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Chapter 1/24
editमोरू को देख कर लगता था कि गंगा के इस पार या उस पार वाला मुहावरा उसी के लिये लिखा गया था। उसकी पसंद या नापसंदगी बड़ी ज़बरदस्त थी। जो काम वह नहीं करना चाहता वह कोई भी उससे करवा नहीं सकता था और न ही कोई उसे अपने मन का काम करने से रोक सकता था। मोरू एक पहेली जैसा था।
Chapter 2/24
editपेड़ों पर चढ़कर कच्चे आम तोड़ना मोरू को अच्छा लगता था। वह टहनियों पर रेंगते हुए ऐसी कल्पना करता मानो किसी घने जंगल में चीता हो। उसे कीड़े🐛 पकड़ना भी पसंद था। चमकदार पन्नी सी चमचमाते सर वाली हरी-नीली घोड़ा मक्खी, पतला और चरचरा सा टिड्डा, पीली तितली जिसका रंग🎨 पीले गुलाल सा उसकी उंगलियों पर उतर आता था। मोरू को पतंग उड़ाना भी अच्छा लगता था। जितनी ऊँची उड़ सके उतना अच्छा। सबसे ऊँची छतों पर चढ़ कर वह अपनी पतंग बादलों से कहीं ऊपर तक उड़ाता जैसे वह एक चमकता हुआ पक्षी🐔🐤🐦🐧🕊️🦃🦅🦆🦉 हो जो सूरज तक पहुँचने की कोशिश कर रहा हो।
Chapter 3/24
editमोरू को अंक अच्छे लगते थे। 1 का अंक उसे दुबला और अकेला सा लगता था तो 100 मोटा और अमीर सा। 9 कितना इकहरा और आकर्षक लगता खास तौर पर वह जब 1 के बगल में खड़ा हो कर 19 बन जाता।🚶 अंक उसे कभी न ख़त्म होने वाली सीढ़ी जैसे लगते। मोरू कल्पना करता कि वह एक-एक कर के सीढ़ी चढ़ रहा है।
editकभी-कभी तेज़ी से दो, कभी-कभी तीन-चार सीढ़ी एक साथ चढ़ा जा रहा है।
Chapter 4/24
editजब वह थक जाता🚶 तो खुद को सीढ़ियों के जंगले पर फिसलते हुए देखता और सब अंक उसकी ओर हाथ हिला रहे होते। दोपहर के खाने🍴 में अक्सर सबके आधे पेट रह जाने पर ख़त्म हो जाने वाले चावल से नहीं, उन दोस्तों से नहीं जिन्हें खेल जमते ही घर🏠 जाना🚶 होता, अंक हमेशा मोरू के पास रहते। कभी न ख़त्म होने वाले अंक कि जब चाहे उनके साथ बाज़ीगरी करो, छाँटो, मिलाओ, बाँटो, एक पंक्ति में लगाओ, फेंको, एक साथ मिलाओ या अलग कर दो।
Chapter 5/24
editमोरू को स्कूल🎒🏫🚌 जाना🚶 अच्छा लगता क्योंकि उसके कई दोस्त भी स्कूल🎒🏫🚌 जाते थे। सवेरे उठ कर बाहर जाना🚶 उसे अच्छा लगता था। स्कूल🎒🏫🚌 के अहाते के अन्दर खेल का मैदान उसे अच्छा लगता था। पर उसे कक्षा में जाना🚶 अच्छा नहीं लगता था।
editउसे शिक्षक अच्छे नहीं लगते थे। कक्षा में वह अपने को कैद महसूस करता था। वहाँ कई चीज़ें करने की मनाही थी। बच्चे🚸 सवाल नहीं पूछ सकते थे, वे इधर-उधर घूम नहीं सकते थे और बोल भी नहीं सकते थे। शिक्षक के तेवर चढ़े रहते थे।
editमोरू को लगता था कि शिक्षक को बच्चे🚸 बिलकुल अच्छे नहीं लगते थे। शायद उन्हें शिक्षक होना भी पसंद नहीं था और स्कूल🎒🏫🚌 आना भी अच्छा नहीं लगता था। यूँ बच्चे🚸 भी शिक्षक को पसंद नहीं करते थे।
Chapter 6/24
editरोज़ सुबह शिक्षक बोर्ड पर कुछ लिख देते थे। उसके बाद ऊँची आवाज़🔊 में सब बच्चों को अपनी स्लेटों पर उसे उतारने का आदेश देते। फिर वह बाहर चले जाते। अगर लड़के बोर्ड पर लिखी चीज़ों की नकल अच्छे से करते तो वह उन पर नज़र डाल लेते। अगर वह ऐसा नहीं कर पाते तो वह नाराज़ हो जाते। जब वह गुस्से में होते तो बच्चों को बुरा भला कहते। और जब गुस्सा और बढ़ जाता🚶 तो वह उन्हें मारते थे।
Chapter 7/24
editएक दिन🌤️ शिक्षक ने कुछ सवाल बोर्ड पर लिखे। सवाल आसान थे पर उबाऊ थे। बड़े सारे और सब एक जैसे। मोरू ने सवाल नहीं किये। उसका सवाल करने का मन नहीं कर रहा था और उसके पास स्लेट भी नहीं थी।
editउसकी स्लेट टूट गई थी और उसकी माँ👩 के पास नई स्लेट खरीदने के पैसे नहीं थे। मोरू ने दीवार पर चढ़ने वाली सैकड़ों चींटियाँ गिनना शुरू किया। उसने बाहर पेड़🌲🌳 को देखा और उसे उसकी पत्तियाँ बिलकुल सही लगीं। सही पत्तियों🍃 की परछाईं भी सही होती है। मन ही मन मोरू ने स्कूल🎒🏫🚌 के अहाते की दीवार में टूटी ईंटों की संख्या गिनी। उसने हिसाब लगाया कि अगर हर ईंट की कीमत पाँच रुपये है तो सारे छेद भरने में एक हज़ार से ज़्यादा रुपये लगेंगे।
Chapter 8/24
edit“मोरू!” शिक्षक ने कड़क के कहा, “तुम कुछ करते क्यों नहीं हो?” मोरू ने नासमझी से उनकी ओर ताका।
edit“तुम्हारी स्लेट कहाँ है? स्कूल🎒🏫🚌 ले कर नहीं आये क्या?” शिक्षक चिल्लाये। मोरू को दिख रहा था कि वे गुस्से में थे।
edit“मेरी पुरानी स्लेट टूट गई और मेरे पास नई खरीदने के पैसे नहीं हैं।” मोरू बोला। शिक्षक गुस्से में थे और उन्होंने अपनी छड़ी से मोरू को पीटा। मोरू धीरे से बोला, “अगर स्लेट होती तो भी मैं सवाल नहीं करता क्योंकि मैं करना नहीं चाहता।”
Chapter 9/24
editशिक्षक का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने मोरू के गाल पर एक तमाचा मारा। मोरू का गाल सुर्ख लाल🔴 हो गया। अचानक ही उसकी आँखों से गर्म आँसू फूट पड़े। वह खड़ा हुआ और कमरे से बाहर भागा। बरामदे से नीचे उतर, धूल भरे मैदान को पार करके वह टूटे फाटक से सीधे बाहर निकल गया।
Chapter 10/24
editअगले दिन🌤️ सुबह माँ👩 ने उसे स्कूल🎒🏫🚌 के समय📅 पर जगाया। पर मोरू नहीं उठा। वह पतली सी चारपाई पर कस के आँखें मूँदे पड़ा रहा। अगले दिन🌤️ भी वही किस्सा था और उससे अगले दिन🌤️ और उससे भी अगले दिन।🌤️ कोई भी मोरू को वापस स्कूल🎒🏫🚌 आने के लिये मना नहीं पाया। एक हफ़्ता गुज़रा और फिर एक महीना। मोरू अपने घर🏠 के बाहर दीवार पर बैठा रहता।
Chapter 11/24
editकभी-कभी घंटों तक वह फल-सब्ज़ी के बाज़ार में गायब रहता। छत पर जा कर वह अपनी पतंग उड़ाने की कोशिश करता पर आसमान खाली होता तो इसमें ज़रा भी मज़ा नहीं आता।
editमाँ👩 ने डाँटा, भाई ने चिढ़ाया, दादी👵 ने मिन्नत की, चाचा ने टॉफ़ी का वादा किया और दोस्तों ने फुसलाया पर कोई भी मोरू को स्कूल🎒🏫🚌 लौटने के लिये तैयार नहीं कर पाया।
Chapter 12/24
editबरसात का मौसम आया और गरमी की छुट्टियों के बाद स्कूल🎒🏫🚌 खुला। सबने सोचा कि अब तक मोरू भूल-भाल गया होगा और सबके साथ वह स्कूल🎒🏫🚌 चला जायेगा। “नहीं!” उसने ज़ोर से कहा। ऐसे ही एक साल गुज़र गया। सबने मोरू से कोई भी आशा रखनी छोड़ दी।💗 शायद मोरू ने भी ऐसा ही किया। वह और बहुत कुछ करने लगा। बाज़ार में जा कर वह सब्ज़ीवालों की नाक में दम किये रहता।
Chapter 13/24
editउसके जैसे और बच्चे🚸 जिन्होंने स्कूल🎒🏫🚌 छोड़ दिया था, उनके साथ उसने मिलकर गुट बना लिया जो कि स्कूल🎒🏫🚌 जाने वाले बच्चों को चिढ़ाता और सताता था। अपने दोस्तों की स्कूल🎒🏫🚌 की कॉपियों से पन्ने फाड़कर वह हवाई✈️🌬️💨🛩️🛫🛬🦅 जहाज़🚢🛳️ बनाता। अपनी छत पर जा कर वह राह चलते लोगों पर गुलेल से ढेले मारता।
Chapter 14/24
editपुराने शिक्षक चले गये। एक नये नौजवान शिक्षक उनकी जगह आये।
editएक दिन🌤️ मोरू दीवार पर बैठा बच्चों को स्कूल🎒🏫🚌 जाते देख रहा था। अब उससे कोई नहीं पूछता था कि वह उनके साथ क्यों नहीं आता। बल्कि अब तो बच्चे🚸 उससे बचते थे क्योंकि वह डरते थे कि मोरू उन्हें परेशान करेगा। शिक्षक भी वहाँ से गुज़र रहे थे। मोरू ने उन्हें देखा। उन्होंने मोरू को देखा। न कोई मुस्कराया और न किसी ने भवें सिकोड़ीं।
editअगले दिन🌤️ उसी समय📅 और उसी जगह मोरू दीवार से नीचे देख रहा था। शिक्षक ने ऊपर देखा और हल्के से मुस्कराये। मोरू झट दीवार से नीचे कूद कर भाग गया।
Chapter 15/24
editकुछ दिनों बाद शिक्षक फिर वहाँ से जा रहे थे। वह एक बहुत बड़ा थैला उठाये हुए थे। थैला बहुत भारी था। शिक्षक काफ़ी मुश्किल में थे। मोरू ने सर खुजलाया। शिक्षक धीरे-धीरे वहाँ से निकले। मोरू ने कुछ सोचा और फिर शिक्षक के पीछे भागा। बिना कुछ बोले उसने थैले को एक तरफ़ से थामा। शिक्षक को कुछ राहत मिली और दोनों मिल🏭 कर उस भारी बोझ को स्कूल🎒🏫🚌 तक ले गये।
Chapter 16/24
editस्कूल🎒🏫🚌 के अन्दर थैले को संभाल कर शिक्षक की मेज़ पर रखा गया। शिक्षक ने थैला खोला और मोरू को अन्दर देखने दिया। उसमें बहुत सी रंग-बिरंगी हर आकार की किताबें थीं। चमचमाती और नये कागज़ की महक वाली।
edit“क्या तुम इन्हें बाहर निकालने में मेरी मदद करोगे?” शिक्षक ने पूछा। मोरू ने किताबें बाहर निकालना शुरू किया। कुछ कहानियों की किताबें थीं जिनके आवरण पर तस्वीरें बनी थीं। कुछ में बड़े अक्षर थे। कुछ में इतने शब्द थे कि मालूम होता था उन्हें पन्नों में दबा के बैठाया गया हो। मोरू रोमांचित हो उठा। उसने दो साल से किसी किताब को हाथ नहीं लगाया था।
Chapter 17/24
editअगले दिन🌤️ मोरू ने स्कूल🎒🏫🚌 छूटने का इन्तज़ार किया। जब सब बच्चे🚸 जा चुके थे और शिक्षक अकेले थे, मोरू चुपचाप अन्दर आया और दरवाज़े पर आ कर खड़ा हो गया। शोरोगुल और हँसी मज़ाक के बगैर स्कूल🎒🏫🚌 कुछ भुतहा सा लग रहा था। शिक्षक ने नज़र उठाई और बोले, “अच्छा हुआ जो तुम आ गये। मुझे तुम्हारी मदद चाहिये।” मोरू को अचरज हुआ। शिक्षक क्या मदद चाहते होंगे? उनके पास तो मदद के लिये स्कूल🎒🏫🚌 में बहुत से बच्चे🚸 थे। वे धीरे से बोले, “क्या तुम किताबों को छाँटने में मेरी मदद कर सकते हो?”
Chapter 18/24
editमोरू ज़मीन पर बैठ गया। किताबें उसके चारों तरफ़ फैली थीं। इतनी सारी कहानी की किताबें थीं। उसने जानवरों की कहानियों वाली एक साथ रखीं। तेंदुए की कहानी हाथी🐘 और ऊँटों वाली कहानी के साथ ज़्यादा अच्छी रहेगी। परी कथाएँ देवी-देवताओं की कहानियों के साथ रह सकती हैं। रहस्य कथाएँ अकेली रहेंगी। या शायद उन्हें नायकों और मशहूर व्यक्तियों की कहानियों के साथ रखना चाहिये?
Chapter 19/24
editफिर आई अंकों वाली किताबें। मोरू की आँखें और उंगलियों की तेज़ी कुछ ढीली पड़ी। मोटे अंक पतले अंकों के साथ नाच रहे थे। दो अंक एक के ऊपर एक ऐसे बैठ गये जैसे कोई ढुलमुल इमारत हो जो अपनी नींव भरने का इन्तज़ार कर रही हो। गुणा के सवालों में जैसे संख्या बढ़ती जाती थी, वो कुछ नाटे और नीचे की तरफ़ चौड़ाते लग रहे थे। भाग इसका ठीक उलटा था। शुरूआत में बड़ी संख्या और अगर ध्यान से करते जाओ तो अन्त में लम्बी पतली आकर्षक पूँछ बन जाती थी। अगर भाग्यशाली हो तो अन्त में कुछ नहीं बचेगा। एक-एक कर के सारे अंक और उनके करतब मोरू के पास लौट आये।
Chapter 20/24
editअँधेरा हो चला था और स्कूल🎒🏫🚌 में बिजली नहीं थी। “अब तुम्हें घर🏠 जाना🚶 चाहिये मोरू, पर कल फिर आ सकते हो?” शिक्षक ने पूछा, “पर क्या उस समय📅 आओगे जब बच्चे🚸 यहाँ हों?” अगले दिन🌤️ स्कूल🎒🏫🚌 शुरू होने के कुछ देर बाद मोरू आया। बच्चे🚸 उसे देख कर हैरान थे और कुछ डरे भी। अब तक मोरू का मौहल्ले के अकड़ू दादाओं में शुमार होने लगा था। “अब मेरी मदद करने वाला कोई है,” शिक्षक ने कहा।
editउन्होंने मोरू को छोटे बच्चों के साथ लगाया। कुछ किताबें थीं जिनमें बच्चों को लिखना था। वे बोले, “इन अंकों को आरोही और अवरोही क्रम में लगाने के लिये इन बच्चों की मदद करो।” छोटे बच्चे🚸 मोरू के आसपास जमघट लगाने लगे। उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि मोरू जैसे अक्खड़ को इतना कुछ आता था।
Chapter 21/24
editमोरू ने उन्हें कतार में खड़ा करवाया - सबसे छोटे बच्चे🚸 एक छोर पर और लम्बे वाले दूसरे छोर पर। उसने उन्हें हाथों में अंक पकड़ाए। अब सब आसान हो गया। जैसे छोटे और लम्बे बच्चों के साथ हुआ कि किसे कहाँ खड़ा होना था वैसे ही अंकों के साथ करना था।
editरोज़ मोरू कुछ देर के लिये आता और शिक्षक उसे कुछ काम और फिर उससे बड़ा काम दे देते। रोज़ मोरू को लगने लगा कि उसका अंकों से लगाव बढ़ता ही जा रहा है और उसकी योग्यता और रोमांच छोटे बच्चों में भी समाते जा रहे हैं।
Chapter 22/24
editएक महीने बाद मोरू की माँ👩 सुबह के दस-ग्यारह बजे उसे ढूँढ रही थीं। वह कहीं भी नहीं मिल🏭 रहा था। उन्होंने छत पर देखा पर उसकी पतंगें मायूस सी पानी🌊🌧️💦💧🚰 की टंकी के पास पड़ी थीं। उन्होंने दीवार पर झाँका जहाँ वह रोज़ टाँगें झुलाए बैठा रहता था पर दीवार खाली थी। उन्होंने आम के पेड़🌲🌳 पर देखा जहाँ पत्तियाँ हवा🌬️🍃💨 में सरसरा रही थीं लेकिन किसी भी टहनी पर मोरू नहीं था।
Chapter 23/24
editवह बाज़ार तक गईं पर सभी सब्ज़ीवाले आराम से अपनी सब्ज़ियाँ बेच रहे थे। आज उन्हें सताने वाला लड़कों का गुट कहीं नहीं था। अन्त में वह गली पार कर रही थीं तो उनकी नज़र अनायास ही स्कूल🎒🏫🚌 की खिड़की पर टिक गई।
Chapter 24/24
editवहाँ मोरू नज़र आ रहा था। वह सर झुकाये ध्यान से अपनी कॉपी में कुछ देख रहा था। उसके माथे पर सोच की रेखाएँ दिख रही थीं और उसकी आँखों में गहरी तल्लीनता थी। वह अपनी उम्र के बाकी लड़कों के साथ गणित के मुश्किल सवाल हल करने में लगा हुआ था। शिक्षक की नज़र भी बाहर गई और वह मोरू की माँ👩 की तरफ़ देख कर हल्के से मुस्कराये।
editमोरू फिर से स्कूल🎒🏫🚌 में था। इस बार वह बहुत कुछ सीख रहा था। और उससे भी बड़ी बात👄 यह थी कि उसे पढ़ना-लिखना अच्छा लग रहा था।
Peer-review 🕵🏽♀📖️️️️
Contributions 👩🏽💻
Word frequency
Letter frequency
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|---|---|
| ा | 644 |
| े | 570 |
| क | 554 |
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| थ | 128 |
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| य | 121 |
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| ू | 112 |
| व | 104 |
| उ | 101 |
| ु | 98 |
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| ज | 72 |
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| औ | 55 |
| ट | 53 |
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| ँ | 46 |
| ै | 43 |
| ड़ | 42 |
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