हमारी एक और बहन भी तो है जिसने आज नए कपड़े नहीं पहने हैं। हम में से किसी ने भी उसके बारे में सोचा तक नहीं।”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“मुमताज़ हमारी मौसेरी बहन ही तो है। और वह घर पर इसलिए है क्योंकि वह चल नहीं सकती,” कमरु और मेहरु इकट्ठा चिहुंकीं, “लेकिन हाँ, हमें उसके लिए भी कुछ मिठाई-पकवान तो ले ही लेना चाहिए।”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"चाय के दौर चलते तो साथ ही चटपटी इधर-उधर की खूब गपशप भी होती लेकिन काम बराबर चलता रहता। शाम होती तो सब औरतें अपना काम समेटतीं और घर को रवाना होतीं। उन्हें अपने-अपने परिवार का खाना भी तो तैयार करना होता था।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"मुमताज़ अपने घर से दूर तो थी लेकिन परिवार का एक प्यारा-सा हिस्सा उसके पास भी तो था! उसकी प्यारी तोती मुनिया और दो कबूतर-लक्का और लोटन! ये तीनों उसका दिल बहलाते थे।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"तीनों पंछी बहुत ही प्रतिभाशाली थे। लक्का कितनी ऊँची उड़ान भर लेता था। और लोटन मियाँ डाल-डाल, पात-पात, कभी कलैया तो कभी कलाबाज़ी, और कभी तो नाचने लग जाते! मुनिया भी कम निराली नहीं थी। किसी भी इंसान की बोली बोलना उसके बाएँ पंख का खेल था। मुमताज़ हमेशा मुनिया से उसकी नक्ल उतारने को कहती रहती। जब"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"मुमताज़ काम करती तो लक्का और लोटन दाना चुग कर बादलों में गुम हो जाते लेकिन कुछ ही देर बाद थोड़ा और दाना चुगने लौट आते।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“नहीं, नहीं, पंछी तो नहीं लेकिन हाँ मेरी अम्मी और मेरी बहनें, रेहाना और सलमा वहीं रहते हैं,” कह कर मुमताज़ कढ़ाई शुरू करने लगी।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“चिकनकारी तो हम पिछली तीन पुश्तों से करते आ रहे हैं। मैंने अपनी अम्मी से और अम्मी ने नानी से यह हुनर सीखा,” मुमताज़ बोली, “मेरी नानी लखनऊ के फ़तेहगंज इलाके की थीं। लखनऊ कटाव के काम और चिकनकारी के लिए मशहूर था। वे मुझे नवाबों और बेग़मों के किस्से, बारादरी (बारह दरवाज़ों वाला महल) की कहानियाँ, ग़ज़ल और शायरी की महफ़िलों के बारे में कितनी ही बातें सुनाया करतीं। और नानी के हाथ की बिरयानी, कबाब और सेवैंयाँ इतनी लज़ीज़ होती थीं कि सोचते ही मुँह में पानी आता है! मैंने उन्हें हमेशा चिकन की स़फेद चादर ओढ़े हुए देखा, और जानते हो, वह चादर अब भी मेरे पास है।” नानी के बारे में बात करते-करते मुमताज़ की आँखों में अजीब-सी चमक आ गई, “मैंने अपनी माँ को भी सबुह-शाम कढ़ाई करते ही देखा है, दिन भर सुई-तागे से कपड़ों पर तरह-तरह की कशीदाकारी बनाते।”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“अरे, तो क्या वह कभी भी घर से बाहर नहीं जाती थीं?” मुन्नु हैरान था।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“नहीं, जाती थीं लेकिन कभी-कभी, सब्ज़ी-भाजी लेने या रिश्ते वालों के यहाँ। रेहाना और सलमा भी घर से बहुत कम ही निकलती हैं, और जब जाती हैं तो हमेशा सिर पर ओढ़नी लेकर। मेरी अम्मी बुरका पहनती हैं। मेरी बहनें तो कभी भी पढ़ने नहीं गईं लेकिन मैं आठवीं जमात तक पढ़ी हूँ। उसके बाद फिर मैं भी घर पर रह कर अम्मी और अपनी बहनों से कशीदाकारी सीखती रही हूँ,” मुमताज़ ने अपनी कहानी मुन्नु को सुनाई।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“अरे वाह, तो तुम पाठशाला भी गई हो!” मुन्नु चहका। मुन्नु भी छुटपन से अपने पिता के काम में हाथ बँटाता आया था। इसलिए उसे कभी पाठशाला जाने का मौका नहीं मिला।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"अम्मी को पढ़ना-लिखना नहीं आता। वह तो यह भी नहीं जानती थीं कि व्यापारी को उनके काम का मेहनताना कितना देना चाहिए। पहले तो मैंने उन्हें थोड़ा हिसाब करना, गिनना सिखाया। लेकिन फिर हमें रुपयों की ज़रूरत पड़ने लगी। तब मैंने भी यही काम पकड़ लिया।” मुमताज़ बहुत हौले से, कुछ रुक कर बोली, “कभी-कभी तो अम्मी की इतनी याद आती है कि मैं रात-रात भर रोया करती हूँ।”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“ऐसा है तो जल्दी से जाओ और अपनी नानी की चादर ले आओ, मैं तुम्हें एक खेल दिखाता हूँ,” मुन्नु रुआब से बोला। उसने मुमताज़ को चाँद पाशा के बारे में बताया। चाँद पाशा एक बीमार, बूढ़ा जादूगर था जिससे मुन्नु की मुलाकात अपने पिता के साथ फेरी लगाते हुई थी। उसने मुन्नु को एक बहुत ही मज़ेदार जादू सिखाया था। मुन्नु चाहता था कि मुमताज़ वह जादू देखकर अपना दुःख भूल जाए।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"दोनों बहनों ने एक तरकीब सोच ली। एक शाम जब मुमताज़ लक्का-लोटन के लिए दाने का इंतज़ाम करने निकली तो मेहरु ने काम करने के लिए मुमताज़ को दिया गया सारा रंगीन कपड़ा और धागे कहीं छिपा दिए। सिर्फ़ सफ़ेद कपड़ा ही बचा रहा, “तो अब देखते हैं,” मेहरु उँगलियाँ नचाती बोली, “हमारी प्यारी बहन की तारीफ़ कौन करता है!”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"नानी ने मुमताज़ के माथे को बड़े प्यार से चूमा और बोली, “क्यों मेरी बच्ची, तू इतनी उदास क्यों है? तुझे शायद पता नहीं कि असली चिकनकारी रंगीन कपड़े पर तो होती ही नहीं। उसे तो सदियों से सफ़ेद मलमल पर ही काढ़ते थे क्योंकि यह कुरते आदमी ही पहना करते थे।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"फिर जब औरतों ने चिकन के कुरते पहनना शुरु किए तो यह काम रंगीन कपड़े पर भी होने लगा। लेकिन चिकन की बेहतरीन कढ़ाई सफ़ेद मलमल पर सफ़ेद धागे से ही होती है। यही इस काम का सार है, उसकी रूह है...और एक काबिल कशीदाकारिन का सबसे बड़ा इम्तिहान भी।”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"जब मुमताज़ इस विस्मय-नगरी से लौटी तो उसने एक बड़ा सफ़ेद कपड़ा लिया और उस पर सफ़ेद धागे से फूल काढ़ने बैठ गई। उसने हरदोई के आमों और कश्मीर के बादाम के जैसे पत्ते काढ़े और फूलों के गुच्छों से लदी झाड़ियों के बीचोंबीच एक बहुत ही खूबसूरत मोर भी! वह किसी जादुई चादर से कम नहीं लगती थी।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"मुमताज़ के काम ने तो सभी का मन मोह लिया था। थोक के व्यापारी और चिकनदार-सबकी ज़ुबाँ पर हरदोई से आई एक छोटी-सी चिकनकारिन का ही नाम था! अपनी नुमाइशों में दिखाने के लिए कुछ आला, अमीर औरतें आबिदा खाला से मुमताज़ का काम माँगने आईं।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"अब तो कमरु और मेहरु की जलन का ठिकाना ही नहीं रहा। मुमताज़ का कहीं और नाम न हो जाए, इसके लिए उन्होंने एक और योजना बनाई। काढ़ने से पहले कपड़े पर कच्चे रंग से नमूने की छपाई होती थी। कढ़ाई होने के बाद कपड़े को धोया जाता था जिससे वे सब रंग निकल जाते थे।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"ईनाम के जलसे में कमरु और मेहरु ने देखा कि सब मुमताज़ को कितनी इज़्जत दे रहे थे। कुछ-एक ने तो उन्हें भी ऐसी हुनर वाली लड़की की बहनें होने की बधाई दी।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"जलसे के बाद जब सब घर लौटे तो कमरु ने मुमताज़ से पूछा, “ऐसे सुंदर, एक से एक बढ़िया नमूने तुम कहाँ से लाईं?”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"मुमताज़ कुछ पल तो ख़ामोश रही। फिर उसने अपना जादू अपनी बहनों को बताने का फ़ैसला कर लिया। मुस्करा कर, वह कमरु से बोली, “चलो, तुम भी मेरी नानी की चादर का एक कोना पकड़ो और ख़ूब ध्यान लगा कर सोचो।”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"कमरु ने कोना पकड़ तो लिया लेकिन वह कुछ पशोपेश में भी थी। आखिर मुमताज़ कह क्या रही थी! उसे तो वहाँ नाचती मुनिया और गुटरगूँ करते, खेलते हुए लक्का-लोटन के इलावा और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"साँझी की प्राचीन कला आज भी भारत के उत्तर प्रदेश में स्थित मथुरा और वृंदावन में प्रचलित है। एक ज़माने में कलाकार पेड़ की पतली छाल का प्रयोग करते थे लेकिन अब तो तरह-तरह के कागज़ भी इस्तेमाल किये जाते हैं। नमूने बहुत विस्तृत होते हैं और अधिकतर धार्मिक दृश्य, फूल-पत्ते, वयन और रेखागणित संरचनाएँ दर्शाते हैं। इस जटिल कला का उपयोग मंदिरों में प्रतिमाएँ सजाने के लिए, कपड़े पर देवी-देवताओं के स्टैंसिल या बच्चों के लिए स्टैंसिल काटने के लिए किया जाता है। तस्वीर में रंग या चमक देने के लिए स्टैंसिल के नीचे रंगीन या धात्विक कागज़ का इस्तेमाल किया जाता है।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"काफ़ी लम्बा रास्ता था। रज़ा ने चारों तरफ़ देखा तो उसकी आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं। मुग़लों के महल कितने सुन्दर थे! पतले नक्काशीदार खम्भे और मेहराब-सब लाल रंग के बालुकाश्म से बने हुए। कहीं कहीं फुलवारी वाले बग़ीचे, जिनमें कमलों से सजे तालाब और झिलमिलाते फव्वारे नज़र आ रहे थे। रज़ा ने मन से सोचा कि जन्नत ऐसी ही होती होगी।"
रज़ा और बादशाह
"रज़ा ने देखा कि अब्बा के माथे पर परेशानी झलक रही थी। हाय, अगर बादशाह सलामत को पटके पसन्द नहीं आये तो क्या वे सारे कपड़े लौटा देंगे, मुझे फ़ौरन कुछ करना होगा, उसने सोचा।"
रज़ा और बादशाह
"”हुज़ूर,“रज़ा सँभल कर बोला,”धनी जी को पगड़ी की ज़रूरत पड़ेगी। हमने उनकी वाली तो ले ली है।“"
रज़ा और बादशाह
"”उन्हें एक पटका दे दो,“अकबर ज़ोर से हँसे।”वह धुले से नीले रंग वाला। उनकी पगड़ी तो अब हमने रख ली है।“"
रज़ा और बादशाह
"6. मुग़लों के महलों में कई रसोईघर थे। हर रसोईघर से बादशाह के लिये खाना भेजा जाता। ज़ाहिर है कि जब बादशाह सलामत खाने बैठते तो वे तीस किस्म की लज़ीज़ चीज़ों में से अपनी पसन्द की चीज़ खाते। ओहो! मुँह में पानी भर आता है मुग़लई खाने का नाम आने पर- बिरयानी, पुलाओ, कलिया, कोर्मा-यह सब पकवान मुग़लई रसोईघरों से ही निकल कर आये हैं।"
रज़ा और बादशाह
"स्कूल से घर लौटते हुए अली, गौरव, सुमी और रानी, मुझसे बार-बार मेरी इस नई ज़िम्मेदारी के बारे में पूछते रहे। मैंने बात टालने की कोशिश की, लेकिन मुझे तो मालूम था कि मुझे क्या काम सौंपा गया है। मैंने उनसे कहा कि पता नहीं तुम लोग किस चीज़ के बारे में बात कर रहे हो। लेकिन यह बात सच नहीं थी। मुझे अच्छी तरह पता था कि वे किस के बारे में पूछ रहे हैं?"
थोड़ी सी मदद
"माँ कहती है कि लोगों को घूरना अच्छी बात नहीं है। लेकिन मैं तो देखता हूँ कि सभी तुम्हें घूरते हैं। वे मुझे भी घूरते हैं क्योंकि मुझे तुम्हारे साथ रहना होता है, तुम्हारा ध्यान रखने के लिए। तुम हमारे स्कूल में क्यों आइं? तुमने अपनी पढ़ाई उसी स्कूल में जारी क्यों नहीं रखी जहाँ तुम पहले पढ़ती थीं?"
थोड़ी सी मदद
"सच कहूँ तो ख़ुद मैं भी यह बात जानना चाहता हूँ और मेरे मन में भी वही सवाल हैं जो लोग तुम्हारे बारे में मुझसे पूछते हैं। हाँ, मैंने पहले दिन ही, जब तुम कक्षा में आई थीं, गौर किया था कि तुम एक ही हाथ से सारे काम करती हो और तुम्हारा बायाँ हाथ कभी हिलता भी नहीं। पहले-पहल मुझे समझ में नहीं आया कि इसकी वजह क्या है। फिर, जब मैं और नजदीक आया, तब देखा कि कुछ है जो ठीक सा नहीं है। वह अजीब लग रहा था, जैसे तुम्हारे हाथ पर प्लास्टिक की परत चढ़ी हो। मैं समझा कि यह किसी किस्म का खिलौना हाथ होगा। मुझे बात समझने में कुछ समय लगा। इसके अलावा, खाने की छुट्टी के दौरान जो हुआ वह मुझसे छुपा नहीं था।"
थोड़ी सी मदद
"सुनो, मैं तुम्हें एक सलाह देना चाहता हूँ। यह ठीक है कि तुम हमारे स्कूल में नई हो। लेकिन अगर तुम चाहती हो कि कोई तुम्हें घूर-घूर कर न देखे, और तुम्हारे बारे में बातें न करें, तो तुम्हें भी हर समय सबसे अलग-थलग खड़े रहना बंद करना होगा। तुम हमारे साथ खेलती क्यों नहीं? तुम झूला झूलने क्यों नहीं आतीं? झूला झूलना तो सब को अच्छा लगता है। तुम्हें स्कूल में दो हफ्ते हो चुके हैं, अब तो तुम खुद भी आ सकती हो। मैं हमेशा तो तुम्हारा ध्यान नहीं रख सकता न।"
थोड़ी सी मदद
"आज जब सुमी, गौरव और मैं स्कूल आ रहे थे तो वे एक खेल खेल रहे थे, जो उन्होंने ही बनाया था। इस खेल को वे एक हाथ की चुनौती कह रहे थे। इस का नियम यह था कि तुम्हें एक हाथ से ही सब काम करने हैं- जैसेकि अपना बस्ता समेटना या फिर अपनी कमीज़ के बटन लगाना।"
थोड़ी सी मदद
"सुमी अपने जूते के फीते नहीं बाँध सकी। और खेलने के बाद भी उसे जूते के फीते बाँधने का ध्यान नहीं रहा, और वह उलझ कर गिर पड़ी। उसकी ठोड़ी में चोट लग गई। जब मैडम ने उसकी ठोड़ी की चोट देखी तो उस पर ऐंटीसेप्टिक क्रीम तो लगा दी, लेकिन उसे लापरवाही बरतने के लिए डाँट भी पड़ी। “जूतों के फीते बाँधे बिना पहाड़ों में दौड़ लगाई जाती है? घर जाते समय गिर पड़तीं या और कुछ हो जाता तो क्या होता?“"
थोड़ी सी मदद
"तुम जानती हो न कि सँयोग क्या होता है? यह ऐसी बात है कि जैसे तुम कुछ कहो और थोड़ी देर में वही बात कुछ अलग तरीके से सच हो जाए। पिछले पत्र में मैंने तुम्हें सुमी और जूतों के फीतों के बारे में बताया था। और उसके बाद, आज, मैंने तुम्हें जूतों के फीते बाँधते हुए देखा। वाह, यह अद्भुत था! मैं सोचता हूँ कि तुमने यह काम मुझसे ज़्यादा जल्दी किया जबकि मैं दोनों हाथों से काम करता हूँ। अगर तुम मेरी दोस्त न होतीं तो मैं तुम्हारे साथ जूते के फीते बाँधने की रेस लगाता। नहीं, नहीं, शायद मैं तुम्हें कहता कि मुझे भी एक हाथ से फीते बाँधना सिखाओ।"
थोड़ी सी मदद
"सुनो, हमारे साथ खेलने के बारे में मैने पहले जो कुछ भी कहा है उसके लिए मैं क्षमा माँगता हूँ। मुझे लगता है कि तुम सिर्फ़ शर्माती हो। और मैंने एक ही हाथ का इस्तेमाल करते हुए झूला झूलने की भी कोशिश की। और यह काम बहुत ही मुश्किल है, झूले को दोनों हाथों से पकड़ कर न रखा जाए तो शरीर का संतुलन नहीं बन पाता। लेकिन तुम जैसे जँगल जिम की उस्ताद हो। भले ही तुम बार पर लटक नहीं पातीं लेकिन तुम सचमुच बहुत तेज दौड़ती हो, अली से भी तेज, जिसे खेल दिवस पर पहला इनाम मिला था।"
थोड़ी सी मदद
"पता है जब मैंने तुम्हें बस में देखा तो मैं बहुत हैरान हुआ था। मुझे इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि मेरे पिता और तुम्हारे पिता एक ही जगह काम करते हैं! लेकिन मैं बहुत खुश हूँ कि तुम दफ़्तर की पिकनिक में आईं, क्योंकि पिछले साल जब हम दफ़्तर की पिकनिक पर गए थे तब उसमें मेरी उम्र का कोई भी बच्चा नहीं था और बड़ों के बीच अकेले-अकेले मुझे ज़रा भी अच्छा नहीं लगा था। मैं बहुत ऊब गया था।"
थोड़ी सी मदद
"मुझे लगता है कि मुझे यह बात पहले ही तुम्हें बता देनी चाहिए थी- जब भी वार्षिकोत्सव आने वाला होता है, प्रिंसिपल साहब कुछ सनक से जाते हैं। वे तुम पर चिल्ला सकते हैं - वे किसी को भी फटकार सकते हैं। अगर ऐसा हो, तो बुरा न मानना। मेरी माँ कहती है कि वे बहुत ज़्यादा तनाव में आ जाते हैं, क्योंकि वार्षिकोत्सव कैसा रहा इससे पता चलता है कि उन्होंने काम कैसा किया है।"
थोड़ी सी मदद
"तुम्हारा नया हाथ तो बहुत ही बढ़िया है! बुरा न मानना, लेकिन पुराना वाला हाथ कुछ उबाऊ था। बस था... नाम को। जबकि नया वाला तो बिल्कुल जादू जैसा है, और तुम उँगलियाँ भी चला सकती हो और उनसे चीजें भी पकड़ सकती हो! मुझे उम्मीद है कि अगर मैं तुमसे हाथ मिलाने के लिए कहूँ तो तुम बुरा नहीं मानोगी। अरे यह बात बस मेरे मुँह से यूँ ही निकल गई। कल देखेंगे कि क्या तुम इस से कुछ सामान भी उठा सकती हो।"
थोड़ी सी मदद
"मुस्करा रही थी! अब ऐसे सपने में यह बेसुरी आवाज़! उफ़! कल्लू ने रज़ाई में से मुचड़ा मुँह बाहर निकाल के मिनमिनी आवाज़ में कहा, “शब्बो, अभी कैसे? मैं अभी तो सोया था!”"
कल्लू कहानीबाज़
"“अरे कल्लन कोहरा है तो क्या करें? तुझे सूरज कहाँ से दिखाएँ? अब्बू कब से खेत पर चले गये हैं और मोहल्ले के सब बच्चे कब के स्कूल चले गये,” शब्बो ने कड़क के कहा।"
कल्लू कहानीबाज़
"रज़ाई फेंक के कल्लू ने बिस्तर छोड़ा। स्कूल देर से नहीं पहुँच सकता था वह! किसी हालत में नहीं। परसों मास्टर जी ने ऐसा धमकाया था कि एक दिन भी वह फिर देर से आया तो सज़ा ऐसी होगी कि वह याद रखेगा।उन्होंने तो यह भी कह डाला कि अगली कक्षा में नहीं चढ़ायेंगे। और इसके ऊपर से घंटों तक उसे कोने में कान पकड़ के खड़ा रहना पड़ा था।"
कल्लू कहानीबाज़
"हर सुबह के जैसे आज भी कल्लू बिजली की सी फुर्ती से इधर-उधर भाग के तैयार होने लगा। पानी की बाल्टी से बर्फीले पानी के कुछ छींटे आँखों पर डाल के उसने खुद को जगाया।
नहाने का तो सवाल ही नहीं था। शुक्र है कि सर्दियों का मौसम था नहीं तो अम्मी कहाँ मानने वाली थीं। कमीज़, पतलून और स्वेटर आनन फानन में पहन के, चप्पलों में पैर घुसाये।"
कल्लू कहानीबाज़
"उसकी बहन मुनिया एक अल्मारी के पीछे से प्रकट हुई। उसके चेहरे पर भी चौड़ी मुस्कान खेल रही थी। दोनों इतनी ज़ोर से हँसे कि मुनिया को हिचकियाँ आ गईं।
निकलते हुए कल्लू ने रसोई से एक सूखी रोटी उठा ली थी। उसे चबाते हुए वह खुद से बात करते हुए चला जा रहा था।"कहानी कल्लन मियाँ। एक नई, मानने लायक कहानी नहीं तो फिर कोने में खड़े पाये जाओगे।”"
कल्लू कहानीबाज़
"मुश्किल यह थी कि अब मामला गम्भीर होता जा रहा था। अब मास्टर जी ने अगर उसे कक्षा नौ में नहीं चढ़ाया तो कल्लू को लेने के देने पड़ जाने वाले थे क्योंकि अब्बू स्कूल छुड़ा के उसे खेतों में काम पर लगा देंगे। अब कौन पालक तोड़ेगा और गाजर और मटर बटोरेगा जब कि वह स्कूल जा सकता है।"
कल्लू कहानीबाज़
"स्कूल तो उससे सौ गुना अच्छा था और उसे पता था कि अगर वह बारहवीं का बोर्ड का इम्तिहान पास कर ले तो उसे नौकरी मिल सकती है, शायद कॉलेज भी जा सके। कॉलेज... वाह! वह तो कल्लू का सपना था।"
कल्लू कहानीबाज़
"पिछले महीने वे पास के शहर में कल्लू की कक्षा को कमप्यूटर की प्रदर्शनी में ले गये थे। क्या मशीनें थीं! वाह! वहाँ के दुकानदार ने उन्हें सही तरह से "माउस" का इस्तेमाल सिखाया था और इन्टरनेट पर जाने का तरीका भी। वह तो बिल्कुल जादू के जैसा था। अब कल्लू और दामू भी माउस की जादूगरी सीखना चाहते थे कि वे भी कमप्यूटर की स्क्रीन पर "ज़िप-ज़ैप" दौड़ सकें।"
कल्लू कहानीबाज़
"जब वे बस में लौट रहे थे तो दामू और उसने मिल के एक कमाल की योजना बनाई थी। नया राजमार्ग खजूरिया गाँव के बगल से निकलता था। दामू और कल्लन मिल के वहाँ एक ढाबा, एस टी डी फ़ोन बूथ, कमप्यूटर सेन्टर खोल सकते थे। दामू, जिसे सपने में भी खाने के ख़याल आते थे, ढाबा चला सकता था और कल्लू एस टी डी बूथ। बूथ से लोग घर को फ़ोन लगायेंगे और आस-पास के सभी गाँवों के लोग मण्डी में सब्ज़ी, गेहूँ और गन्ना भेजने से पहले इन्टरनेट पर आज के भाव देख सकते थे।"
कल्लू कहानीबाज़
"चाय की दुकान वाले धरमपाल ने उबलती केतली पर से आँख हटाई। उसने आश्चर्य से कहा “अरे, यह तो कल्लू है।” उसके चेहरे पर हँसी खेल गई और भवें उचकाते हुए उसने कहा, “क्या बात है? आज सूरज पश्चिम से निकला है क्या? इतनी सवेरे कहाँ चले?”"
कल्लू कहानीबाज़
"भागते कल्लू के पास जवाब देने की फुर्सत कहाँ थी? धरमपाल चाचा को मज़ाक सूझता रहता है, बड़बड़ाते कल्लू ने कदम ताल न तोड़ी। यहाँ कल्लू की जान पर बन आई थी और उन्हें अपने पकोड़ों से फुर्सत नहीं। और कल्लू की स्कूल की देरी में हँसने वाली कौन सी बात थी? वह तो हर हफ़्ते की कहानी थी!"
कल्लू कहानीबाज़
"हाँ, सबसे बुरा तो तब हुआ था जब वह परसों देर से पहुँचा था। 26 जनवरी के कार्यक्रम का रिहर्सल था और जब वह स्कूल के अहाते में पहुँचा तो राष्ट्रगान की “जय जय जय जय हे” वाली पंक्ति गाई जा रही थी। और कल्लू को वहाँ सामने होना चाहिये था। दामू, मुनिया, और सरू के साथ गाने की अगुआई करते हुए।"
कल्लू कहानीबाज़
"पीछे खड़े हो के उसने जोश के साथ “जय हे” गाया और चुपचाप कक्षा की तरफ़ सरक रहा था जब किसी ने उसे कॉलर पकड़ के पीछे झटका दिया। मास्टर जी के तमतमाये चेहरे को देख के तो उसके दिल की मानो धड़कन ही रुक गई।"
कल्लू कहानीबाज़
"“अच्छा ठीक है,” मास्टर जी थोड़े पसीज गये, “इस बार जाने दे रहा हूँ पर एक बार भी और देर से आये तो तुम शो से बाहर। समझ रहे हो?”"
कल्लू कहानीबाज़
"उसकी ज़िन्दगी तो समझो अब बरबाद हो गई थी।"
कल्लू कहानीबाज़
"हाय मेरी किस्मत, अपने पर कुढ़ता हुआ रंभाती भैसों से बच के निकला। यहाँ जान के लाले पड़े हैं और मैं पहुँचा भी तो कहाँ? बदरी और उसकी मोटी भैसों के पास घास चरने। हाँफता, मिट्टी में फिसलता वह किसी तरह से वहाँ से भागा। बदरी, भैसों का अजीबोग़रीब मालिक अपनी मन भर की पगड़ी पहने डंडा लहरा रहा था और मोटी मूछों के पीछे मुस्करा रहा था।"
कल्लू कहानीबाज़
"“आज तो बड़ी जल्दी निकल आये कल्लू? स्कूल जाने से पहले मेरी भैसों को नहला दो?”"
कल्लू कहानीबाज़
"“नहीं। पाँच रुपये दूँगा। अभी तो समय है। तुम जल्दी आये हो।” “हाँ, मैं जल्दी आया हूँ,” कल्लू भुनभुनाया, “इतनी जल्दी आया हूँ कि आज, आज नहीं कल है। कहो तो भैंसों की सानी भी कर दूँ और थोड़ा नाच भी...” “हा हा हैं हैं,” बदरी ने भैंस पर हाथ मारा, “तुम तो बड़ी ठिठोली करते हो कल्लन भाई।”"
कल्लू कहानीबाज़
"कल्लू भागता रहा। मन ही मन उसने सोचा, पूरा गाँव मेरे खिलाफ़ है, दिमाग का पेंच ढीला बदरी भी। मुझ गरीब का मज़ाक बनाने में उन्हें मज़ा आता है। फिर उसे झटके से याद आया कहानी-बहाने की समस्या तो अभी वैसी ही बनी हुई थी। विकराल और हल-विहीन। अम्मी बीमार थी और उसे नाश्ता बनाना था। नहीं। दो बार इस्तेमाल कर चुका था। इस बार नहीं चलेगा।"
कल्लू कहानीबाज़
"किसी ने उसका कलम चुरा लिया? कलम तो उसके बस्ते में था। उसकी चप्पल टूट गई और उसे मरम्मत कराने जाना पड़ा। नहीं रे। चप्पल तो उसकी बिल्कुल नई थी।"
कल्लू कहानीबाज़
"दामू के घर से गुज़रते उसने देखा उसका सबसे प्यारा दोस्त और उसकी बहन सरु, आँगन में चारपाई पर बैठे नाश्ता खा रहे थे। हा! उन्हें भी देर हो गई थी, कल्लू ने विजयी भाव से सोचा और अभी तो वे खा रहे थे इसलिये मेरे बाद ही पहुँचेंगे। शायद मास्टर जी उन पर गुस्सा दिखाने में मुझे भूल ही जायें?"
कल्लू कहानीबाज़
"दामू ने कल्लू को देखा तो उसकी आँखें फैल गईं, “ओए कल्लू। मेरे लिये रुक जा यार!”"
कल्लू कहानीबाज़
"दामू और सरु के लिये कितना आसान है, कल्लू मन ही मन बुदबुदाया। स्कूल के बगल में रहते हैं। स्कूल की घंटी बजने पर भी घर छोड़ेंगे तो देर नहीं होगी। स्कूल के फाटक पर पहुँचते-पहुँचते कल्लू का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मुँह में पान की गिलौरी दबाते वहाँ कौन खड़ा था भला? मास्टर जी। हाय री किस्मत!"
कल्लू कहानीबाज़
"“कहानी? कौन सी कहानी?” कल्लू ने गंभीर चेहरा बना के अचरज दिखाने की कोशिश की, “मैं कहानियाँ नहीं सुनाता... मतलब... कि” यह सब क्या हो रहा है, कल्लू ने सोचा, “एक-एक शब्द सौ प्रतिशत सच मास्टर जी।” “आज तो समय से पन्द्रह मिनट पहले आ गये कल्लन,” मास्टर जी की मुस्कान खिली।"
कल्लू कहानीबाज़
"“अभी तो कोई भी नहीं पहुँचा,” मास्टर जी के हँसी के फव्वारे के साथ पान की पीक का भी फव्वारा छूटा, “तुम्हारे सिवाय!”"
कल्लू कहानीबाज़
"“अब पता चला। शब्बो और मुनिया। उनकी तो ख़ैर नहीं। छोडूँगा नहीं उन्हें! शब्बो बोर हो रहा है तो मेरे साथ ऐसी चाल खेली...”"
कल्लू कहानीबाज़
"“हाँ, और एक अच्छी खासी कहानी भी बरबाद हो गई,” मास्टर जी ने हमदर्दी जताई “चलो, अब अन्दर तो आ ही जाओ।” “शब्बो को भुगतना पड़ेगा,” कल्लू ने दाँत पीसे, “छोड़ूँगा नहीं उसे।” “क्या करोगे?” “दूसरी टाँग तोड़ दूँगा!” कल्लू ने बिफ़र कर कहा।"
कल्लू कहानीबाज़
"हम फिर उस औरत के घर गए और कहा कि पॉलिथीन के प्रयोग से हमारी जान भी जा सकती है क्योंकि जब हम उसे जलाते हैं तो उससे ज़हरीली गैस निकलती है जो टी बी और साँस लेने में तकलीफ़ जैसे अन्य रोग पैदा करती है।"
पॉलिथीन बंद करो
"फिर उन्होंने पूछा कि पॉलिथीन से और क्या होता है। तब हमने उन्हें बताया कि पॉलिथीन अगर उपजाऊ जगह पर प्रयोग किया जाए तो वह खराब हो सकती है, जैसे गेहूँ के पौधे के ऊपर यदि पॉलिथीन रखते हैं तो पौधा ठीक से नहीं उगेगा।"
पॉलिथीन बंद करो
"बहुत कम लोगों को यह पता है कि वे सेना में भर्ती होने के पहले से ही सेना के लिए हॉकी खेलने लग गए थे। १४ साल की उम्र में वे अपने पिताजी के साथ सेना की दो टीमों के बीच मैच देखने गए थे। जब एक टीम हारने लगी जो ध्यान चंद ने अपने पिताजी से कहा कि अगर उनके पास हॉकी स्टिक होती तो वे उस टीम को जिता देते।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"ध्यान चंद ने अपने अंतिम वर्ष अपने प्रिय स्थान झाँसी में बिताए। वहाँ रहने वाले लोग इस महान पुरूष को देखा करते थे, जो कभी बाज़ार जा रहे होते तो कभी अपने मित्रों से मिलने अथवा कभी घर के काम निपटाने के लिए सार्इकिल पर जाते हुए दिखार्इ दे जाते थे। उनका निधन ३ दिसम्बर १९७९ को नर्इ दिल्ली के एक अस्पताल में हुआ। उनका पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ झाँसी हीरोज़ ग्राउंड पर अंतिम संस्कार किया गया।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"आज हम उनके जन्मदिन, २९ अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाते हैं, और भारतीय खेल जगत के सर्वकालिक सर्वोच्च पुरस्कार, ध्यान चंद पुरस्कार को उनके नाम पर रखा गया है। यदि भारत खेल में पुन: कभी शक्तिकेंद्र के रूप में उभरता है तो हम कह सकते हैं कि इसके पीछे इस महान व्यक्ति की प्रेरणा है। एक जादूगर जो कभी हॉकी खेलता था, जिसने पूरी दुनिया को रोमांचित कर दिया।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"मोरू को अंक अच्छे लगते थे। 1 का अंक उसे दुबला और अकेला सा लगता था तो 100 मोटा और अमीर सा। 9 कितना इकहरा और आकर्षक लगता खास तौर पर वह जब 1 के बगल में खड़ा हो कर 19 बन जाता। अंक उसे कभी न ख़त्म होने वाली सीढ़ी जैसे लगते। मोरू कल्पना करता कि वह एक-एक कर के सीढ़ी चढ़ रहा है।"
मोरू एक पहेली
"जब वह थक जाता तो खुद को सीढ़ियों के जंगले पर फिसलते हुए देखता और सब अंक उसकी ओर हाथ हिला रहे होते। दोपहर के खाने में अक्सर सबके आधे पेट रह जाने पर ख़त्म हो जाने वाले चावल से नहीं, उन दोस्तों से नहीं जिन्हें खेल जमते ही घर जाना होता, अंक हमेशा मोरू के पास रहते। कभी न ख़त्म होने वाले अंक कि जब चाहे उनके साथ बाज़ीगरी करो, छाँटो, मिलाओ, बाँटो, एक पंक्ति में लगाओ, फेंको, एक साथ मिलाओ या अलग कर दो।"
मोरू एक पहेली
"रोज़ सुबह शिक्षक बोर्ड पर कुछ लिख देते थे। उसके बाद ऊँची आवाज़ में सब बच्चों को अपनी स्लेटों पर उसे उतारने का आदेश देते। फिर वह बाहर चले जाते। अगर लड़के बोर्ड पर लिखी चीज़ों की नकल अच्छे से करते तो वह उन पर नज़र डाल लेते। अगर वह ऐसा नहीं कर पाते तो वह नाराज़ हो जाते। जब वह गुस्से में होते तो बच्चों को बुरा भला कहते। और जब गुस्सा और बढ़ जाता तो वह उन्हें मारते थे।"
मोरू एक पहेली
"उसकी स्लेट टूट गई थी और उसकी माँ के पास नई स्लेट खरीदने के पैसे नहीं थे। मोरू ने दीवार पर चढ़ने वाली सैकड़ों चींटियाँ गिनना शुरू किया। उसने बाहर पेड़ को देखा और उसे उसकी पत्तियाँ बिलकुल सही लगीं। सही पत्तियों की परछाईं भी सही होती है। मन ही मन मोरू ने स्कूल के अहाते की दीवार में टूटी ईंटों की संख्या गिनी। उसने हिसाब लगाया कि अगर हर ईंट की कीमत पाँच रुपये है तो सारे छेद भरने में एक हज़ार से ज़्यादा रुपये लगेंगे।"
मोरू एक पहेली
"“मेरी पुरानी स्लेट टूट गई और मेरे पास नई खरीदने के पैसे नहीं हैं।” मोरू बोला। शिक्षक गुस्से में थे और उन्होंने अपनी छड़ी से मोरू को पीटा। मोरू धीरे से बोला, “अगर स्लेट होती तो भी मैं सवाल नहीं करता क्योंकि मैं करना नहीं चाहता।”"
मोरू एक पहेली
"कभी-कभी घंटों तक वह फल-सब्ज़ी के बाज़ार में गायब रहता। छत पर जा कर वह अपनी पतंग उड़ाने की कोशिश करता पर आसमान खाली होता तो इसमें ज़रा भी मज़ा नहीं आता।"
मोरू एक पहेली
"एक दिन मोरू दीवार पर बैठा बच्चों को स्कूल जाते देख रहा था। अब उससे कोई नहीं पूछता था कि वह उनके साथ क्यों नहीं आता। बल्कि अब तो बच्चे उससे बचते थे क्योंकि वह डरते थे कि मोरू उन्हें परेशान करेगा। शिक्षक भी वहाँ से गुज़र रहे थे। मोरू ने उन्हें देखा। उन्होंने मोरू को देखा। न कोई मुस्कराया और न किसी ने भवें सिकोड़ीं।"
मोरू एक पहेली
"अगले दिन मोरू ने स्कूल छूटने का इन्तज़ार किया। जब सब बच्चे जा चुके थे और शिक्षक अकेले थे, मोरू चुपचाप अन्दर आया और दरवाज़े पर आ कर खड़ा हो गया। शोरोगुल और हँसी मज़ाक के बगैर स्कूल कुछ भुतहा सा लग रहा था। शिक्षक ने नज़र उठाई और बोले, “अच्छा हुआ जो तुम आ गये। मुझे तुम्हारी मदद चाहिये।” मोरू को अचरज हुआ। शिक्षक क्या मदद चाहते होंगे? उनके पास तो मदद के लिये स्कूल में बहुत से बच्चे थे। वे धीरे से बोले, “क्या तुम किताबों को छाँटने में मेरी मदद कर सकते हो?”"
मोरू एक पहेली
"फिर आई अंकों वाली किताबें। मोरू की आँखें और उंगलियों की तेज़ी कुछ ढीली पड़ी। मोटे अंक पतले अंकों के साथ नाच रहे थे। दो अंक एक के ऊपर एक ऐसे बैठ गये जैसे कोई ढुलमुल इमारत हो जो अपनी नींव भरने का इन्तज़ार कर रही हो। गुणा के सवालों में जैसे संख्या बढ़ती जाती थी, वो कुछ नाटे और नीचे की तरफ़ चौड़ाते लग रहे थे। भाग इसका ठीक उलटा था। शुरूआत में बड़ी संख्या और अगर ध्यान से करते जाओ तो अन्त में लम्बी पतली आकर्षक पूँछ बन जाती थी। अगर भाग्यशाली हो तो अन्त में कुछ नहीं बचेगा। एक-एक कर के सारे अंक और उनके करतब मोरू के पास लौट आये।"
मोरू एक पहेली
"वह बाज़ार तक गईं पर सभी सब्ज़ीवाले आराम से अपनी सब्ज़ियाँ बेच रहे थे। आज उन्हें सताने वाला लड़कों का गुट कहीं नहीं था। अन्त में वह गली पार कर रही थीं तो उनकी नज़र अनायास ही स्कूल की खिड़की पर टिक गई।"
मोरू एक पहेली
"(दीदी, क्या उसकी अम्मी उसकी पिटाई नहीं करतीं? अगर घर पर मैंने कभी ऐसे गुस्सा दिखाया तो अम्मी तो मेरी कस कर पिटाई करतीं!)"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"मेरे हिसाब से तो बादल तभी गरजते हैं,"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"पर मैंने तो अपनी किताबों में कुछ और ही पढ़ा है...।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"दीदी, ऐसा भी तो हो सकता है कि"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"न तो कुंभकर्ण, न तो हवाई जहाज़ है,"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"यह तो बारिश में होड़ लगाने वाले"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"अरे हाँ, समझदार तो तुम हो ही"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"पर किताबों से तो मैंने कुछ और ही सीखा है।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"पर मेरी किताबों में तो कुछ और ही लिखा है।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"पर यह तो तुम्हें भी मालूम है, है न?"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"पर दादी, तुम तो बिजली के बारे में बता रही हो,"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"मुझे तो बादलों की गड़गड़ाहट के बारे में समझना है।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"परन्तु जब दो परमाणु आपस में टकराते हैं तो कभी-कभी इलेक्ट्रॉनों का आदान-प्रदान हो जाता है। अब जिस परमाणु से इलेक्ट्रॉन निकल गए उसमें प्रोटोनों की मात्रा इलेक्ट्रॉनों से अधिक हो जाती है। अतः उस परमाणु में धन आवेश हो जाता है। इसी तरह, जिस परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटोनों से अधिक हो जाती है, उसमें ॠण आवेश हो जाता है। इन आवेश वाले परमाणुओं को आयन कहते हैं।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"अब गरजते बादलों में, वायु ब़र्फ के टुकड़े और पानी की बूँदों को ऊपर की ओर ले जाती है। यह जब आपस में टकराते हैं तो इनके परमाणु आयन बन जाते हैं। अब धन आवेश वाले आयन हल्के होने की वजह से ऊपर उठते हैं और ॠण आवेश वाले आयन धरती की ओर, बादल के निचले हिस्से की ओर जाते हैं।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"यह बिजली, अपने चारों ओर की वायु को बेहद गर्म कर देती है-सूरज जितना गर्म! अब यह गर्म वायु, बहुत तेज़ी से फैलती है, बिल्कुल बम के धमाके की तरह और जब बिजली की चमक समाप्त हो जाती है, तो उतनी ही रफ्तार से सिकुड़ती है। इसी वायु के धमाके को हम बादलों के गर्जन के नाम से जानते हैं।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"गुब्बारे पर ऊन रगड़ने से, दोनों के बीच में इलेक्ट्रॉनों का आदान-प्रदान हो जाता है। गुब्बारे
में इलेक्ट्रॉनों की मात्रा अधिक होने से उसमें
ॠण आवेश हो जाता है। अब जब तुम इस
गुब्बारे को दीवार पर लगाते हो, तो गुब्बारे के"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"“जहाँ तक पट्टेदार की बात है, ज़मीन जोतने का अधिकार र र र र... और उसका कर तो उसको ओ ओ ओ... उउउउउउ अम्म्मम्म्म्म्म”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"राज संगीतकार को यह खाने की कहानियाँ बिलकुल नहीं भा रही थीं। भरा पेट हो, तो वो गा ही नहीं सकते! मगर वो भी कुछ मदद करना चाहते थे। सो उन्होंने कहा, “हमारे वंश में, महाराज, हम निद्रा देवी का स्वागत हमेशा संगीत से ही करते हैं। नीलाम्बरी राग में गाई हुई कोई सुन्दर रचना, वीणा की संगत में... आ हा, परमानन्द!”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"राज विदूषक ने और जोड़़ा, “अगर और किसी से काम न बने महाराज, तो एक अच्छी कहानी तो निश्चित रूप से आपको सुला देगी।”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"इनमें से कोई तो कारगर होगी ही।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"कोट्टवी राजा ने एक ही सांस में उसे पी लिया। ओह! पेट कितना भर गया! उठना नामुमकिन, हिलना नामुमकिन और लेट कर सो जाना तो बिलकुल ही नामुमकिन।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"“शायद संगीत सुन लूँ तो नींद आ जाए,” उन्होंने सोचा।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"विदूषक ने एक लम्बी, उब्काऊ सी कहानी शुरू की, इस उम्मीद से कि राजा उसे सुनते ही सो जायेंगे। आह, मगर हमारे राजा को चैन कहाँ था। बेचैन होकर पूछते रहे, “हाँ हाँ, वो तो ठीक है, मगर कहानी ख़तम कैसे होती है?”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"निद्रा देवी को यह बेचैनी पसंद नहीं आई। सो वो दूर ही रहीं। एक घंटे बाद, थकी हुई आवाज़ लेकर विदूषक थका हारा सा अपने घर लौट गया। और राजा? वो तो अब भी जाग रहे थे।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"राजा अपनी निद्राहीन प्रजा के लिए बहुत ही चिंतित हो उठे। अपने इस विस्तृत कार्यक्रम की सलाह तो हर किसी को वो दे नहीं सकते थे। उन्होंने अपने राजपुरोहित से सुझाव माँगा। उस बुद्दिमान इंसान को पता था कि यह एक जटिल समस्या है। “सभी से कहिए आज से पंद्रह दिन बाद नगर सभा में एकत्रित हों। सभी लोग गरम पानी से नहा कर, भोजन करके, सूर्यास्त पर हाज़िर हों। मैं सभी को आशीर्वाद देने के लिए निद्रा देवी को वहाँ बुलाऊँगा।”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"कितना मज़ेदार रहा समुद्र की तली की सैर का यह अनुभव! अब तो मुझे हमेशा गोताखोरी के मौके की रहेगी तलाश!"
गहरे सागर के अंदर!
"पैरेटफ़िश के दांत तोते की चोंच जैसे नज़र आते हैं। अपने बड़े और मज़बूत दांतों से ये मछलियां सख़्त प्रवाल पर जमी काई खुरच कर खाती हैं। कुछ किस्म की पैरेटफ़िश तो हरियाली के साथ थोड़ा बहुत प्रवाल भी खुरंच कर खा जाती हैं। खुरंच कर खाया हुआ प्रवाल इनकी आंतों से बाहर आते-आते बारीक पिस चुका होता है, और लहरों के साथ किनारे आकर ख़ूबसूरत 'बीच’ यानी समुद्रतट की सफ़ेद रेत का हिस्सा बन जाता है।"
गहरे सागर के अंदर!
"मैंटा रे बड़ी विशाल मछलियां होती हैं, जिनके पंख पक्षियों के डैनों जैसे फैले हुए होते हैं। इनकी मदद से यह पानी के अंदर बिलकुल बाज़ और गिद्ध वाले अंदाज़ में धीरे - धीरे पंख चलाते हुए आगे बढ़ती हैं। कुछ मैंटा रे के डैने तो इतने बड़े होते हैं कि एक पंख के सिरे से दूसरी तरफ़ वाले पंख के सिरे तक की दूरी 23 फ़ीट तक हो सकती है!"
गहरे सागर के अंदर!
"वहीं घास चरती हुई गाय के पास जाकर गौरैया बोली, “मेरा अमरूद कँटीली झाड़ी में गिरा है। निकाल कर देने के लिए उस लड़के से कहा तो उसने मना कर दिया। उस लड़के को पीटने के लिए किसान से कहा तो उसने भी मना कर दिया। अब तुम उस किसान के खेत को चर लो।”"
गौरैया और अमरूद
"अब तो गौरैया बहुत खुश!"
गौरैया और अमरूद
"यह साँप सामान्य, स्वस्थ साँपों की तरह सरसरा और लहरा नहीं रहे थे। जादव उनके बीच पहुँचे तो भी न तो उन्होंने फुफकारा, न वहां से भागे और न ही उन्हें काटने की कोशिश की। वह तो बस रस्सियों की तरह थके-हारे, अलसाये से पड़े रहे।"
जादव का जँगल
"एक साल महानद सूखकर एक पतली सी धारा भर रह जाता तो दूसरे साल उसमें बाढ़ आ जाती। कभी उसके सैलाब में काफ़ी सारी रेत बह कर आ जाती, तो कभी उसकी धारा में तमाम रेत बह जाती। ज़ोरदार बारिश के दिन आए और चले गए। लेकिन जादव ने बाँस की रोपाई जारी रखी।"
जादव का जँगल
"गाँव कस्बों में बदल गये। ज़मीन तो ज़मीन, आसमान तक की रँगत में फ़र्क पड़ गया।"
जादव का जँगल
"सुबह नारँगी और दिन में नीला नज़र आने वाला आसमान कभी बैंगनी तो कभी गुलाबी नज़र आने लगा।"
जादव का जँगल
"कोई पास से तो कोई दूर से, तमाम सारे पक्षी मुलाई के लगाए पेड़ों में घोसले बनाने के लिए आ गए।"
जादव का जँगल
"वहाँपेड़ों की कमी नहीं थी, इसलिए वहाँ आ बसने के लिए जानवरों का ताँता लग गया। कोई कूद-फाँद कर आया, कोई डाल-डाल पर छलाँगे मारते हुए, तो कोई मटक-मटक कर चलते हुए। गौर, हिरन, खरगोश और गिब्बन आए। हाथी आये, बाघ आए और गैंडे भी आकर बस गए।"
जादव का जँगल
"जब जादव ने देखा कि साँप आ गए हैं, तो उनका जी भर आया। वह धम्म से ज़मीन पर बैठ गए और ख़ुशी के आँसू उनकी आँखों से बह निकले। ख़ुशी के मारे उन्हें साँपों के काटने का भी डर नहीं रहा।"
जादव का जँगल
"फिर दो जग पानी डाल कर सींचें। आपको कई हफ़्ते तक मिट्टी सूखने पर सिंचाई करनी पड़ेगी, और इंतज़ार करना पड़ेगा तब कहीं गुठली में से पौधा निकलेगा! पौधे को बड़ा होने में बहुत समय लगता है। इसलिए फिक्र न करें, और जल्दबाज़ी तो बिलकुल भी नहीं!"
जादव का जँगल
"आपकी बोई हुई गुठली में से अंकुर फूटने के बाद वह आम के स्वस्थ पौधे के रूप में पनप जाए, तो तैयार रहें उसकी सिंचाई, देखभाल और पहले से भी ज़्यादा इंतज़ार के लिए! ध्यान रखें कि कहीं आपके पोधे को कीड़े-मकोड़े या कोई जानवर न खा जाएँ या फिर कोई उसे अपने पैरों तले न रौंद जाएँ। अगर इंतज़ार करते-करते आप ऊबने लगें तो कुछ किताबें पढ़ डालें, कुछ गीत गुनगुना लें, और कुछ और पौधे लगा दें!"
जादव का जँगल
"कुछ साल में, जब आप पहले से लंबे हो जाएँगे, तब आपका आम का पेड़ भी आपके साथ बढ़ रहा होगा। बढ़ते-बढ़ते वह एक बड़े पेड़ में बदल जाएगा जिस पर आप चाहें तो चढ़ सकेंगे, या फिर उसके साये में पिकनिक कर सकेंगे। तब शुरू होगा असली मज़ा! तब आपका पेड़ आम देने लगेगा, जिन्हें आप और आपके दोस्त खा सकेंगे। इससे भी ज़्यादा बढ़िया बात यह होगी कि आम खाना पसंद करने वाले तमाम दूसरे जीव भी आपके पेड़ की ओर खिंचे चले आएंगे - पक्षी, चींटियाँ, गिलहरियाँ, चमगादड़, बन्दर और मकड़ियाँ।"
जादव का जँगल
"कछुए और खरगोश की दौड़ तो याद है न? उस दौड़ के बाद जानवरों के पूरे राज्य में सभी कछुए और खरगोश के बारे में चर्चा करने लगे। जहाँ देखो, उन्हीं की बात होती थी।"
कछुआ और खरगोश
"पड़ोसी राज्य पहुँचने का रास्ता बहुत कठिन था। काँटों और पत्थरों से भरा था। बीच में दो नदियाँ भी पड़ती थीं। चाहे कछुआ हो या खरगोश रास्ता आसानी से तय होने वाला नहीं था। और एक ही दिन में तो वह रास्ता तय करना असंभव ही था।"
कछुआ और खरगोश
"मीमी ने माँ से कहानी सुनाने के लिए कहा तो माँ बोलीं, "मुझे काम करना है।""
कहानियों का शहर
"पापा बोले, "मैं तो अखबार पढ़ रहा हूँ।""
कहानियों का शहर
"किसी के पास मीमी के लिए समय नहीं था। कहानियों के लिए तो बिल्कुल नहीं।"
कहानियों का शहर
"दीदी टीचर नहीं थीं और वे पढ़ती भी नहीं थीं। वे बच्चों से तो बड़ी थीं लेकिन टीचर से छोटी ही थीं। दुबली पतली सी, चमकीली आँखें। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान।"
कहानियों का शहर
"मेयर की रौबीली आवाज़ गूँजी,"कहानियों ने तो नाक में दम कर रखा है। हमारा इतना बड़ा शहर ठप्प हो गया है। आखिर हम करें क्या?" कमरे में सन्नाटा छा गया।"
कहानियों का शहर
"विशेषता यानी ख़ूबी ही तो है! क्या तुम सोच कर बता सकती हो कि तुम्हारी दूसरी विशेषताएं क्या हैं?" इम्मा ने पूछा।"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
""लेकिन! लांगलेन ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा, "न तो मेरी दादी और न ही नानी की ठुड्डी में गड्ढा है। आपको यह विशेषता कहां से मिली?""
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
""मेरी ओर देखो लांगलेन," अप्पा बोले। "मैं बिल्कुल विशिष्ट हूं। मेरा क़द ख़ूब लंबा है, मेरे सिर, चेहरे और कानों पे बड़े-बड़े घुंघराले बाल हैं। और मैं दुनिया में सबसे चौड़े पैरों वाला व्यक्ति हूं। अगर तुम्हारे कानों पर बहुत बड़े-बड़े और घुंघराले बाल हों तो तुम क्या करोगी?""
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"हंसते हुए इम्मा बोली, "गालों में गड्ढे पड़ने वाली विशेषता मुझे अपनी मां से मिली थी। लेकिन, हरेक विशेषता के पीछे कई वजह होती हैं। और किसी वजह से कोई विशेषता सामने आती है, तो किसी दूसरी वजह से गायब भी हो सकती है!""
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"अपना पारिवारिक पेड़ बनाना जैसा कि आपको अब तक जान ही गए होंगे की लांगलेन की इम्मा (मम्मी) मणिपुर से हैं और अप्पा (पापा) तमिलनाडु से। क्या आप भी लांगलेन की तरह (पेज 7 और पेज 8) अपना पारिवारिक पेड़ बनाना चाहेंगे? एक कागज़ और पेन उठाइये और इसे तुरंत ही बनाइये। यदि आप कहीं भी अटक जाएं, तो अपने परिवार वालों की मदद लें।"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"“अरे हाँ! वह तो हमारी कक्षा में आया था। यह देखने कि हमारी दीदी क्यों चिल्लाई थीं!”"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"“लेकिन मैं तुम्हारी कक्षा में गयी थी, वहाँ तो कोई भी नहीं था!” अम्मा बोलीं।"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"“हम सब तो शिक्षकों के कमरे में छुपे हुए थे,” मीरा ने कहा। “क्योंकि रोहन का साँप हमारी कक्षा में जो था!”"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"“पर मीरा जब मैं शिक्षकों के कमरे में गयी, मुझे तो वहाँ कोई नहीं दिखा!”"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"“जब मैं बड़ी दीदी के कमरे में गयी, वह तो खाली था!” अम्मा ने कहा।"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"“नहीं, तुम अकेले कहाँ थीं, साँप भी तो तुम्हारे साथ था।”"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"कहीं गोगो उस पार तो नहीं भाग गया?"
कहाँ गया गोगो?