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Storybook paragraphs containing word (788)
"उस रात मैं ग़ुस्से में सो गया।"
अभी नहीं, अभी नहीं!
"अगले दिन, मैं जल्दी उठा और रसोई में गया। अज्जी ने कहा, “तुम ये लड्डू खा सकते हो।”"
अभी नहीं, अभी नहीं!
"मालू ने देखा, कालू ने गड्ढा खोदा हुआ था। खुदी मिट्टी में थे मोटे-मोटे आलू!"
आलू-मालू-कालू
"साथ में चिड़िया भी उड़ती"
कहानी- बादल की सैर
"नदी में मीनू मछली रहती थी."
कहानी- बादल की सैर
"कुछ बनबिलाव रेगिस्तान में रहते हैं।"
बनबिलाव! बनबिलाव!
"टीना मुझे हमेशा आईने में ही दिखती है ऐसे नहीं दिखती|"
मैं और मेरी दोस्त टीना|
"एक दिन टीना मेरे सपने में आई |उसने मुझे जगाया |"
मैं और मेरी दोस्त टीना|
"हम बगीचे में भी गए |पेड़ के पास छिप कर हमने लुका –छिपी खेला |हमने मेमने को भी खेलाया |"
मैं और मेरी दोस्त टीना|
"आसमान में देखो गरजे बादल "
रिमझिम बरसे बादल
"जब स्कूल में नाचे "
रिमझिम बरसे बादल
"ये बुधवार की कक्षा में होने वाले नाटक के लिए हैं।"
गप्पू नाच नहीं सकती
"दे दना दन घूम घूम, पूरे कमरे में तेज़ और धीमे घूम"
गप्पू नाच नहीं सकती
"“मुझे नींद नहीं आ रही अम्मा!” टिंकु फुसफुसाया। लेकिन अम्मा ने उसकी बात सुनी ही नहीं। वह गहरी नींद में थी।"
सो जाओ टिंकु!
"वह जानना चाहता था कि रात में उसे कौन मिल सकता है। ऊपर आसमान में टिंकु ने चाँद देखा। सफ़ेद, जगमग करता गोल चाँद जो मुस्कराता हुआ उसे देख रहा था। वह बहुत ख़ुश हुआ। रात बहुत सुंदर है, टिंकु ने सोचा।"
सो जाओ टिंकु!
"“मैं एक जुगनू हूँ,” जुगनू ने कहा। “मैं अँधेरे में चमकता हूँ!”"
सो जाओ टिंकु!
"“मैं रात के अँधेरे में देख सकता हूँ!”"
सो जाओ टिंकु!
"पीछे झाड़ियों में कुछ सरसराहट हुई।"
सो जाओ टिंकु!
"“तुम कौन हो?” टिंकु ने पूछा।
“मैं उल्लू हूँ।” जवाब आया।
“मैं रात को अपने भोजन की तलाश में निकलता हूँ।”"
सो जाओ टिंकु!
"वह घर लौटते समय बहुत ख़ुश था कि उसने आज बहुत से नए दोस्त बनाए थे। वह अपनी अम्मा से कसकर लिपट गया। उसने फुसफुसाते हुए कहा, “रात अकेली नहीं होती अम्मा! रात में तो बहुत से अद्भुत जीव मिलते हैं।”"
सो जाओ टिंकु!
"“हाँ!” अम्मा बोली, “तुम्हारे रात के दोस्त रात को ही अपना काम करते हैं। वे रात को ही खाते और खेलते हैं। वे दिन में आराम करते हैं। तुम अब सो जाओ। नींद तुम्हें ताकत देगी, ताकि कल तुम अपने दिन के दोस्तों के साथ खेल सको। सो जाओ मेरे प्यारे बच्चे!”"
सो जाओ टिंकु!
"वह भी जवाब में हॉर्न बजाता, “अच्छा ठीक!”"
उड़ने वाला ऑटो
"वह कभी शिकायत नहीं करता। क्योंकि ऑटो वाले शिरीष जी भी बहुत मेहनत करते थे। शिरीष जी की बूढ़ी हड्डियों में बहुत दर्द रहता था फिर भी वह अर्जुन के डैशबोर्ड को प्लास्टिक के फूलों और हीरो-हेरोइन की तस्वीरों से सजाये रखते। कतार चाहे कितनी ही लंबी क्यों न हो वह अर्जुन में हमेशा साफ़ गैस ही भरवाते। और जैसे ही अर्जुन की कैनोपी फट जाती वह बिना समय गँवाए उसे झटपट ही ठीक कर लेते।"
उड़ने वाला ऑटो
"अलग-अलग परिवारों को लाजपत नगर के बाज़ार ले जाना, अर्जुन को बहुत पसंद था। सैलानी जब चार पहियों की जगह तीन पहियों की सवारी चुनते तो उसका मन खुशी से झूम उठता। शिरीष जी के साथ कुतुब मीनार के पास पेड़ की छाँव में आराम करना उसे बहुत अच्छा लगता।"
उड़ने वाला ऑटो
"रात में कनॉट प्लेस की ख़ूबसूरती देखने से उसका मन कभी नहीं भरता।
रेलवे स्टेशन की चहल-पहल और क्रिकेट मैच के बाद फ़िरोज़शाह कोटला
मैदान से उमड़ती भीड़ उसे रोमांचित कर देती।"
उड़ने वाला ऑटो
"जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक था, अर्जुन को इस से ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए था।"
उड़ने वाला ऑटो
"लेकिन कहीं न कहीं अर्जुन के मन में एक इच्छा दबी हुई थी। वह उड़ना चाहता था।
वह सोचता था कि कितना अच्छा होता अगर उसके भी हेलिकॉप्टर जैसे पंख होते, वह उसकी कैनोपी के ऊपर की हवा को काट देते!
शिरीष जी अपने सिर को एक अँगोछे से लपेट लेते जो हवा में लहर जाता। और “फट फट टूका, टूका टुक,” आसमान में वे उड़ने निकल पड़ते।"
उड़ने वाला ऑटो
"लेकिन अर्जुन जानता था कि यह तो बस एक सपना है। ऑटो में हेलिकॉप्टर के पंख होना तो ठीक ऐसा था जैसे हाथी के पंख निकल आना, या फिर रॉकेट की तरह अंतरिक्ष में ढेर सारे डिब्बों वाली ट्रेन का होना।"
उड़ने वाला ऑटो
"शिरीष जी खुश होकर मुस्कराने लगे। मुस्कराते ही पान से रंगे उनके दाँत दिखने लगे। उन्होंने जल्दी से पानी पिया, फिर भीड़ छटने लगी। “लो जादू तो अभी हो गया,” शिरीष जी ने मज़ाक में कहा।"
उड़ने वाला ऑटो
"खुली साफ़ सड़क को देख कर शिरीष जी हैरान रह गए। शीशे में देखते हुए पीछे बैठी औरत से उन्होंने कहा, “हाँ बहन जी, बिलकुल जादू!”"
उड़ने वाला ऑटो
"उसे सड़कों का बहुत बड़ा जाल दिखाई दिया मानो किसी शरारती मकड़े ने बनाया हो।
फटी आँखों से शिरीष जी खुशी में चीख रहे थे। न तो वह हैंडल बार को पकड़े हुए थे और न ही गाड़ियों से बचने की कोशिश कर रहे थे।"
उड़ने वाला ऑटो
"उस औरत ने अपनी सुन्दर साड़ी को ठीक किया। शीशे में देखते हुए वह बोली, “भाई, आपका चेहरा!”"
उड़ने वाला ऑटो
"शिरीष जी ने शीशे में खुद को देखा तो उन्हें एक हीरो जैसा चेहरा दिखाई दिया। उनके दाँत बिलकुल स़फेद और शरीर चमक रहा था। जोश में चिल्लाकर उन्होंने कहा, “हमें और पानी पीना चाहिए!”"
उड़ने वाला ऑटो
"उसकी जानी-पहचानी दुनिया में हर सफ़र का एक मक़सद था, हर मंज़िल के आगे एक नई मंज़िल थी।"
उड़ने वाला ऑटो
"शोरोगुल भरे रास्तों से कहीं ऊपर इस शांत माहौल में अर्जुन को याद
आ रही थी मोटर कारें, साइकिलें और बसों से पटी सड़कें। उसने नीचे देखा। काम में जुटे उसके परिवार के सदस्यों की छोटी-छोटी कैनोपी पीले बिन्दुओं की तरह चमक रही थीं।
अर्जुन को उन लोगों की भी याद आई जो हमेशा कहीं न कहीं जाने के लिए तैयार रहते थे।
एक नई मंज़िल, एक नई जगह... “फट, फट, टूका, टूका, टुक।”"
उड़ने वाला ऑटो
"उस औरत ने नीचे देखते हुए वहाँ की ढेर सारी खुशियों के बारे में सोचा। साड़ी की चमक उसे याद नहीं रही।"
उड़ने वाला ऑटो
"“क्या फ़ायदा इसका?,” वह सोचने लगे। जीवन में ऐसा कुछ बहुत पहले कभी उन्होंने चाहा था। लेकिन अब वह जान गए थे कि जो सच है वह सच ही रहेगा। शिरीष जी को अब अपना ही चेहरा चाहिए था।"
उड़ने वाला ऑटो
"शिरीष जी फिर से काम में जुट गए थे। उस शहर के जाने पहचाने जादू
के नशे में हर सिग्नल, हर साईन बोर्ड, हर मोड़ उनसे कुछ कह रहा था।
बहुत जल्द उनका पुराना जाना पहचाना चेहरा फिर शीशे में दिखने लगा था। वह जानते थे कि उन्हें कहाँ जाना है। वह तो वहाँ पहुँच ही गये थे।
उस औरत की साड़ी फिर से फीकी पड़ गई थी लेकिन उसका चेहरा चमक रहा था।
वे ज़मीन पर पहुँच गए थे। अर्जुन के पहियों ने गर्म सड़क को छुआ। इंजन ने राहत की साँस ली..."
उड़ने वाला ऑटो
"क्लीनर फ़िश नाम की मछलियों ने फटी खाल के टुकड़े खा लिए। पिशि को आराम महसूस हुआ। हिन्द महासागर में रहने वाली ५००० किस्म की मछलियाँ उसे पहले से भी ज़्यादा अच्छी लगने लगीं।"
पिशि फँसी तूफ़ान में
"प्रिय पाठक, क्या आपको मालूम है कि प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में हिन्द महासागर को ‘रत्नाकर’ कहा जाता था? रत्नाकर यानि हीरे जवाहरात की खान। मैंटा रे मछलियाँ अक्सर सफ़ाई के ठिकानों पर जाया करती हैं। सफ़ाई के ठिकानों को कुदरत का अस्पताल कहा जा सकता है। यहीं एंजेल फ़िश जैसी छोटी मछलियाँ मैंटा रे के गलफड़ों के अन्दर और खाल के ऊपर तैरती हैं। वे क्लीनर फ़िश कहलाती हैं क्योंकि वे मैंटा रे के ऊपर मौजूद परजीवियों व मृत खाल को खा कर उसकी सफ़ाई करती हैं। मैंटा रे मछलियाँ विशाल होने के बावजूद बहुत कोमल स्वभाव की होती हैं। बड़ी शार्क, व्हेल मछलियाँ व मनुष्य उनका शिकार करते हैं।"
पिशि फँसी तूफ़ान में
"जंगल में पेड़। पहाड़ पर पत्थर। आर्कटिक (उत्तरी ध्रुव) में बर्फ़। गाँव में मिट्टी, छप्पर के लिए बड़े-बड़े पत्ते और बाँस। शहरों में ईंट, सीमेंट और काँच होता है।"
सबसे अच्छा घर
"मकान बनाने से पहले आपको पता होना चाहिए कि आप को उस में क्या खूबी चाहिए।"
सबसे अच्छा घर
"बर्फ़ से बने मकान इग्लू में बिलकुल ठंड नहीं लगती!"
सबसे अच्छा घर
"बड़े अक्षरों में लिखे मकानों के बारे में और जानकारी के लिए किताब का पिछला भाग देखें।"
सबसे अच्छा घर
"इग्लू: क्या आप सोच सकते हैं कि बर्फ़ की बड़ी-बड़ी ईंटों से बने इग्लू बाहर बर्फ़ जमी होने पर भी अंदर से गर्म रहते हैं? जब बाहर का तापमान -40 डिग्री सेंटिग्रेड होता है तो लोग इग्लू के अंदर आराम से रहते हैं। इन्हें आप कनाडा के ध्रुवीय इलाकों और ग्रीनलैंड के थूले द्वीप में देख सकते हैं।"
सबसे अच्छा घर
"लठ्ठों पर खड़े मकान: यह भला कैसा आकार है? किसी मकोड़े जैसा? लठ्ठों पर खड़े मकान नम, गीली ज़मीन से ऊपर रहने के कारण लोगों को सीलन से बचाते हैं। हमारे देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में भी ऐसे मकान दिखते हैं।"
सबसे अच्छा घर
"हमारी थालियों और हमारे दिमाग में हलवा-पूरी, खीर-पूरी और श्रीखंड-पूरी की एक ख़ास जगह होती है। छुट्टियों में तो छोले-पूरी या आलू-पूरी सबसे ज़्यादा पसंद किये जाते हैं। पूरी तलने की ख़ुशबू सब को अपनी ओर खींचती है। कढ़ाई में तैरती पूरी को देखना भी बहुत दिलचस्प होता है। ज़रा उस सुनहरे रंग की करारी, गर्मागर्म फूली-फूली पूरी को तो देखिये। थाली में रखते ही सबसे गोल और सबसे फूली पूरी को लेने की हम कोशिश करते हैं।"
पूरी क्यों फूलती है?
"हमने देखा है कि गुब्बारे के अंदर मुँह से हवा भरने के बाद वह फूल जाता है। पिताजी अपनी साइकिल के टायर में पंप से हवा भरते है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"तो चलो आज जब अम्मा पूरी तल रही होंगी तब हम इसी के बारे में देखेंगे, जानेंगे, पूछेंगे और पता लगायेंगे।"
पूरी क्यों फूलती है?
"एक बड़े से बर्तन में अम्मा ने थोड़ा-सा आटा लिया। उन्होंने उसमें थोड़ा-सा तेल और नमक डाला और फिर थोड़ा-सा पानी मिलाया।"
पूरी क्यों फूलती है?
"इसकी वजह यह है कि इस आटे में कुछ है जिसे बहुत प्यास लगी है! आप को जब प्यास लगती है तो आप क्या करते हैं? आप पानी पीते हैं।"
पूरी क्यों फूलती है?
"आटे में दो तरह के प्रोटीन होते हैं - ग्लाइडीन और ग्लोटेनिन। इन दोनों प्रोटीन के अणुओं को बहुत प्यास लगती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"आटे में जैसे ही पानी डाला जाता है, यह अणु उसे पी लेते हैं। वे पानी पीने के बाद बड़े और मोटे हो जाते हैं। वे फैल जाते हैं। ज़ाहिर है कि उनके पास आराम से बैठने के लिये जगह नहीं होती है – इसलिए वह एक दूसरे को छूते हैं और धक्कामुक्की करते हैं। वे एक दूसरे से चिपक जाते हैं।"
पूरी क्यों फूलती है?
"अम्मा ने आटे को गूँध लिया है। वह अब अपनी हथेली में थोड़ा सा तेल लगा कर उसे अच्छी तरह गूँधने के लिये कह रही है। आटे को अच्छी तरह गूँधने के लिये मजबूत हाथ चाहिए। उनका कहना है कि अगर आटे को अच्छी तरह गूँधा नहीं जाता है तो पूरी नहीं फूलती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"इस में एक राज़ छिपा है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"अम्मा और बाबा दोनों तैयार हैं। अम्मा ने कढ़ाई चढ़ा (फ्राई पैन चढ़ा) कर उस में थोड़ा तेल डाल दिया है। वह गूँधे हुये आटे से थोड़ा सा आटा लेती हैं। अब वह एक पूरी बेल रही हैं। गर्म तेल में पूरी को डालते हैं। थोड़ी देर में पूरी फूल जाती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"दर असल पूरी के साथ यह होता है - गूँधे हुये आटे में ग्लूटेन होने की वजह से उसे बेला जा सकता है। जब इस आटे की एक छोटी सी लोई को बेला जाता है तो पूरी में ग्लूटेन की एक सतह बन जाती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"और जब पूरी को गर्म तेल में डालते हैं तो उसकी निचली सतह तेल की वजह से बहुत गर्म हो जाती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"याद है न कि आटे को गूँधने के लिये इस में पानी मिलाया गया था? ज़्यादा तापक्रम की वजह से पूरी के अंदर का पानी भाप बन कर उड़ जाता है। यह भाप बहुत ताकतवर होती है और इससे ग्लूटेन की सतह ऊपर चली जाती है। इसी वजह से पूरी फूलती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"बाबा अब पूरी को पलट देते हैं ताकि वह दूसरी तरफ़ से भी सुनहरी हो जाये। उन्होंने कढ़ाई से पूरी निकाल ली है और उसे एक बर्तन में रख दिया है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"अब एक कांटे की मदद से पूरी में एक छेद करते हैं। देखा, भाप कैसे बाहर निकल रही है। फूली हुई पूरी में हवा नहीं होती। उसमें भाप होती है, समझ गये!"
पूरी क्यों फूलती है?
"भेल पूरी/ आलू दही पूरी में इस्तेमाल होने वाली पूरियाँ क्यों नहीं फूलतीं?"
पूरी क्यों फूलती है?
"आप ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि भेल-पूरी और दही-पूरी में इस्तेमाल होने वाली पूरियाँ फूली नहीं होती है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"पूरी बहुत पतली बेली गई है, और उसमें सही मात्रा में पानी नहीं डाला गया है जिससे भाप और प्रेशर बन सके और पूरी फूल सके।"
पूरी क्यों फूलती है?
"कभी-कभी पूरी को बेलने के बाद उस में जानबूझ कर एक कांटे से छोटे-छोटे छेद किये जाते हैं ताकि तलते समय जो भाप बने वह छेद से बाहर निकल जाये। इसी वजह से पूरी फूल नहीं सकती।"
पूरी क्यों फूलती है?
"पानी की मदद से आटा गूँध लेते है। आटे को गूँधते समय बस इतना ही पानी डाले कि आटा न बहुत कड़ा हो और ना ही बहुत मुलायम। हथेली के निचले हिस्से की मदद से कुछ मिनट तक इसे थोड़ा और गूँधते है। चाहें तो, थोड़ा सा तेल भी इस्तेमाल कर सकते है जिससे गुँधा आटा आपके हाथ में चिपके नहीं। गुँधे आटे को करीब 10 मिनट तक ढ़क कर रख देते है। अब इस गुँधे आटे को, कुछ मिनट के लिए दोबारा गूँधते है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"अब फिर इसे एक बड़े बर्तन में रख देते है अब बर्तन के अंदर रखे गूँधे आटे पर इतना पानी डालते है जिससे वो उसमे डूब जाए। पानी के अंदर डूबे आटे को गूँधते रहते है जब तक पानी का रंग सफ़ेद नहीं हो जाता। इस पानी को फैक कर बर्तन में थोड़ा और ताजा पानी लेते है इसे तब तक करते रहे जब तक गुँधे आटे को और गूंधने से पानी सफ़ेद नहीं होता। इसका मतलब यह है कि आटे का सारा स्टार्च खत्म हो गया है और उसमें बस ग्लूटेन ही बचा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्टार्च पानी में घुल जाता है लेकिन ग्लूटेन नहीं घुलता। अब इस बचे हुए आटे यानि ग्लूटेन से थोड़ा सा आटा लेते है इसे हम एक रबड़बैंड कि तरह खीच सकते है। अगर इसे खीच कर छोड़ते है तो यह वापस पहले जैसा हो जाता है। इससे इसके लचीलेपन का पता चलता है आप इसे चोड़ाई में फैला सकते है इससे पता चलता है कि इसमें कितनी प्लाटीसिटी है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"पूरी से जुड़ा इतिहास वैज्ञानिको का मानना है कि सबसे पहले करीब 11,000 साल पहले मिडिललिस्ट देशो में जंगली गेहूं के होने का पता चला था।"
पूरी क्यों फूलती है?
"विश्व के सबसे पहले एनसाइक्लोपीडिया, “अभिलाषितार्थ चिंतामणि” या मनासोललास जिसे राजा सोमेश्वर ने 12 सदी में लिखा था, के अनुसार उस समय में पूरी जैसी कोई चीज बनाई जाती थी जिसे पहालिका कहा जाता था तो पूरी कम से कम 800 साल पुरानी है।"
पूरी क्यों फूलती है?
"क्या ज्वार, बाजरे या चावल के आटे से पूरियाँ बन सकती है, अगर नहीं तो क्यों? गेहूँ के आटे से पूरियों के अलावा हम और क्या चीज़ें बना सकते हैं? अगर आटे में ज़्यादा पानी डाल दिया जाये तो क्या होगा? अगर हम आटे को खाना पकाने के दूसरे तरीकों, जैसे तंदूर या तवा पर पकाते हैं तो क्या होता है?"
पूरी क्यों फूलती है?
"इन छोटे भुरभुरे दानों से पौधे बीज बनाते हैं। मधुमक्खियाँ इन छोटे दानों को लाने-ले जाने के काम में बड़ी उस्ताद हैं। उन्हीं की वजह से कई नए पौधे फलते-फूलते रहते हैं।"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"फिर जब वही मधुमक्खियाँ किसी और फूल के पास जा कर भन-भन करते हुए ज़ोर-शोर से नाचती हैं, तो इस धमा-चौकड़ी में दाने दूसरे फूलों पर गिर जाते हैं। फिर मधुमक्खियाँ और फूलों तक उड़ती हुई जाती हैं, कुछ दाने उठाती हैं व कुछ गिराती चलती हैं। यह कार्यक्रम इसी तरह चलता रहता है।"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"वैसे क्या तुम अपनी साँसे सुन सकते हो? नहीं ना! पर मधुमक्खियाँ सुन सकती हैं। भन-भन की आवाज़ मधुमक्खियों के साँस लेने से भी होती है। उनका शरीर छोटा व कई टुकड़ों में बँटा होता है। तो जब साँस लेने से हवा अंदर जाती है, तो उसे कई टेढ़े-मेढ़े व ऊँचे-नीचे रास्तों को पार कर के जाना पड़ता है। और इसी वजह से भन-भन की आवाज़ होती है।"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"काफी मज़ेदार लगता है ना? मधुमक्खियाँ भी सच में कमाल की हैं, हैं ना?"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"1. मधुमक्खी बहुत मेहनती होती है – सर्दी के मौसम में यह नो महीने तक ज़िंदा रह सकती है और गर्मियों में सिर्फ दो महीने तक! लगातार काम करने से इनको कोई फर्क नहीं पड़ता!"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"5. बंबल बिज़, मधुमक्खी और दूसरी तरह कि बीज़ से ज्यादा बड़ी होती है! उन्हे छत्ते में रहना और मिलना जुलना अच्छा लगता है! कई बंबल बीज में डंक नहीं होता है! वो ज्यादा शहद तो नहीं बनाती लेकिन वो बेहतरीन पोल्लीनेटर होती है!"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"1. मधुमक्खी नाच कर, छत्ते में रहने वाली बाकी मधुमक्खीयों को यह बताती है कि शहद कहाँ मिलेगा तो आप भी कोशिश कीजिये नाच कर कुछ बताने की और देखिये कि क्या आपके दोस्त आपकी बातों को समझ पाते है या नहीं!"
मधुमक्खियाँ क्यों भन-भन करती हैं?
"एक दिन, विज्ञान की कक्षा में खिड़की के बाहर वह आकाश में पंख फैलाए उड़ती चील देख रही थी। वह चिड़िया कितनी खुश होगी! उसे हवाई जहाज़ को उड़ते देखना भी बहुत पसंद था।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
""सुनो! तुम्हारा नाम क्या है? क्या तुम्हें बोर्ड पर ध्यान नहीं देना चाहिए?" कक्षा में पढ़ा रही नई अध्य्यापिका ने कहा।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
""अरे वाह! क्या तुम जानती हो कि भारत की पहली महिला विमान चालक (पायलॉट) का नाम भी सरला था? मेरा नाम हंसा है, मतलब 'हंस'। क्या तुम जानती हो कि हंस भी उड़ने वाले बड़े पक्षियों में से एक हैं? अध्यापिका ने कहा।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
""सरला! तुम्हें कुछ समय पुस्तकालय में बिताना चाहिए। वहाँ पक्षियों और विमानों के बारे में बहुत -सी किताबें हैं, और यंत्रों के बारे में भी, जैसे कि हवाई जहाज़।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"कुछ ही दिनों में वह पशु-पक्षियों के बारे में बहुत कुछ जान गई और यह भी कि हम हवाई जहाज़ की तरह क्यों नहीं उड़ सकते!"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"सरला ने सीखा कि मानव भी उड़ सकते हैं, पर पक्षियों की तरह नहीं। हम मनुष्य के एक महान आविष्कार, हवाई जहाज़ में बैठकर विश्व के किसी भी नगर से उड़ान भर सकते हैं।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"इस महान यंत्र की सहायता से हम हवा में उड़ने का मज़ा ले सकते हैं। पक्षी हवाई जीव होते हैं जिन्हें उड़ने के लिए बाहरी यंत्र की ज़रूरत नहीं होती। आमतौर पर, एक पक्षी के पंख उसके शरीर से बड़े होते हैं। पंख बड़े हल्के होते हैं और इसलिए वे उड़ पाते हैं।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"हवाई जहाज़ बहुत बड़े और बहुत भारी होते हैं। उसके दोनों किनारे पर पक्षी की तरह ही पंख बने होते हैं, जो उन्हें उड़ने में मदद करते हैं। इन जहाजों के पंखों की बनावट ठीक पक्षियों के पंखों जैसी होती हैं। नीचे से सपाट और ऊपर से मुड़े हुए, जो उन्हें आसमान में बहुत ऊँचे तक उड़ने में मदद करते हैं।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"पक्षी उड़ने के समय अपने पंख फड़फड़ाते हैं, लेकिन हमने हवाई जहाज़ के पंखों को फड़फड़ाते हुए कभी नहीं देखा! पक्षी अपने पंख फड़फड़ाते हैं ताकि वे अपने शरीर को ऊपर धकेलने में हवा का उपयोग कर सकें।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"इंजिन बहुत ही मज़बूत यंत्र है जो हवाई जहाज़ के दिमाग की तरह (तेज़) काम करती है। जिस तरह पक्षी अपना दिमाग लगाते हैं और सीखते हैं कि कैसे उड़ा जाय,वैसे ही इंजिन विमान को ज़मीन से ऊपर की ओर धकेलती है और उन्हें आगे बढ़ने में मदद करती है।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"कार एवं अन्य वाहन भी इंजिन की सहायता से ही चलते हैं, मगर वे विमान की तरह आसमान में उड़ नहीं सकते। हवा विमान के उन पंखों के ऊपर और अंदर बहती है जो पक्षी के पंख जैसे होते है, इन्हीं के दबाव से विमान ऊपर उठते हैं और टिके रहते हैं। विमान की भी पूँछ होती हैं - बिलकुल चिड़िया की तरह, जो उन्हें हवा में टिकने और दिशा बदलने में मदद करती है।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"विमानों को उड़ान भरने और उतरने के लिए बड़ी लंबी सड़क की ज़रूरत होती है। इन लंबी सड़कों को 'रनवे' कहा जाता है। विमान को उड़ान भरने और उतरने से पहले रनवे पर बहुत ही तेज़ गति से दौड़ना होता है। हवा में ऊपर उठने के लिए विमान को बहुत ही तेज़ गति की ज़रूरत होती है।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"अधिकांश हवाई जहाज़ तभी उड़ पाते हैं जब वे बहुत ही तेज़ी से दौड़ते हैं। रनवे हवाई अड्डा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो हवाई जहाज़ों को अपनी गति बढ़ाने के लिए पर्याप्त समय देता है। और अंत में वे उड़ान भरते हैं।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"विमान जानते हैं कि उन्हें कहाँ जाना है, क्योंकि विमानचालक उन्हें चलाते हैं। ये चालक विमान के अंदर, सामने की एक जगह, जिसे चालक स्थल (कॉकपिट) कहते हैं, से उन्हें नियंत्रित (कंट्रोल) करते हैं। वे बहुत ही सटीक और आधुनिक डिवाइसों के द्वारा हवाई अड्डों (एक जगह जहाँ हवाई जहाज़ उड़ान भरते और उतरते हैं) के संपर्क में रहते हैं। जिस तरह हमारी मदद के लिए सड़क पर सिग्नल और पुलिस होती है, वैसे ही वायु यातायात नियंत्रक (एयर ट्रैफिक कंट्रोलर) होते हैं जो विमान चालक को बताते हैं कि कब और किस ओर उड़ान भरनी है और कब उड़ान भरना या उतरना सुरक्षित रहेगा।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"विमान वास्तव में एक विशाल पक्षी है! न सिर्फ़ इसका आकार पक्षी की तरह है, बल्कि ये उड़ते भी हैं, हालाँकि पक्षियों की तरह नहीं। सरला बड़ी होकर विमान चालक बनना चाहती है और हवाई जहाज़ उड़ाना चाहती है।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"2. 'फ़्लाइ - डोंट फ़्लाइ' गेम: मित्रों का एक समूह बनाओ और एक -दूसरे को बिना छुए कमरे के चारों तरफ़ जहाज़ की तरह उड़ो। डेन (चोर) एक कोने में खड़ा होकर उड़ने वाली और ना उड़ने वाली चीज़ों के नाम कहेगा। जैसे ही वह किसी ना उड़ने वाली चीज़ (जैसे कि मेज़/टेबुल) कहे तो जहाज़ों को ज़मीन पर उतरना (बैठ जाना) होगा। जो ग़लती करेगा, वह अगला डेन होगा।"
हवाई जहाज़ कैसे उड़ते हैं?
"मुत्तज्जी इन जुड़वां भाई-बहन की माँ की माँ की माँ थीं! ओर वह मैसूर में अज्जी के साथ रहती थीं, जो इन दोनों की माँ की माँ, यानी नानी, थीं। किसी को पता नहीं था कि मुत्तज्जी का जन्मदिन असल में कब होता है, लेकिन अज्जी हमेशा से मकर सक्रांति की छुट्टी के दिन उनका जन्मदिन मनाती थीं।"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"मैसूर में हरे रंग के उस पुराने मकान में पहुँचते ही दोनों दौड़ते हुए सीधे मुत्तज्जी के कमरे मे घुस गए!"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"मुत्तज्जी मुस्कराई, "देखो, मैं इतना जानती हूँ कि मेरे पैदा होने से करीब 5 साल पहले, हिन्दुस्तान भर के महाराजा और महारानियों के लिए दिल्ली में हुई दावत में हमारे महाराजा भी गए थे। एक अंग्रेज राजा और रानी भारत आए थे और तब हमारे महाराजा को सोने का तमगा मिला था।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""रुको," मुत्तज्जी बोलीं, "जरा कुछ और याद करने दो। ओह! जब मैं तुम्हारे बराबर की, यानि 9 या 10 साल की थी, तब मेरे काका बम्बई से हमसे मिलने आए थे और उन्होंने हमें ऐसी साफ़ रेलगाड़ी के बारे में बताया था जिसमें सफ़र करने से कपड़े गंदे नहीं होते थे।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""हाँ!" मुत्तज्जी ने चहकते हुए कहा, "बम्बई में उसी साल उनकी शुरुआत हुई थी। उनमे सफर करते हुए कोई गंदा नहीं होता था। कपड़ों ओर चेहरे पर ज़रा सी भी कालिख, या मिट्टी, या गंदगी, कुछ भी नहीं लगती थी!""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"दोनों ने हैरानी से उन्हें देखा। भला रेलगाड़ी में सफर करके कोई गंदा होता है क्या?"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""फिर कुछ साल बाद," मुत्तज्जी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, "मेरी शादी हो गयी। उस समय कानून था कि शादी के लिए लड़की की उम्र कम से कम 15 साल होनी चाहिए, और मेरे पिता कानून कभी नहीं तोड़ते थे। तो उस समय मेरी उम्र करीब 16 साल की रही होगी। और मेरी शादी के बाद जल्द ही तुम्हारे मुत्तज्जा को बम्बई में नौकरी मिल गयी और हम मैसूर छोड़कर वहाँ चले गए।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"बड़े दुख से मुत्तज्जी ने कहा, "हाँ, उस साल दशहरे के त्यौहार के समय, हमारे महाराजा ने एक बड़े बांध और उसके पास कई सुंदर बागों का उद्घाटन किया था। लेकिन मै वह सब नहीं देख सकी थी क्योंकि मैं बम्बई में थी।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"डटा है। उसी बांध में कावेरी का पानी इकठ्ठा होता है। बांध की बदौलत, अब बरसात के दिनों मेँ बाढ़ नहीं आती, और गर्मी मेँ खेतों के लिए पानी की भी कमी नहीं पड़ती।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""हाँ, के आर एस।" मुत्तज्जी ने बड़े प्यार से अज्जी को देखा और कहा, "तुम्हारी अज्जी मेरी पाँचवी संतान थी, सबसे छोटी, लेकिन सबसे ज़्यादा समझदार। तुम जानते हो बच्चों, मेरे बच्चे ख़ास समय के अंतर पर हुए। हर दूसरे मानसून के बाद एक, और जिस दिन तुम्हारी अज्जी को पैदा होना था, उस दिन तुम्हारे मुत्तज्जा का कहीं अता-पता ही नहीं था। बाद मेँ उन्होंने बताया कि वो उस दिन ग्वालिया टैंक मैदान में गांधीजी का भाषण सुनने चले गए थे। और उस दिन उन्हें ऐसा जोश आ गया था कि वह सारे दिन बस "भारत छोड़ो” के नारे लगाते रहे। बुद्धू कहीं के... नन्हीं सी बच्ची को दिन भर परेशान करते रहे।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""भारत छोड़ो!" पुट्टी की आँखें हैरानी से और फैल गयीं। "हमने इतिहास में पढ़ा है! पुट्टा, ये वह आंदोलन है जो 1942 में शुरू हुआ था, इसका मतलब है कि 1942 में ही...""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""अज्जी मुत्तज्जी की पाँचवी संतान हैं, और उनके सभी बच्चों के बीच 2 - 2 साल का अंतर है..." पुट्टा ने कहा "अगर अज्जी 1942 में पैदा हुईं...""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"1940 - 2, यानी 1938, दूसरी 1938 - 2, 1936 में और सबसे पहले 1936 - 2, यानी 1934 में।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""यानी मुत्तज्जी की शादी - 1932 में हुई थी, " पुट्टी ने कहा।"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""जरूरी तो नहीं," पुट्टा ने कहा, "क्योंकि मुत्तज्जी ने यह तो नहीं कहा कि उनका पहला बच्चा, उनकी शादी के 2 साल बाद पैदा हुआ था। उन्होंने तो बस यह कहा कि जिस साल उनकी शादी हुई उसी साल मैसूर में एक बांध बनाया गया था।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""शायद इससे तुम्हें कुछ मदद मिले, बच्चों," अज्जी बोलीं। वह सब के लिए मुत्तज्जी की मनपसंद सेवईं की खीर से भरी कटोरियाँ लेकर आईं थीं। "के आर एस का मतलब है कृष्ण राजा सागर बांध, और उसके पास में ही हैं वृन्दावन गार्डन्स। याद है न, हम पिछले साल वहाँ संगीत की धुन के साथ चलने वाले फव्वारे देखने गए थे?""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"लाइब्रेरी में पुट्टी को मैसूर के इतिहास के बारे में एक किताब मिली।"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""यह देखो!" उसने फुसफुसा कर कहा, " 'मैसूर की 2 सबसे मशहूर जगहों, के आर एस बांध और उसके पास बने वृन्दावन गार्डन्स, को 1932 में जनता के लिए खोला गया था।' ""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"दोनों भाई - बहन मुस्कराए। इसका मतलब यह कि मुत्तज्जी की शादी सचमुच ही 1932 में हुई थी। 84* साल पहले!"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"पुट्टा ने कहा, "उन्होंने बताया था कि जब उनके बम्बई वाले अंकल ने उनको साफ रेलगाड़ी के बारे मे बताया था तब वह 9 -10 साल की थीं। अज्जा शायद इस बारे में जानते होंगें।”"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"अज्जा अपने रीडिंग रूम में थे। पुट्टी ने धीमे से कहा, "अज्जा, क्या पहले लोग रेल में सफर करते हुए गंदे हो जाते थे?""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"उसने झटपट भारतीय रेलवे पर एक किताब निकाली और उसमें दिखाते हुए कहा, "देखो, इसमें लिखा है कि भारत में सबसे पहले इलेक्ट्रिक ट्रेन आई थी, 1925 में बंबई में।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""यह तय करने के लिये," पुट्टा बोला, "हमें पता लगाना होगा कि दिल्ली में राजा ओर रानियों की जो शाही दावत हुई थी, और जो मुत्तज्जी के पैदा होने से 5 साल पहले हुई थी, वो 1911** के आसपास हुई या नहीं।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"अज्जा सोचने लगे, "1911... यह तारीख़ इतनी जानी-पहचानी सी क्यो लग रही है? आह! हाँ, उसी साल तो बम्बई में गेटवे ऑफ़ इंडिया बनाया गया था। और वह तो भारत पर राज करने वाले ब्रिटिश राजा, जॉर्ज (पंचम) के स्वागत में बनवाया गया था। और तब एक नहीं, बल्कि कई बड़ी-बड़ी दावत हुई होंगी!" अज्जा ने ख़ुश होते हुए कहा।"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
""इस उम्र में भी मेरी याददाशत काफी अच्छी ।""
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"याद है इस कहानी में मूताजी ने कितनी सारी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओ के बारे में बताया था? यह सारी घटनाए असल में हुईं थीं। तो चलो इनके बारे में थोड़ा और जानते हैं!"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"महाराजा महारानी की शानदार दावत (1911) – 1911 में ब्रिटेन के महाराजा जॉर्ज (पंचम) और उनकी पत्नी क्वीन मैरी, भारत में पहली बार आए थे, तब उन्होने 400 से ज्यादा भारतीय महाराजा और महारानियों के लिए एक शाही दावत दी थी, जिसे कहा गया था दिल्ली दरबार। इसमे आए 200,000 मेहमानों की दावत के लिए कई बेकरियों में हर दिन 20000 से ज्यादा ब्रैड बनाई गयी थी और 1000 से ज़्यादा कैटल और बकरों को काटा गया था! बादशाह ने कई भारतीय राजाओं को सोने के मेडल (तमगे) भी दिये थे, जिनमे मैसूर के महाराजा कृष्णराजा वाडियार (चतुर्थ) भी शामिल थे!"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"बांध जिसने कावेरी को बांधा (1932) – दक्षिणी कर्नाटक और तमिलनाडू में कावेरी नदी बहती है। इस नदी की वजह से पूरा मैसूर बहुत उपजाऊ था। लेकिन, दूसरी नदियों की तरह, मानसून के दौरान, इसमे बाढ़ आ जाती थी और गर्मी के समय, यह सूख जाती थी। लेकिन इस नदी के उपर एक बांध बनने के साथ ही एक जबर्दस्त बदलाव आ गया। और कृष्ण राजा सागर (के आर एस) रिसर्वोयर का निर्माण हुआ। आज भी इसी रिसर्वोयर से पूरे बंगलोर शहर को पीने का पानी मिलता है।"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"गांधीजी का भाषण (1 942 ) - 8 अगस्त 1942 के दिन, बंबई के ग्वालिया टँक मैदान में गांधीजी ने 'भारत छोड़ो भाषण' दिया था। गांधीजी ने लोगों से कहा कि उन्हे अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ लड़ना होगा। इसके लिए उन्हे हिंसा नहीं, बल्कि उनके साथ असहयोग करना होगा। इसके 5 साल बाद, 15 अगस्त, 1947 को अंग्रेज़ो का शासन खत्म हुआ और भारत आज़ाद हुआ। आज उसी शांत क्रांति की स्मृति में ग्वालिया टैंक मैदान को अगस्त क्रांति मैदान कहा जाता है !"
मुत्तज्जी की उम्र क्या है?
"धनी को पता था कि आश्रम में कोई बड़ी योजना बन रही है, पर उसे कोई कुछ न बताता। “वे सब समझते हैं कि मैं नौ साल का हूँ इसलिए मैं बुद्धू हूँ। पर मैं बुद्धू नहीं हूँ!” धनी मन-ही-मन बड़बड़ाया।"
स्वतंत्रता की ओर
"धनी और उसके माता-पिता, बड़ी ख़ास जगह में रहते थे। अहमदाबाद के पास, महात्मा गाँधी के साबरमति आश्रम में-जहाँ पूरे भारत से लोग रहने आते थे। गाँधी जी की तरह, वे सब भी भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे। जब वे आश्रम में ठहरते तो चरखों पर खादी का सूत कातते, भजन गाते और गाँधी जी के व्याख्यान सुनते।"
स्वतंत्रता की ओर
"साबरमति में सबको कोई न कोई काम करना होता-खाना पकाना, बर्तन धोना, कपड़े धोना, कुएँ से पानी लाना, गाय और बकरियों का दूध दुहना और सब्ज़ी उगाना। धनी का काम था-बिन्नी की देखभाल करना। बिन्नी, आश्रम की एक बकरी थी। धनी को अपना काम पसन्द था क्योंकि बिन्नी उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी। धनी को उससे बातें करना अच्छा लगता था।"
स्वतंत्रता की ओर
"उस दिन सुबह, धनी बिन्नी को हरी घास खिला कर, उसके बर्तन में पानी डालते हुए बोला, “कोई बात ज़रूर है बिन्नी! वे सब गाँधी जी के कमरे में बैठकर बातें करते हैं। कोई योजना बनाई जा रही है। मैं सब समझता हूँ।“"
स्वतंत्रता की ओर
"बिन्नी ने घास चबाते हुए सर हिलाया, जैसे कि वह धनी की बात समझ रही थी। धनी को भूख लगी। कूदती-फाँदती बिन्नी को लेकर वह रसोईघर की तरफ़ चला। उसकी माँ चूल्हा फूँक रही थीं और कमरे में धुआँ भर रहा था।"
स्वतंत्रता की ओर
"धनी बिन्नी को खींच कर ले गया और पास के नीबू के पेड़ से बाँध दिया। फिर बिन्दा ने उसे यात्रा के बारे में बताया। गाँधी जी और उनके कुछ साथी गुजरात में पैदल चलते हुए, दाँडी नाम की जगह पर समुद्र के पास पहुँचेंगे। गाँवों और शहरों से होते हुए पूरा महीना चलेंगे। दाँडी पहुँच कर वे नमक बनायेंगे।"
स्वतंत्रता की ओर
"”नमक?“ धनी चौंक कर उठ बैठा, ”नमक क्यों बनायेंगे? वह तो किसी भी दुकान से खरीदा जा सकता है।“
”हाँ, मुझे मालूम है।“ बिन्दा हँसा, ”पर महात्मा जी की एक योजना है। यह तो तुम्हें पता ही है कि वह किसी बात के विरोध में ही यात्रा करते हैं या जुलूस निकालते हैं, है न?“"
स्वतंत्रता की ओर
"”लेकिन यह तो सरासर नाइंसाफ़ी है!“ धनी की आँखों में गुस्सा था।"
स्वतंत्रता की ओर
"”क्योंकि, यदि वे इस लम्बी यात्रा पर दाँडी तक पैदल जायेंगे तो यह खबर फैलेगी। अखबारों में फ़ोटो छपेंगी, रेडियो पर रिपोर्ट जायेगी!
और पूरी दुनिया के लोग यह जान जायेंगे कि हम अपनी स्वतंत्रता के लिये लड़ रहे हैं। और ब्रिटिश सरकार के लिये यह बड़ी शर्म की बात होगी।“"
स्वतंत्रता की ओर
"दोपहर को जब आश्रम में थोड़ी शान्ति छाई, धनी अपने पिता को ढूँढने निकला। वह बैठ कर चरखा चला रहे थे।"
स्वतंत्रता की ओर
"गाँधी जी बड़े व्यस्त रहते थे। उन्हें अकेले पकड़ पाना आसान नहीं था। पर धनी को वह समय मालूम था जब उन्हें बात सुनने का समय होगा-रोज़ सुबह, वह आश्रम में पैदल घूमते थे।"
स्वतंत्रता की ओर
"अगले दिन जैसे सूरज निकला, धनी बिस्तर छोड़ कर गाँधी जी को ढूँढने निकला। वे गौशाला में गायों को देख रहे थे। फिर वह सब्ज़ी के बगीचे में मटर और बन्दगोभी देखते हुए बिन्दा से बात करने लगे। धनी और बिन्नी लगातार उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।"
स्वतंत्रता की ओर
"अन्त में, गाँधी जी अपनी झोंपड़ी की ओर चले। बरामदे में चरखे के पास बैठ कर उन्होंने धनी को पुकारा, ”यहाँ आओ, बेटा!“ धनी दौड़कर उनके पास पहुँचा। बिन्नी भी साथ में कूदती हुई आई।"
स्वतंत्रता की ओर
"”बिल्कुल सही। तो क्या तुम आश्रम में रह कर मेरे लिये बिन्नी की देखभाल करोगे?“ गाँधी जी प्यार से बोले।"
स्वतंत्रता की ओर
"1. मार्च 1930 में महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाये नमक कर के विरोध में दाँडी तक की यात्रा का नेतृत्व किया। गाँधी जी और उनके अनुयायी, गुजरात में 24 दिन तक पैदल चले। पूरे रास्ते उनका स्वागत फूलों और गीतों से हुआ। विश्व भर के अखबारों ने यात्रा पर खबरें छापीं।"
स्वतंत्रता की ओर
"2. दाँडी में गाँधी जी और उनके साथियों ने समुद्र तट से नमक उठाया और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ़्तारी के बाद असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ और पूरे भारत में लोगों ने स्कूल, कॉलेज व दफ़्तरों का बायकॉट किया।"
स्वतंत्रता की ओर
"3. इस यात्रा में गाँधी जी के साथ 78 स्वेच्छा कर्मियों (वालंटियरों) ने भाग लिया। उन्होंने 385 किलोमीटर की दूरी तय की।"
स्वतंत्रता की ओर
"5. सन 2005 में दाँडी यात्रा की 75 वीं जयंती थी।"
स्वतंत्रता की ओर
"साल 1870 का था। स्थान न्यू लंदन, कनेक्टिकट, यूनाइटेड स्टेट्स; सुबह सात बजे बच्चे बिस्तर से कूदे, उनकी माँओं ने उन्हें दाँत साफ़ करने की जल्दी मचाई, उनके हाथ में दातुन (टूथस्टिक) और टूथपेस्ट के मर्तबान दिए।"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"क्या? क्या मैंने अभी कहा - 'दातुन'? हाँ, बिलकुल सही! 1870 ई. में वे अपने दाँत साफ़ करने के लिए दातुन का उपयोग करते थे। दातुन एक पतली टहनी को तोड़कर बनाया गया टुकड़ा था जिसका अंतिम सिरा अस्त-व्यस्त सा था। कुछ भाग्यशाली बच्चों के पास दातुन के एक सिरे पर जंगली सूअर के बाल लगे होते थे, जिससे उसमें अलग चमक आती थी।"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"और दूसरी चीज़ मैंने क्या कही थी? 'टूथपेस्ट के मर्तबान?' बिलकुल सही! टूथपेस्ट के लिए ट्यूब नहीं बना था। वे केवल मर्तबान में मिलते थे। और खुमारी भरी आँख लिए बच्चे अपने दिन की शुरुआत टूथपेस्ट से भरे चीनी मिट्टी के मर्तबान में दातुन डुबाकर करते थे।"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"दरअसल, टूथपेस्ट भरे उसी चीनी मिट्टी के मर्तबान में घर के सभी सदस्य अपना दातुन डुबाते थे। यहाँ तक कि उनकी बूढ़ी चाची भी, जिनके पीले और काले दाँत उनके दातुन से मेल खाते थे।"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"यह डॉ. शेफील्ड का बेटा ल्यूसियस था, जिसने अब अपने दातुन को टूथपेस्ट के मर्तबान में डुबाने से इनकार कर दिया और फैसला किया कि वह आगे से दंतमंजन का उपयोग करेगा। लेकिन एक विचार उसके दिमाग में घूमता रहा - टूथपेस्ट के उपयोग का इससे बेहतर कोई तो तरीक़ा होगा!"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"क्या तुमने कभी बुरी सुबह बिताई है, जब तुमने आधी नींद में बहुत सारा पेस्ट फैला दिया हो और अचानक से जगे, क्योंकि पूरा सिंक पेस्ट से भरा था और माँ याद दिला रही थी कि 20 मिनट में स्कूल बस दरवाज़े पर आ जाएगी। उस समय तुम यही चाह रहे होगे कि माँ वह सब साफ़ कर दे जो तुमने गंदा किया।"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"आज टूथपेस्ट मशीन से भरी जाती है। सभी ढक्कन लगे खाली ट्यूब नीचे सिरे से क़तार में कन्वेयर बेल्ट से लगे आगे बढ़ते हैं जिनका दूसरा सिरा ऊपर की तरफ़ खुला होता है। एक बड़े बर्तन में टूथपेस्ट भरा होता है जो कन्वेयर बेल्ट के साथ लगा होता है।"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"बर्तन के निचले हिस्से में लगे नल से घूमते कन्वेयर बेल्ट के साथ हरएक खाली ट्यूब भरता जाता है। लेकिन पेस्ट उनके सिरे तक नहीं भरा जाता, इन्हें आधा इंच खाली रखा जाता है ताकि अच्छी तरह बंद किया जा सके। अब ट्यूब दबाकर निकालने के लिए तैयार है।"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"● कारखाने में ब्रश तैयार होने के बावजूद बहुत से लोग नीम या बबूल की पतली टहनी से दातुन करते हैं। दातुन हमारे दाँतों और मसूड़ों को स्वस्थ रखते हैं, मगर क्या तुम जानते हो कि विश्व में सबसे अच्छा ब्रश कौन सा है? तुम्हारी उंगली! दंत-चिकित्सक मानते हैं कि यह दाँतों और मसूड़ों के लिए सबसे बेहतर है।"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"● रेशे वाले फल और सब्जियाँ खाने से दाँत मज़बूत होते हैं, जैसे कि सेब, गाजर, दाँत साफ़ रखने में सहायक हैं।"
टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर कैसे आया?
"टूका, पोई और इंजी, एक साथ टहलते हुए, सिर झुकाए, चमकती सड़क और उसके किनारों में, घास में और काई से ढकी चट्टानों पर कुछ मज़ेदार चीजों को ढूंढने में लगे रहते हैं। लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा मज़ा बीजों को इकट्ठा करने में आता है।"
आओ, बीज बटोरें!
"टूका और पोई सोनपंखी की तरह दिखने वाले चमकीले लाल बीज, कपड़ों में चिपक जाने वाले गोखरू और पीले गुलमोहर की बड़ी आकार वाली फलियाँ इकट्ठी करते हैं।"
आओ, बीज बटोरें!
"जोश में आकर इंजी"
आओ, बीज बटोरें!
"“क्या सारे बीज इमली के पेड़ ही बनते हैं?“ पोई ने पूछा और याद करने की कोशिश की कि घर में उसके पास कितने तरीके के बीज थे।“अरे नहीं! बीजों से तो कई प्रकार की जीवंत चीज़ें विकसित होती हैं,“ पच्चा ने उत्तर देते हुए कहा।"
आओ, बीज बटोरें!
"“क्या तुम्हारे पास बैग में कोई फल है?“ पच्चा ने पूछा। टूका ने अपने बैग से एक छोटा, लाल सेब और एक नरम केला निकाला।"
आओ, बीज बटोरें!
"पच्चा ने समझाया, “तुम इस सेब को खाना शुरू करो जब तक कि इसके बीच वाले हिस्से तक न पहुँच जाओ। सेब के बीच में तुम्हे छोटे-छोटे भूरे रंग के बीज दिखेंगे।“"
आओ, बीज बटोरें!
"पच्चा ने समझाते हुए बताया, “बीज सभी आकृति और आकार के होते हैं।“ इंजी सेब का बचा हुआ हिस्सा खाने में जुटा था। “क्या ये सभी पेड़ों के बच्चे हैं?" पोई ने पूछा।"
आओ, बीज बटोरें!
"“हां! और हर बीज में अंदर एक नन्हा पौधा होता है जो बाहर आने का इंतजार करता रहता है और दुनिया देखना चाहता है,“ पच्चा ने कहा।"
आओ, बीज बटोरें!
"नारियल के पेड़ की पत्तियां कितनी सुडौल थीं, ऐसा लग रहा था कि हवा में नाच रही हों। नीले-नीले आसमान में लाल गुलमोहर के फूल कितने निराले लग रहे थे। सुंदर सी खुरदुरी छाल वाला आम का पेड़ कितना अच्छा लग रहा था।"
आओ, बीज बटोरें!
"अब भी टूका, पोई और इंजी हर शाम स्कूल के बाद मिलते हैं। लेकिन अब, टूका और पोई, उन चीजों को इक्ट्ठा करते हैं जिनमें वे पौधे उगा सकें। पुराने जूते, नारियल का कवच, यहां तक कि पानी की पुरानी बोतलें – सब कुछ, जिन्हें गमले के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।"
आओ, बीज बटोरें!
"हैलो! मेरा नाम पच्चा है, मैं एक इमली का पेड़ हूँ। लेकिन मेरे और भी कई नाम हैं। हिंदी में मुझे इमली, तमिल में पुली और बंगाली में तेंतुल कहा जाता है। वैज्ञानिक मुझे, टैमरिंडस इंडिका कहते हैं। चलिए मैं आपको अपने कुछ अन्य बीज मित्रों से मिलवाता हूँ। शायद उनमें से कईयों को आपने अपने भोजन की थाली में ज़रूर देखा होगा।"
आओ, बीज बटोरें!
"मिर्च हर आकार, रूप और रंग की होती हैं और पूरे विश्व में इनका उत्पादन होता है। इसके बीज छोटे, गोल और चपटे होते हैं और इनका इस्तेमाल दाल या भाजी में चटपटापन लाने के लिए किया जाता है। जब आप इन्हें छुएं तो सावधान रहें, ये आपकी उंगलियों में जलन पैदा कर सकतीं हैं।"
आओ, बीज बटोरें!
"कॉफी के बारे में तो आप सभी जानते होंगे, जिसे आपके मम्मी-पापा हर सुबह पीते हैं? ये कॉफी बैरीज़ से बनती है। बैरीज़ से मिलने वाले दानों को सुखाकर, भूनकर और पीसकर पाउडर बना दिया जाता है। दक्षिण भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में कॉफी के बागान हैं।"
आओ, बीज बटोरें!
"बैरीज़, सेब, केला, तरबूज और कटहल - इन सभी फलों में बीज होता है। कुछ बीजों को हम खा नहीं सकते हैं जैसे कि आम की गुठली। लेकिन कई बीज; जैसे कटहल के बीज; इन्हें पानी में भिगोने के बाद सब्ज़ी बनाकर खाए जा सकते हैं।"
आओ, बीज बटोरें!
"कठोर भूरे रंग के नारियल का हर हिस्सा हमारे लिए उपयोगी होता है। उसके बाहर वाले बालों के हिस्से से रस्सी बनाई जाती है, वहीं अंदर का नरम सफेद हिस्सा कई प्रकार के भोजन में इस्तेमाल किया जाता है और नारियल पानी मज़ेदार पेय होता है, विशेषरूप से उस समय, जब बाहर बहुत गर्मी होती है। क्या आपको मालूम है कि आप अपने बालों में जो तेल लगाते हैं, वो कहां से आता है? वह तेल भी नारियल से ही निकाला जाता है।"
आओ, बीज बटोरें!
"सभी पौधों को मिट्टी से बहुत प्रेम होता है, लेकिन मूंगफली को धरती से ज्यादा ही प्यार है, इसी कारण ये जमीन के अंदर ही बढ़ती हैं। इसके छोटे-छोटे दाने खाने में बेहद पौष्टिक और स्वादिष्ट होते हैं। इन दानों को कच्चा, उबालकर और भूनकर खाया जाता है।"
आओ, बीज बटोरें!
"चावल सामान्य नाम: राइस या चावल। वैज्ञानिक मुझे कहते हैं: ऑरिज़ा सटाईवा। चावल, सबसे लोकप्रिय अनाजों में से एक है। जहां तक मुझे मालूम है, भारतीय घरों में अन्य अनाजों की तुलना में चावल सबसे ज़्यादा खाया जाता है। जब चावल पौधे पर लगा होता है तो उसके दानों पर जैकेट की तरह एक खुरदुरा, भूरे रंग का छिलका होता है जिसके कारण इसके दाने अंदर सुरक्षित और साबुत बने रहते हैं।"
आओ, बीज बटोरें!
"सामान्य नाम: चॉकलेट। वैज्ञानिक मुझे कहते हैं: थियोब्रोमा ककाओ (जिसका अर्थ होता है - देवताओं का भोजन) इसमें कोई संदेह नहीं है कि चावल सबसे लोकप्रिय अनाज है लेकिन ककाओ भी लोगों की खास पसंद है – खासकर टूका और पोई की। चॉकलेट ककाओ के बीजों से बनती है। हर ककाओ फल में 30-50 बीज होते हैं जिन्हें भूना जाता है और फिर पीसकर, चीनी व दूध में मिलाकर स्वादिष्ट चॉकलेट बार बनाया जाता है।"
आओ, बीज बटोरें!
"आकाश में बड़े-बड़े काले बादल घिर आए हैं और मुझे उनकी गड़गड़ाहट भी सुनाई दे रही है। शीघ्र ही मानसून आने वाला है। इसे वर्षा ॠतु कहते हैं। मुझे बारिश से भीगी मिट्टी की सौंधी महक बहुत अच्छी लगती है। लम्बी गर्मियों के बाद मिट्टी भी बारिश की बूँदों की राह देखती है। मुझे ऐसा ही लगता है।"
गरजे बादल नाचे मोर
"बारिश से ज़मीन पर तरह-तरह के नमूने बन जाते हैं। मेरे चाचा ने वर्षा का पानी एकत्रित करने के लिए कई जगह बालटियाँ और ड्रम रखे हैं। परनालों से छत का पानी इन ड्रमों में गिरता है। मैं इन्हें झरना कहती हूँ!"
गरजे बादल नाचे मोर
"बनारस वाली शुभा मौसी ने मुझे कुछ सुंदर गीत सिखाए हैं। इन गीतों को कजरी कहते हैं। क्या आपको मालूम है कि सम्राट अकबर के दरबार में एक प्रसिद्ध गायक थे मियाँ तानसेन? कहा जाता है कि वो “मियाँ की मल्हार” नाम का एक राग गाते थे तो वर्षा आ जाती थी। मैं भी संगीत सीखूँगी-शास्त्रीय संगीत।"
गरजे बादल नाचे मोर
"स्कूल से घर लौटते हुए रास्ते में, मैं वर्षा से भीग गई, पर बड़ा मज़ा आया। हमारे घर के पास वाले खेत में मोर नाच रहे थे। लेकिन वो
तो भीग नहीं रहे थे!"
गरजे बादल नाचे मोर
"हम सभी वर्षा की प्रतीक्षा करते हैं पर किसान तो वर्षा के देवताओं की पूजा करते हैं।
मानसून में मेरा आम का पौधा काफी लम्बा हो गया है। अब मुझे उसे सींचने की ज़रूरत नहीं पड़ती! पिछले महीने जब बड़ी तेज़ आँधी चली थी, मेरा पौधा मज़बूती से खड़ा रहा। क्या मेरा आम का पेड़ इस पेड़ के जितना बड़ा हो जायेगा?"
गरजे बादल नाचे मोर
"छोटी गिलहरियाँ मेरे बालों में लुका-छिपी खेलने में लगी थीं।”"
तारा की गगनचुंबी यात्रा
"“संयोग से वहाँ आकाश में एक बैंगनी विमान उड़ता दिखाई दिया।"
तारा की गगनचुंबी यात्रा
"“यही कारण है कि मुझे घर आने में देर हुई, माँ!”"
तारा की गगनचुंबी यात्रा
"ट्रेन रुकी देवास में, बोलो एक साँस में ।"
बोलो एक साँस में
"कूदा कोई कपास में, तो क्या बोलें एक साँस में ?"
बोलो एक साँस में
"और दिमाग में तरह-तरह की बातें आने लगी हैं।"
क्या होता अगर?
"मैंने पाया कि मैं वहीं खड़ा हूँ ब्रश हाथ में लिए।"
क्या होता अगर?
"मैं मुस्कराया। सपनों की दुनिया के बारे में सोच कर मज़ा आ रहा है।"
क्या होता अगर?
"मछली पानी में रहती है।"
जीव-जन्तुओं के घर
"मेंढक पानी में और ज़मीन पर भी रह सकते हैं।"
जीव-जन्तुओं के घर
"नीचे बिलों में रहते हैं।"
जीव-जन्तुओं के घर
"भालू और भेड़िये गुफ़ाओं में रहते हैं।"
जीव-जन्तुओं के घर
"मगरमच्छ दलदल में रहते हैं।"
जीव-जन्तुओं के घर
"हिरण जंगलों में रहते हैं,"
जीव-जन्तुओं के घर
"जंगल में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।"
अरे, यह सब कौन खा गया?
"जब हाथी जंगल में अपना पेट खाली करता है,"
अरे, यह सब कौन खा गया?
"हर दिन, उसके पिता अन्य पक्षियों को पकड़ने में मदद करने के लिए एक पक्षी को जंगल में ले जाते हैं।"
बंटी और उसके गाते हुए पक्षी
"बंटी और उसके पिता पक्षियों को जंगल में ले जाते हैं और उन्हें मुक्त करते हैं।"
बंटी और उसके गाते हुए पक्षी
"तालाब की मछलियों में थी दोस्ती प्यारी"
सूरज का दोस्त कौन ?
"दिन में मैं और रात में तुम,"
सूरज का दोस्त कौन ?
"मिलकर करेंगे आसमान में उजाला"।"
सूरज का दोस्त कौन ?
"अचानक कॉकपिट से *टीटीटी* जैसी आवाज़ आई। यह क्या आवाज़ थी? कहीं जेट शत्रु देश की सीमा में तो नहीं? या इंजन में कोई तकनीकी गड़बड़ी?"
राजू की पहली हवाई-यात्रा
""आज मैं पहली बार हवाई जहाज़ में यात्रा करूँगा!""
राजू की पहली हवाई-यात्रा
"राजू पहली बार हवाई-अड्डे के अंदर आया था। उस चौड़े-बड़े से पट्टे पर रखने में अम्मा की मदद की जो सामान को एक मशीन के अंदर ले जा रहा था।"
राजू की पहली हवाई-यात्रा
"इसे अंग्रेजी में कन्वेयर बेल्ट कहते हैं। वर्दी पहने हुई, एक बहुत कठोर दिखने वाली महिला, मशीन के पीछे रखी स्क्रीन में देख कर सामान की जाँच कर रही थी। राजू स्क्रीन को देखकर हैरान रह गया। स्क्रीन में तो अटैची के साथ-साथ उसमें रखा सामान भी दिख रहा था।"
राजू की पहली हवाई-यात्रा
""इस मशीन में तो एक्स-रे दृष्टि है! बिलकुल कप्तान राजू जैसी... आर-पार देखने वाली।" राजू आश्चर्यचकित था।"
राजू की पहली हवाई-यात्रा
""वह महिला अफ़सर सुरक्षा जाँच टीम की सदस्य है। उन्हें इस बात का ध्यान रखना होता है कि कोई भी यात्री अपने सामान में विस्फोटक या चाक़ू जैसी ख़तरनाक चीज़ें न ले जा पाए। हमें उनके काम में बाधा नहीं डालनी चाहिए।""
राजू की पहली हवाई-यात्रा
"आखिरकार राजू एक बड़े से हॉल में पहुँचा जिसकी दीवारे काँच की थीं। वह बाहर खड़े बहुत सारे हवाई जहाज़ देख पा रहा था।एक हवाई जहाज़ उड़ान भरने को तैयार था।"
राजू की पहली हवाई-यात्रा
""चेची कितनी किस्मत वाली है। वह कितने हवाई-जहाज़ों में घूम चुकी है। मुझसे बड़े होने तक का इंतज़ार नहीं होता, अम्मा।""
राजू की पहली हवाई-यात्रा
"तभी राजू ने देखा कि लोग गेट नंबर 8 के पास एक कतार में खड़े हो रहे हैं। "वह हमारा गेट है अम्मा। जहाज़ पर चढ़ने का समय हो गया।""
राजू की पहली हवाई-यात्रा
"अचानक थरथराहट बंद हुई और जहाज़ हवा में उड़ने लगा।"
राजू की पहली हवाई-यात्रा
"तभी स्पीकर में से एक आवाज़ आई… जानी-पहचानी आवाज़।"
राजू की पहली हवाई-यात्रा
""देवियों और सज्जनों, मैं हूँ आपकी कप्तान आर्या। विमान में आपका स्वागत है।""
राजू की पहली हवाई-यात्रा
"एक छोटी लड़की कमरे में आती है। इसका नाम मीनू है।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"फूल,जंतुओं के चित्र या आकृति में गिनती छिपी रहती है, या गिनती से इनको बना सकते हैं।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"गुड़हल (जवाकुसुम) के फूल में तंतु होते हैं, जो संख्या एक जैसे होते हैं।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"बांग्ला भाषा में एक ১"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"बांग्ला भाषा में संख्या दो ২ द्वितीय"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"बांग्ला भाषा में संख्या तीन ৩ भेड़ के सींग जैसा है।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"बांग्ला भाषा में संख्या चार ৪ है।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"बांग्ला भाषा में संख्या पांच ৫ है।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"बांग्ला भाषा में संख्या छह ৬ है।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"बांग्ला भाषा में संख्या सात ৭ है।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"संख्या आठ से पानी में तैरती बत्तख बनती है।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"बांग्ला भाषा में संख्या आठ ৮ है।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
"बांग्ला भाषा में संख्या नौ ৯ है।"
कितनी मज़ेदार है बांग्ला संख्याएं
""माँ, मुझे पार्क में लाने के लिए शुक्रिया।""
टुमी के पार्क का दिन
"खेलों के मैदान में, मैं एक गेंद के रूप में हूं, और कई और खेल मैं भी!"
ग़ोलू एक ग़ोल कि कहानी
"“नहीं, प्यारे बेटे! आज बारिश नहीं होगी। नन्हे सफ़ेद बादल आसमान में बहुत ऊँचाई पर हैं,” माँ बोलीं।"
लाल बरसाती
"“हाँ, हो सकती है, मेरे प्यारे बेटे! आज आसमान में कुछ काले बादल नीचे उतर आए हैं।”"
लाल बरसाती
"और फिर सच में बारिश होने लगी।"
लाल बरसाती
"मिस मीरा अपने कामों में व्यस्त हैं, इसलिए उन्होंने बच्चों को उनका मनपसंद काम सौंपा है, और वो है अपने आप खेलना। स्टेल्ला और परवेज़ को बोर्ड पर चित्र बनाने में बड़ा मज़ा आ रहा है।"
कोयल का गला हुआ खराब
"जल्दी ही सारे सहपाठी भी जुट जाते हैं गले में खिचखिच वाली कोयल को ढूँढने में।"
कोयल का गला हुआ खराब
"अब तो सबको देखनी है गले में खिचखिच वाली चिड़िया।"
कोयल का गला हुआ खराब
"परवेज़ के पेट में भूख नाम का भूत शोर मचाने लगा था।"
कोयल का गला हुआ खराब
"“म्मम्म... पपाआ... ठ... ठा!” बड़ा सा कौर मुँह में भरकर परवेज़ ने बोला।"
कोयल का गला हुआ खराब
"उन्होंने छोटी सी मशीन परवेज़ की कमीज़ की जेब से निकालकर उसके कान में लगा दी।"
कोयल का गला हुआ खराब
"तभी उसके कानों में कहीं से हलकी सी कोयल की आवाज़ सुनाई दी।"
कोयल का गला हुआ खराब
"“कू-ऊऊऊऊह-ऊऊऊऊह। परवेज़ दादी को उस गला खराब वाली कोयल के बारे में बताता है। दोनों चलकर सुकर्ण स्कूल पहुँचते हैं जहाँ बधिर बच्चे पढ़ते हैं।"
कोयल का गला हुआ खराब
"“स्स्स्टेल्ला, मैंने क्क्कोयल को सससुना!” एक बार में एक एक शब्द बोला उसने।"
कोयल का गला हुआ खराब
"स्टेल्ला ने अपने दोनों हाथ हवा में हिलाए। इसका मतलब हुआ कि वो ताली बजा रही थी। परवेज़ ने संकेत भाषा के कई शब्द उसे सिखा दिए थे जो उसकी शीला मिस ने सुकर्ण स्कूल में सिखाये थे।"
कोयल का गला हुआ खराब
"- जो लोग पूरी तरह से बधिर होते है, वो कुछ भी नहीं सुन सकते। परवेज़ आँशिक रूप से नहीं सुन सकता है। इसलिए उसे शीला मिस जैसी एक विशेष शिक्षक की ज़रूरत है जो उसे संकेत की भाषा, होंठों को पढ़ने और संवाद करने के अन्य तरीके सीखने में मदद कर सके।"
कोयल का गला हुआ खराब
"- कुछ बच्चे चश्मा लगाते हैं ताकि वे अच्छी तरह से देख सकें, ठीक वैसे ही परवेज़ सुनने की मशीन लगाता है ताकि उसे सुनने में आसानी हो। उसे अपनी मशीन को लेकर थोड़ा सचेत रहने की ज़रूरत है।"
कोयल का गला हुआ खराब
"आज घूम-घूम बड़े जोश में थी। वह पहली बार तैरने जाने वाली थी।"
घूम-घूम घड़ियाल का अनोखा सफ़र
"ऊदबिलाव बोला, "नहीं, लेकिन मैंने आसमान में बहुत सारे तारे टिमटिमाते ज़रूर देखे हैं। तुम्हें देखने हैं?""
घूम-घूम घड़ियाल का अनोखा सफ़र
"* डाॅल्फ़िन को हिन्दी में 'सूंस' कहते हैं।"
घूम-घूम घड़ियाल का अनोखा सफ़र
""क्या आप मेरे परिवार को ढूँढने में मदद कर सकते हैं घोंघा मामा?" घूम-घूम ने पूछा।"
घूम-घूम घड़ियाल का अनोखा सफ़र
"वह तुम्हें सब जगह ढूँढ रहे थे छुटकी! सुनो, नदी में आगे कुछ दूरी पर तुम्हें सब मिल जाएँगे। ध्यान से सुनो, उनकी आवाज़ें भी सुनाई दे रही हैं।""
घूम-घूम घड़ियाल का अनोखा सफ़र
"घूम-घूम गंगा नदी में अपने बड़े से घड़ियाल परिवार के साथ रहती है जो दिन भर पानी में छपाके मार-मार कर शोर मचाता रहता है। वह रोज़ खाने के लिए मछलियों और कीड़े-मकोड़ों की तलाश में निकल जाती है। रोज़ ही घूम-घूम की मुलाकात तरह-तरह के जीवों से होती है। घोंघे, ऊदबिलाव, डॉल्फ़िन, मछुआरे, माँझी, बगुले, सारस, भैंस, साँप और कई दूसरे जीव उसे मिलते हैं।"
घूम-घूम घड़ियाल का अनोखा सफ़र
"इस पृष्ठ पर और अगले पृष्ठ पर चित्रों में तुम घूम-घूम के कितने दोस्तों को पहचान सकते हो?"
घूम-घूम घड़ियाल का अनोखा सफ़र
""पूरी कक्षा सिर पर उठा रखी है," स्कूल में मैडम कहतीं।"
सत्यम, ज़रा संभल के!
"खेत घर से बहुत दूर है। रास्ते में पड़ते हैं खेत, टेढ़ी–मेढ़ी पगडंडियाँ, घना जंगल और कलकल-छलछल बहते झरने भी।"
सत्यम, ज़रा संभल के!
"सत्यम ख़रगोश की तरह फुदका, उसने हिरण की तरह कुलाँचें भरीं... "अरे! संभल कर! कीचड़ में फिसल मत जाना," माँ ने कहा।"
सत्यम, ज़रा संभल के!
""गहरे पानी में मत जाना बेटा," माँ ने होशियार किया।"
सत्यम, ज़रा संभल के!
"उसने मन ही मन सोचा कि मैं चील की तरह आसमान में उड़ रहा हूँ - बादलों पर तैर रहा हूँ, बिना पँख फड़फड़ाए!"
सत्यम, ज़रा संभल के!
"सपने में सत्यम दौड़ा और कूदा और घूमा और उसने कलामुंडियाँ खाईं..."
सत्यम, ज़रा संभल के!
"हमारी ही तरह वह भी ज़्यादातर बढ़िया खाने और रहने की आरामदेह जगह या प्यार करने वाले परिवार की तलाश में एक से दूसरी जगह घूमते-फिरते हैं। कभी-कभी वे अपने उन दुश्मनों से बचने के लिए भी घूमते-फिरते हैं जो उन्हें पकड़ कर खा सकते हैं।"
सत्यम, ज़रा संभल के!
"ज़मीन पर रहने वाले जीवों में चीते सबसे ज़्यादा तेज़ी से दौड़ते हैं। वह फर्राटे भी लगाते हैं। क्या आप फर्राटे लगा सकते हैं?"
सत्यम, ज़रा संभल के!
"टिड्डे अपने आकार की तुलना में कई ज़्यादा ऊँची कुदान मार सकते हैं। ख़ासतौर से तब, जब वह किसी शिकार करने वाले जीव की पकड़ में आने से बचना चाहते हों। क्या आप इतनी ऊँची कुदान मार सकते हैं?"
सत्यम, ज़रा संभल के!
"ख़ुमारी में दुबकी हुई थी।"
एक सौ सैंतीसवाँ पैर
"अपनी हड़बड़ाहट में वह एक बड़े पत्थर"
एक सौ सैंतीसवाँ पैर
"लेकिन वे भी फूलों से मधु इकट्ठा करने में व्यस्त थीं।"
एक सौ सैंतीसवाँ पैर
"लेकिन तुम्हारे इतने सारे पैरों में से मैं टूटा पैर कैसे खोजूँ?"
एक सौ सैंतीसवाँ पैर
"दो पलाश के पेड़ बगिया में लाये बहार,"
हर पेड़ ज़रूरी है!
"तपती मरुभूमि में खेजड़ी के दस पेड़ पाकर,"
हर पेड़ ज़रूरी है!
"भैया घर में नहीं हैं, रिंकी उसका पैन खोज रही है।"
जादुर्इ गुटका
"दराज़ में एकदम नीचे, रिंकी को भैया का ख़ास पैन मिल गया।"
जादुर्इ गुटका
"भूरी जटाओं वाले नारियल से रिंकी की नाक में गुदगुदी हुर्इ।"
जादुर्इ गुटका
"कुनुंक, टुक! ज़रा सोचो गुटके में क्या फंसा होगा?"
जादुर्इ गुटका
"बस तभी! तभी दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनाई दी और भैया कमरे में आए।"
जादुर्इ गुटका
"कहानी में जादुर्इ गुटका एक छड़ चुंबक है। चुंबक कर्इ आकारों के होते हैं। वे गोल, आयताकार, चौकोर या"
जादुर्इ गुटका
"आप के विचार से इन में से क्या चुंबक से चिपकेगा?"
जादुर्इ गुटका
"सम संख्याओं के आख़िर में 0, 2, 4, 6, 8 अंक होते हैं।"
एक, तीन, पाँच, मदद! मदद!
"विषम संख्याओं के आख़िर में 1, 3, 5, 7, 9 अंक होते हैं।"
एक, तीन, पाँच, मदद! मदद!
"वह खाने की तलाश में था।"
मेंढक की तरकीब
"कोई पकड़ में ही नहीं आता।"
मेंढक की तरकीब
"थोड़ी ही देर में वहाँ बहुत सारा खाना था।"
मेंढक की तरकीब
"“पिछवाड़े की बगिया में बना लूँ, अप्पा?” रोज़ ने रॉकी का कान खींचते हुए पूछा।"
रोज़ और रॉकी चले कम्पोस्ट बनाने
"शाम को द्रुवी पास के जंगल में जाती है।"
द्रुवी की छतरी
"वह आसमान में घिर आए बादलों को नहीं देखती।"
द्रुवी की छतरी
"व्याध पतंगों के बारे में अधिक जानें"
द्रुवी की छतरी
"जिन्हें हम अपने मैदानों और बगीचों में पाते हैं, खुला समुद्र पार करके"
द्रुवी की छतरी
"अक्तूबर में शुरू करते हैं और विदेशों में, जैसे कि तंज़ानिया"
द्रुवी की छतरी
"जनवरी में पहुँचते हैं। वे रास्ते के द्वीपों पर, जैसे कि मालदीव और"
द्रुवी की छतरी
"सेशेल्स में रुकते हैं।"
द्रुवी की छतरी
"व्याध पतंगे बहुत अधिक ठंड या बहुत अधिक गर्मी में उड़ नहीं पाते।"
द्रुवी की छतरी
"फिर खाने की तलाश में निकल पड़ी।"
कुत्ते के अंडे
"मुझे सलीम की गली में जाना अच्छा लगता है।"
आनंद
"छुट्टियों में रस है"
छुट्टी
"वे बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। पूरा दिन मैदान में घूमते थे।"
दीदी का रंग बिरंगा खज़ाना
"कचरे के बारे में वे बहुत कुछ जानते थे।"
दीदी का रंग बिरंगा खज़ाना
"एक दिन दीदी कचरे के मैदान में आई। गले में लाल दुपट्टा ओढ़े हुए थी।"
दीदी का रंग बिरंगा खज़ाना
"दीदी से खूब कहानियाँ सुनने लगे। कुछ दिनों में वे अक्षर और शब्द पढ़ने लगे।"
दीदी का रंग बिरंगा खज़ाना
"कोई गलीचा लाया, कोई पर्दा। कहीं से कुछ सामान का टुकड़ा लाया, जो भी कचरे में पाया।"
दीदी का रंग बिरंगा खज़ाना
"बातों बातों में किताब पढ़ने लगे। अपने आप पढ़ते पढ़ते औरों को पढ़ाने लगे।"
दीदी का रंग बिरंगा खज़ाना
"एक दिन उन्हें दीदी का पता किताब में मिल गया। बच्चे तुरंत दीदी की खोज में निकल पड़े। साथ में किताबों का थैला उठाना नहीं भूले। खोजते खोजते बच्चों ने एक बस का नंबर पढ़ लिया। चलते चलते उस सड़क का नाम समझ लिया। क्योंकि दीदी ने उन्हें सब सिखाया था।"
दीदी का रंग बिरंगा खज़ाना
"आप कोलकाता में ही कोई दूसरी नौकरी क्यों नहीं ढूँढ लेते?’’"
एक सफ़र, एक खेल
"लेकिन नीना कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं है। रेलगाड़ी में माँ और बाबा ने उसे मनाने की बहुत कोशिश की।"
एक सफ़र, एक खेल
"‘‘नहीं! मैंने मना किया न!’’ नीना ने न में सिर हिलाते हुए कहा।"
एक सफ़र, एक खेल
"माँ और बाबा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह और क्या कर सकते हैं। फिर बाबा मुस्कराए।"
एक सफ़र, एक खेल
"नीना खिड़की से बाहर देखते हुए चिल्लायी, ‘‘भारत में जिराफ़ नहीं होते! आप हमें बेवकूफ़ बना रहे हैं, बाबा!’’"
एक सफ़र, एक खेल
"फिर बोली, ‘‘मुझे मालूम है कि नयी जगह पर यह खेल खेलने में तो और भी मज़ा आयेगा!’’"
एक सफ़र, एक खेल
"मुनिया जानती थी कि एक पंख वाले उस विशालकाय गजपक्षी ने घोड़े को नहीं निगला है। हाँ, वह इतना बड़ा तो था कि एक घोड़े को निगल जाता, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि उसने उसे निगल ही लिया था! नटखट झील के पास वाले उस जंगल से ग़ायब हुआ था जहाँ वह गजपक्षी रहता था। अधनिया गाँव में दो घोड़ों - नटखट और सरपट द्वारा खींचे जाने वाली केवल एक ही घोड़ागाड़ी थी। जंगल के अंदर बसे इस छोटे से गाँव में पीढ़ियों से लोगों को इस विशालकाय एक-पंख गजपक्षी के बारे में मालूम था। चूँकि वह किसी के भी मामले में अपनी टाँग नहीं अड़ाता था, इसलिए गाँव का कोई भी बंदा उसे छेड़ता न था।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"अपनी प्रजाति का वह आखिरी जीव था और सैकड़ों वर्षों से यह प्रजाति विलुप्त मान ली गयी थी। लोग नहीं जानते थे कि उस प्रजाति का जीवित अवशेष, जो एक को छोड़ अपने बाकी सारे पंख गँवा चुका था, अब भी अधनिया के जंगलों में विचरता था। गजपक्षी और गाँव वाले एक दूसरे से एक सुरक्षित दूरी बनाये रखते थे। पर मुनिया नहीं। हालाँकि चलते समय वह लँगड़ाती थी, लेकिन थी बड़ी हिम्मत वाली। अक्सर वह जंगल में घुस जाती और एक पंख वाले उस विशालकाय गजपक्षी को देखने के लिए झील पर जाया करती थी।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"दिन के समय वह गजपक्षी झील के पास आया करता या तो धूप तापने या फिर झील में पानी छपछपाते हुए अकेला खुद से ही खेलने। कभी-कभी वह पानी में आधा-डूब बैठा रहता और बाकी समय उसका कोई सुराग़ ही न मिलता। तब शायद वह घने जंगल के किसी बीहड़ कोने में बैठा आराम कर रहा होता। विशालकाय एक-पंख गजपक्षी एक पेड़ जितना ऊँचा था। उसकी एक लम्बी और मज़बूत गर्दन थी, पंजों वाली हाथी समान लम्बी टाँगें थीं और भाले जैसा एक भारी-भरकम भाल था। उसके लम्बे-लम्बे पंजे और नाखून डरावने लगते थे।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"पर मुनिया जल्द ही यह जान गयी कि वह शर्मीला और घासफूस खाने वाला एक शान्त पक्षी है। वह बस झील के किनारे लगे पौधे और पत्तियाँ चबाता रहता। मुनिया को महसूस हुआ कि उसमें और उस गजपक्षी में कुछ समानता है। सही तो है, विशालकाय एक-पंख गजपक्षी उड़ नहीं सकता था और मुनिया दौड़ नहीं सकती थी! गाँव के बाकी सारे बच्चे उसके लँगड़ाने का मज़ाक उड़ाते और अपने खेलों में उसे शामिल न करते। इसलिए उसे अकेले रहना ही अच्छा लगता।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"मुनिया को यह अहसास हमेशा सताता रहता कि गजपक्षी को पता है कि मुनिया कहीं आसपास है, क्योंकि वह अक्सर उस पेड़ की दिशा में देखता जिसके पीछे वह छुपी होती। हर सुबह मुनिया गाँव के कुएँ से तीन मटके पानी भर लाती और लकड़ियाँ ले आती ताकि उसकी अम्मा चूल्हा फूँक सकें। इसके बाद वह हँसते-खेलते अपनी झोंपड़ी से बाहर चली जाती। अम्मा समझतीं कि वह गाँव के बच्चों के साथ खेलने जा रही है। उन्हें यह पता न था कि मुनिया जंगल में उस झील पर जाती है जहाँ वह विशालकाय एक-पंख गजपक्षी रहता था।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"एक दिन, मुनिया ने बाहर खुले में आने की हिम्मत बटोरी। अपना सिर घुमाये बिना उस विशालकाय ने पहले तो अपनी आँखें घुमाकर मुनिया को देखा और फिर उन्हे बंद कर उसने मुनिया के आगे बढ़ने की कोई परवाह नहीं की। उसके सिर पर भनभनातीं मक्खियों से ज़्यादा ध्यान न खींच पाने के चलते मुनिया धम्म से अपने पैर पटक उसकी ओर बढ़ी। अचानक उस विशालकाय ने अपना एक पंजा उठाया। मुनिया चीखी और झील के उथले पानी में सिर के बल गिर पड़ी। पानी में भीगी-भीगी जब वह झील से बाहर आयी तो क्या देखती है कि गजपक्षी का समूचा बदन हिलडुल रहा है। वह समझ गयी कि वह हँस रहा था!"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"झिझकते-झिझकते उसने वह गेंद उसकी ओर फेंकी। आड़े-तिरछे ढुलक कर उसने गेंद को अपनी चोंच में पकड़ लिया।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"अधनिया एक छोटा, अलग-थलग गाँव था जिसमें हर कोई हर किसी को जानता था। गाँव में तो कोई चोर हो नहीं सकता था। दूधवाले ने कसम खाकर कहा था कि उसने नटखट को झील की ओर चौकड़ी भरकर जाते हुए देखा है। लेकिन वह इस बात का खुलासा न कर पाया कि आखिर नटखट बाड़े से कैसे छूट कर निकल भागा था। दिन में बारिश होने के चलते नटखट के खुरों के सारे निशान भी मिट चले थे और उन्हें देख पाना मुमकिन न था।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“तो... फिर जंगल ही में किसी ने उसे खा लिया होगा,” गाँव के मुखिया को सम्बोधित करते हुए एक हट्टा-कट्टा नौजवान बोला।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"सब लोगों ने सहमति में हुंकारा। मुनिया यह सारी कार्यवाही चुपचाप देखे जा रही थी। वह बोलना चाहती थी, लेकिन जिसकी अनुमति नहीं थी उसकी सज़ा क्या होगी? और अगर वह बोलती भी तो कौन उसकी बात पर यकीन करता?"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"इस पर मुखिया गाँव वालों की गुस्सैल आवाज़ों से भी ऊँची आवाज़ में बोला, “भाइयों, यह बात सही है कि हमारा सामना एक राक्षस से है, लेकिन हमारे पास संख्या की शक्ति है। इसलिए आइये इकट्ठे हो अपनी हिम्मत बाँध उसे ख़त्म करें!” बदले में एक सहमति भरी हुंकार गूँज उठी।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“लेकिन उस विशालकाय एक-पंख गजपक्षी ने घोड़ा नहीं खाया,” मुनिया ने लँगड़ाते हुए आगे बढ़कर बहुत धीमे स्वर में कहा। “जिस वक्त घोड़ा ग़ायब हुआ, उस वक्त मैं उसके साथ वहीं पर थी!” समूची सभा में एक गहरा सन्नाटा सा छा गया।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"व्हूऊऊऊ... जंगल की फ़िज़ा में उल्लू की आवाज़ गूँज रही थी। दूर से एक सियार के गुर्राने की आवाज़ आयी। यूँ लगता था जैसे पेड़ों की छायाएँ अपनी काली-काली उँगलियाँ लहरा रही हों।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"मुनिया एक पल को तो ठिठकी पर अगले ही पल उसे जंगल में आराम से सोते उस महाकाय का ख़याल आया। वह अगर नहीं गयी तो वह शायद अगली रात भी न देख पाये। एक गहरी साँस लेकर उस आधी रात को ही जंगल से होकर चन्देसरा जाने वाले रास्ते पर लँगड़ाते-लँगड़ाते चल पड़ी।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"अगली सुबह सारे गाँव वाले लाठियाँ, भाले, नुकीले पत्थर, और बड़े-बड़े चाकू लेकर जंगल झील पर इकट्ठे हुए। विशालकाय एक-पंख गजपक्षी उस वक्त झील के समीप आराम फ़रमा रहा था जब गाँव वालों की भीड़ उसकी ओर बढ़ी। पक्षी की पंखहीन पीठ धूप में चमक रही थी। वह धीरे से उठा और अपनी तरफ़ आती भीड़ को ताकने लगा। उसके विराट आकार को देख गाँव वाले थोड़ी दूर पर आकर रुक गये और आगे बढ़ने को लेकर दुविधा में पड़ गये। पल भर की ठिठक के बाद मुखिया चिल्लाया, “तैयार हो जाओ!” भीड़ गरजी, अपने-अपने हथियारों पर उनके हाथों की पकड़ और मज़बूत हुई और वे तैयार हो चले उस भीमकाय को रौंदने के लिए।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“ठहरो!” सारे शोर-शराबे को चीर कर मुनिया की पतली सी आवाज़ आयी। भीड़ और उस महाकाय के बीच से लँगड़ाती हुई वह आगे बढ़ी। “मुनिया! तुरन्त वापस आ जाओ!” मुनिया के बाबूजी का आदेश था। “उसे पकड़ो तो!” मुनिया के बाबूजी और एक ग्रामीण उसकी ओर दौड़ पड़े। महाकाय को दो कदम आगे बढ़ता देख वे लोग रुक गये। “कोई बात नहीं... अगर तुम लोग यही चाहते हो तो हम लोग तुम दोनों से इकट्ठे ही निपटेंगे!” अपने हाथ में भाला उठाये वह हट्टा-कट्टा आदमी चीखा।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“क्या हो रहा है?” भीड़ में पीछे से कोई चिल्लाया।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"लम्बी दाढ़ी और हल्के कूबड़ वाला एक आदमी अपने हाथ में नटखट की लगाम थामे नज़र आया। “क्या हो रहा है?” उसने अपना सवाल दोहराया।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"“जैसा कि आप जानते हैं, कुछ साल पहले मैंने नटखट को बेच दिया था। कल मैं नटखट के भाइयों - बाँका और बलवान के द्वारा खींची जाने वाली बग्घी में सवार आपके गाँव से गुज़र रहा था। मुझे नहीं मालूम कि किस तरह से नटखट अपने आपको छुड़ा हमारे पीछे-पीछे भागकर चन्देसरा चला आया। मैं उसे पहचान न सका और यह समझ न पाया कि इसका करूँ तो करूँ क्या। फिर आज सुबह मैंने इस नन्ही-सी बच्ची को एक झोंपड़ी से दूसरी झोंपड़ी जाते और एक गुमशुदा घोड़े के बारे में पूछते हुए देखा। लेकिन या इलाही ये माजरा क्या है?” तीसरी बार उसने अपना वही सवाल किया।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"लेकिन गाँव वाले सारथी को क्या जवाब देते? उनके सिर शर्म से झुके हुए थे। मुनिया के पिताजी अपनी बेटी के पास गये, और उसे अपनी गोद में उठाकर उसे वापस गाँव ले आये। बस फिर क्या था, उस दिन के बाद से कोई भी बच्चा मुनिया के लँगड़ाने पर नहीं हँसा। वे सब अब उसके दोस्त होना चाहते थे। लेकिन केवल भीमकाय ही मुनिया का अकेला सच्चा मित्र बना रहा। मुनिया की कहानी तमाम गाँवों में फैली, और दूरदराज़ के ग्रामीण फुसफुसाकर एक-दूसरे से कहते, “देखा, मुनिया जानती थी कि उस विशालकाय एक-पंख गजपक्षी ने घोड़े को नहीं डकारा!”"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"यह कहानी एक वास्तविक गजपक्षी से प्रेरित है। इस विशाल पक्षी, एलिफेंट बर्ड, को वैज्ञानिकों ने एपियोरनिस मेक्सिमस का नाम दिया। यह दुनिया का सबसे बड़ा पक्षी था और मेडागास्कर के द्वीपों में पाया जाता था। वनों के नष्ट होने और आबादी बढ़ने से ये विशाल पक्षी 1700 ई. के आस-पास लुप्त हो गए।"
विशालकाय एक-पंख गजपक्षी
"स्कूल में आज मेरा पहला दिन है। माँ मेरा हाथ पकड़े हुए हैं और मेरे साथ चल रही हैं।"
स्कूल का पहला दिन
"मुझे पेपे को चिढ़ाने में बहुत मज़ा आता है।"
टिमी और पेपे
"जवाब में वह कहता है, “भऊ।” इसका मतलब उसकी भी नाक है।"
टिमी और पेपे
"जवाब में वह कहता है, “भऊ।” इसका मतलब उसके भी कान हैं।"
टिमी और पेपे
"जवाब में वह कहता है, “भऊ।” इसका मतलब है उसकी भी आँखें हैं।"
टिमी और पेपे
"जवाब में वह कहता है, “भऊ, भऊ, भऊ, भऊ।”"
टिमी और पेपे
"जवाब में वह कहता है, “भऊ।” इसका मतलब उसकी भी जीभ है।"
टिमी और पेपे
"जवाब में वह कहता है, “भऊऊऊ।”"
टिमी और पेपे
"जवाब में वह कहता है, “गुर्रर्रर्र...,” और मुड़कर अपनी छोटी सी पूँछ दिखाता है। इसका मतलब उसके पास पूँछ है और मेरे पास नहीं!"
टिमी और पेपे
"मेरे दादा जी अपनी छड़ी कोने में रखते हैं।"
मेरा घर
"मेरी माँ और दादी अपनी साड़ियाँ बक्से में रखती हैं।"
मेरा घर
"स्वादिष्ट खाना रसोईघर में पकता है।"
मेरा घर
"अगले दिन सुबह-सुबह एक मक्खी उसकी नाक में जा बैठी।"
भीमा गधा
"साथ में आज माँ का एक नया गाना।"
चुन्नु-मुन्नु का नहाना
"मेरे बैग में भी नहीं।"
खोया पाया
"मैंने हर एक कमरे में ढूँढा।"
खोया पाया
""देखो यह मुझे पार्क में क्या मिला?"
खोया पाया
"जंगल में एक बाग था।"
सैर सपाटा
"मैदान में पत्थर पड़ा था। ठोकर लगी तो गिर पड़ा।"
वह हँस दिया
"वीना और विनय इधर-उधर बिखरे रंगों के डिब्बों के बीच बगीचे में थे।"
नन्हे मददगार
"पुताई वाले अपने काम में लगे थे। उनमें से एक सीढ़ी पर था, और दूसरा छत से झूले पर लटक रहा था।"
नन्हे मददगार
"पुताई वाले भैया ने उनके हाथ में ब्रश थमाए।"
नन्हे मददगार
"और अन्त में अपने ऊपर गिरे रंग को भी पोंछा।"
नन्हे मददगार
"“ओहो! तुमने तो फाटक को दो रंगों में रंग डाला!” पुताई वाला भैया भन्नाया। “चलो अब इसे ऐसे ही रहने देते हैं!” माँ ने कहा।"
नन्हे मददगार
"पहलवान फिर फिसला और गिरा धड़ाम से। ‘‘अच्छी कलाबाज़ी खाते हो। तुम्हें तो सर्कस में काम करना चाहिये।’’ गप्पू हँस पड़ा।"
पहलवान जी और केला
"पास में पानी भी नहीं है!"
क्यों भई क्यों?
"मगर बीच में से हल्की सी, एक और आवाज़ आती,"
सोना बड़ी सयानी
"सोना ने माँ की कमर में दबा ओढ़नी का सिरा निकाला।"
सोना बड़ी सयानी
"“छन-छन,” ओढ़नी में बँधी चाभियाँ बोलीं, “छन, छन!”"
सोना बड़ी सयानी
"चाचा तरह-तरह के स्वाद और ख़ुशबू वाले रस तैयार कर रहे थे। चार-चार पतीलों में आग पर इकट्ठे रस पक रहा था।"
सोना की नाक बड़ी तेज
"चाचा बोले, "नहीं, सोना, तुम बस ध्यान से देखो।" चाचा ने एक पतीले में रंग और खुशबू डाली।"
सोना की नाक बड़ी तेज
"सोना ने सूँघ कर कहा, "गले में खट से लगने वाली गंध। चाचा यह ‘काली खट्टी’ चुस्की का रसा है।""
सोना की नाक बड़ी तेज
"चाचा ने दूसरे पतीले में मसाला डाला। हाँ! यह है भीनी-मीठी खुशबू!"
सोना की नाक बड़ी तेज
""अब मैं डाल रहा हूँ ‘गुलाबी शीरे’ की चुस्की का मसाला," चाचा ने तीसरे पतीले में करछी चलाई।"
सोना की नाक बड़ी तेज
"को दूसरे साफ़ पतीले में पलटा।"
सोना की नाक बड़ी तेज
"यह तो पतीले में लगने ही लगी थी।""
सोना की नाक बड़ी तेज
"और शेर अपनी गुफ़ा में दोबारा चैन से सो गया।"
सालाना बाल-कटाई दिवस
"दाने में से किल्ला फूटा"
सबरंग
"मन में घोल रहा था रंग।"
सबरंग
"बड़े-बड़े मैं काम करूँगा दुनिया भर में नाम करूँगा।"
सबरंग
"लगे किसी के घर में आग"
सबरंग
"जग में पाऊँगा सम्मान।"
सबरंग
"चंदू के कमरे में आई।"
सबरंग
"ऐसा पढ़ना भाड़ में जाए!"
सबरंग
"घर में गीदड़ बाहर शेर!"
सबरंग
"भोलेपन में मैं कह उठती"
सबरंग
"ना जाने सोते में कैसे"
सबरंग
"थी मन में टोह बड़ी।"
सबरंग
"छिन के छिन में पंख जड़ाऊ"
सबरंग
"वह अपनी माँ के साथ एक शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में जा रहा था।"
संगीत की दुनिया
"माँ की प्रिय सहेली, राधिका मौसी कार्यक्रम में हिस्सा ले रहीं थीं।"
संगीत की दुनिया
"कार्यक्रम शुरू होने में अभी समय है, क्या तुम अंदर आना चाहोगे? मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूँ।""
संगीत की दुनिया
"विवान यह सुनकर बहुत खुश हुआ और वह दोनो मौसी के साथ हाल के पीछे एक कमरे में गये।"
संगीत की दुनिया
"तबला हमेशा जोड़े में है आता,"
संगीत की दुनिया
"लोकप्रिय है देश विदेश में हमारी सितार।""
संगीत की दुनिया
""बाँस में फ़ूको तो सुर बन जाता,"
संगीत की दुनिया
""मौसी के विवाह में बजी थी शहनाई,"
संगीत की दुनिया
"मौसी ने विवान से कहा, "चलो अब कार्यक्रम शुरू होने वाला है। तुम माँ के साथ हाल में जाकर बैठो।""
संगीत की दुनिया
"विवान और माँ हाल में जाकर अपनी अपनी कुर्सी पर बेठे।"
संगीत की दुनिया
"शहर के एक छोटे से बगीचे में पीपल का एक बड़ा सा पेड़ है। उस पेड़ पर गिलहरियों का एक परिवार रहता है। विक्की उस कुनबे का बड़ा ही शेखीमार सदस्य है। उसका चचेरा भाई काटो, दूर जंगल से उससे मिलने आया है।"
नौका की सैर
"“आज हम एक बड़ी नौका में घूमने जायेंगे,” विक्की ने काटो से कहा। काटो घबराया और"
नौका की सैर
"कुछ ही देर में, नौका नदी में हिचकोले खाती, पेड़ों के बगल से हिलती डुलती आगे बढ़ी। काटो ने बहुत सारी बत्तखों को तैरते हुए देखा। मछलियाँ भी पानी से सिर निकालकर होंठ गोल करके “हैलो” बोलतीं। हंसों का एक जोड़ा भी अपनी लम्बी ख़ूबसूरत गर्दन मटकाते हुए पास से गुज़रा।"
नौका की सैर
"काटो का मन हुआ, वह उचककर उन्हें छू ले। और इस चक्कर में वह पानी में जा गिरा। गिरते-गिरते काटो ने कुछ मछलियों को उसका रास्ता काटते हुए देखा। “मुझे बचाओ, बचाओ मुझे,” पानी की लम्बी घूँटें लेते हुए उसने उन्हें पुकारा।"
नौका की सैर
"चिल्लाया, “अरे कोई बचाओ! गिलहरी पानी में...पानी में डूब रही है।”"
नौका की सैर
"हंस ने उसकी पुकार सुनते ही पानी में अपना सिर डुबोया और बड़ी आसानी से काटो को अपनी चोंच में
उठाकर नौका में डाल दिया।"
नौका की सैर
"काटो ठंड से काँपते हुए धूप में अपने को सुखाने की कोशिश कर रहा था। पास में विक्की चुपचाप बैठा हुआ था। जब काटो के बाल थोड़ा सूख गये और शरीर में थोड़ी गर्मी आ गयी, वह बोल उठा, “कितना मज़ा आया! जब मेरे साथी इस किस्से को सुनेंगे तो उन्हें विश्वास ही नहीं होगा।” काटो को लग रहा था मानो वह एक बहुत बड़ा हीरो और जहाज़ का जाँबाज़ कप्तान बन गया हो!"
नौका की सैर
"जब नौका किनारे पर पहुँची, काटो जल्दी से जल्दी सबको अपने कारनामे के बारे में बता देना चाहता था। दिन की सारी घटनाओं के बाद, काटो का सिर नौका की तरह चक्कर खा रहा था। खाने की मेज़ पर जैसे ही उसने सिर रखा, उसकी आँखें बंद होने लगीं और वह गहरी नींद में डूब गया।"
नौका की सैर
"हाथों में है ग़ज़ब की फुर्ती"
निराली दादी
"हवा में उड़ता चश्मा छाता"
निराली दादी
"वे कौन सी चीज़ें हवा में उछालते हैं?"
निराली दादी
"मैंने जानना चाहा कि नानी ने दिन भर में क्या-क्या किया?"
नानी की ऐनक
"अम्मा बोली,"वह बहुत देर तक तुम्हारी मौसी से बात भी करती रही थीं। उन्होंने उस स्वेटर को भी पूरा किया, जो वह राजू के लिए बुन रही थीं। फिर वह टहलने निकल गई थीं।"अब मुझे खोज के लिए कई सूत्र मिल गए। मैंने घर में तुरंत ही नई जगहों पर ढूँढ़ना शुरू किया।"
नानी की ऐनक
"ऐनक ऊन में लिपटी पड़ी थी। उनकी कलम के बगल में, फोन के नीचे, मेज़ के ऊपर। और वहीं पर मुझे आधा खाया हुआ लड्डू भी मिला।"
नानी की ऐनक
"मैं सोचता हूँ कि बारिश का मौसम सबको अच्छा लगता है। यह चारों मौसमों में सबसे अच्छा मौसम है। यह गर्मी के मौसम के तुरंत बाद आता है। बारिश के साथ कभी कभी आँधी आती है,बादल गरजते हैं और बिजली भी चमकती है।"
बारिश हो रही छमा छम
"बारिश के मौसम में बच्चे गीली मिट्टी में खेलते हैं,नाचते हैं और मजे करते हैं,मीठे आम खाते हैं और कागज की छोटी छोटी नावें बनाते हैं।"
बारिश हो रही छमा छम
"एक लंबे अंतराल के बाद पेड़ पौधों में नयी पत्तियाँ आ रहीं हैं।"
बारिश हो रही छमा छम
"पशु पक्षी भी बारिश में आनंदित होते हैं क्योंकि उन्हें पीने और बढ़ने को बहुत पानी मिल जाता है।"
बारिश हो रही छमा छम
"उनके बीच पगडंडियाँ थीं।
बहुत सारे जानवर और चिड़ियाँ जंगल में रहते थे।"
जंगल का स्कूल
"मिंकू बंदर बोला, “हमारे जंगल में एक स्कूल है।”"
जंगल का स्कूल
"जब टीचर फिर घूमे तो कक्षा में कोई भी नहीं था।"
जंगल का स्कूल
"मेरे चाचा की शादी है।
शादी गाँव में होगी।"
चाचा की शादी
"हम सब शादी में जा रहे हैं।
सब लोग ट्रेन से गाँव जायेंगे।"
चाचा की शादी
"माँ कहती हैं, “ज़रा रुको अभी तो हम ट्रेन में बैठे भी नहीं।
भूख लगी है, तो मेरे पास मिठाइयाँ हैं।
प्यास लगी है, तो मेरे पास पानी है।
लेकिन जब तक ट्रेन न आये, तब तक इन्तज़ार करो।”"
चाचा की शादी
"शोर मचने लगा। ट्रेन आ रही है! ट्रेन आ रही है!
सब ट्रेन में चढ़ने की कोशिश में थे। पर वह कहाँ हैं, जिनकी शादी में हम सब जा रहे हैं?"
चाचा की शादी
"हम सब ट्रेन में बैठ जाते हैं।
ट्रेन स्टेशन से चल पड़ती है।"
चाचा की शादी
"सुखिया काका बिटौना गाँव में रहते थे।"
बारिश में क्या गाएँ ?
"यह गाँव अपने गवैयों के लिए पूरे राजस्थान में मशहूर था।"
बारिश में क्या गाएँ ?
"सुखिया काका और दीनू दोनों गा रहे थे, साथ में ठुमका भी लगा रहे थे।"
बारिश में क्या गाएँ ?
"बारिश में आपको क्या क्या करना अच्छा"
बारिश में क्या गाएँ ?
"बारिश के दिनों में आपको क्या क्या खाना"
बारिश में क्या गाएँ ?
"अनु को अपने पापा की बहुत सी चीज़ें अच्छी लगती हैं। उनकी लटकने वाली चमचम चमकतीं लालटेनें, उनके तले प्याज़ के करारे-करारे पकौड़े, काग़ज़ से जो प्यारे-प्यारे कछुए वे बनाते हैं, अनु को सब अच्छे लगते हैं। यही नहीं, सीढ़ियाँ भी वे उचक-उचक कर चढ़ते हैं। और फिर मामा से उनकी वे कुश्तियाँ, जो वे मज़े लेने के लिए आपस में लड़ते हैं। मेहमानों के आने पर, वे हमेशा उन्हें हँसाते रहते हैं!"
पापा की मूँछें
"हर सुबह, जैसे ही उसके पापा दाढ़ी बनाना शुरू करते हैं, अनु भी उनके पास आकर बैठ जाती है। बड़े ध्यान से उन्हें दाढ़ी बनाते हुए देखती है। उसके पापा अपनी दो उँगलियों में एक छुटकू-सी कैंची पकड़े, कच-कच-कच... अपनी मूँछों को तराशने में जुट जाते हैं।
और अनु है कि कहती जाती है, “थोड़ा बाएँ... अब थोड़ा-सा दाएँ... पापा नहीं ना! आप अपनी मूँछों को और छोटा मत कीजिए!
आप ऐसा करेंगे तो मैं आपसे कट्टी हो जाऊँगी!”"
पापा की मूँछें
"इसके बाद, वह मूँछ की नोकों को अपनी उँगलियों की चुटकी में पकड़ कर उमेठ देती है!"
पापा की मूँछें
"लेकिन सबसे बढ़िया मूँछें तो, पास वाले मकान में रहने वाले उन दादाजी की हैं! ऐसा लगता है मानो एक बड़ा-सा स़फेद बादल आसमान से उतर कर उनकी नाक के नीचे रहने चला आया है! अब उनका मुँह जो है, उस बादल के पीछे छिपा रहता है।"
पापा की मूँछें
"एक चींटी खाने की खोज में घूम रही थी।"
दाल का दाना
"चींटी को रसोई घर में अंकुरित मूँग दाल का एक दाना मिला।"
दाल का दाना
"रास्ते में नल से पानी गिर कर बह रहा था।"
दाल का दाना
"चींटी दाने को लेकर आगे बढ़ी तो रास्ते में उसे बाल्टी मिली।"
दाल का दाना
"रास्ते में एक औरत झाड़ू लगा रही थी।"
दाल का दाना
"वह जगह-जगह ज़मीन में अपनी चोंच मार रहा था।"
दाल का दाना
"इस पुस्तक में चींटी को एक हरा अंकुरित मूँग का दाना मिला। अंकुरित दालें स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छी होती हैं। हम किसी भी दाल को भिगो कर अंकुरित बना सकते हैं जैसे राजमा, सफ़ेद चना, काला चना, मटर आदि।"
दाल का दाना
"अलग अलग दालों के बारे में अपने मित्रों से साथ दाल के खेल खेलकर जानिए। घर के किसी बड़े से रसोई से विभिन्न प्रकार की दालों के दाने लेकर देने का अनुरोध कीजिये। उदाहरण के लिए, राजमा, अरहर या तूअर, सफ़ेद चना, सोयाबीन, साबुत मूँग और मटर के दाने। इन सब को एक बड़े कटोरे में डालिये।"
दाल का दाना
""क्या किया जाए," चुलबुल सोच में पड़ गई। बहुत सोच-विचार के बाद उसके दिमाग में एक बात आई। क्यों न डॉक्टर बोम्बो भालू के पास चला जाये।"
चुलबुल की पूँछ
"उनके अस्पताल में विभिन्न जानवरों की पूँछ, टाँग, कान अलमारी में सजे हुए थे। जब तक डॉक्टर बोम्बो भालू आते हैं तब तक मैं अपने लिए एक पूँछ ही चुन लेती हूँ।"
चुलबुल की पूँछ
"चुलबुल ने मन में सोचा और तरह-तरह की पूँछ देखने लगी।"
चुलबुल की पूँछ
"जैसे ही डॉक्टर बोम्बो कमरे में आए, चुलबुल उछल कर मेज़ पर बैठ गई।"
चुलबुल की पूँछ
""नहीं, यह पूँछ ठीक नहीं है। इसे बदलना पड़ेगा," यह कहते हुए उसने अपनी लम्बी पूँछ को हाथ से उठाने की कोशिश की। किसी तरह लड़खड़ाते हुए वह दोबारा डॉक्टर बोम्बो के अस्पताल में पहुँची।"
चुलबुल की पूँछ
""डॉक्टर दादा, डॉक्टर दादा, यह पूँछ तो बहुत भारी है। कोई हल्की पूँछ लगा दो," चुलबुल ने थकी आवाज़ में कहा।"
चुलबुल की पूँछ
""मैंने तुम्हें पहले ही मना किया था," डॉक्टर बोम्बो कुछ गुस्से में बोले।"
चुलबुल की पूँछ
"डॉक्टर बोम्बो ने बन्दर की पूँछ हटा कर बिल्ली की पूँछ लगा दी। "यह पूँछ बन्दर की पूँछ से तो हल्की है," सोचते हुए चुलबुल चल पड़ी। पूँछ की अदला-बदली में वह अब तक बहुत थक गई थी। वह पास के एक पेड़ के पीछे लेट कर आराम करने लगी।"
चुलबुल की पूँछ
"मेरी नाक सुन सकती है कि माँ रसोई में जलेबियाँ तल रही हैं
।"
चुप! मेरी नाक कुछ कह रही है...
"शरीर की आवाज़ सुनने में मज़ा आता है
।"
चुप! मेरी नाक कुछ कह रही है...
"क्या हम अभी जायें?
क्या हम बाद में जायें?"
चलो किताबें खरीदने
"क्या हमें बड़े बाज़ार जाना चाहिए?
क्या हमें छोटी दुकान में जाना चाहिए?"
चलो किताबें खरीदने
"हमने तय किया कि केवल हम दोनों छोटी दुकान में जायेंगे।"
चलो किताबें खरीदने
"दुकानदार हमें देखकर मुस्कराया।
“बच्चों, आओ मेरे साथ,” उसने कहा।
“यह किताबें जानवरों के बारे में हैं। वे परियों के बारे में हैं।
ऊपर वाली लड़ाइयों के बारे में हैं। तुम्हें जो चाहिए, ले लो।”"
चलो किताबें खरीदने
""मुझे इस पैकेट से तेल निकाल कर बोतल में डालना है, और देखो ना, बोतल का मुंह कितना छोटा है!मुझे यकीन है कि आज मेरी रसोई ज़रूर गंदी हो जाएगी।" मंगल चाचा ने कहा।"
गुल्ली का गज़ब पिटारा
"इस में ऊपर से कुछ भी उड़ेलें और देखें कितनी सफाई से वह बूँद-बूँद निकलता है।"
गुल्ली का गज़ब पिटारा
""आप यहाँ आराम से कुर्सी पर बैठें, और मैं ले आता हूँ अपने छोटे, भूरे बक्से में से कुछ ख़ास चीज़।""
गुल्ली का गज़ब पिटारा
"स्कूल की छुट्टी होने में पाँच मिनट रह गये थे पर चीनू और इन्तज़ार नहीं कर सकता था। उसने बाहर देखा। वहाँ कोई नहीं था। तभी कहीं पास से घंटी की टनटनाहट सुनाई दी।"
कबाड़ी वाला
"स्कूल की घंटी बजी। चीनू पिता जी के पास दौड़ कर पहुँचा। चेहरे पर बड़ी सी
मुस्कान खेल रही थी। स्कूल में वह अकेला बच्चा था जिसके पिता जी उसे लेने आते थे।"
कबाड़ी वाला
"जब एक चौकीदार ने उन्हें रोका, चीनू नीचे कूदा। एक खाली बोरी लेकर वह अपने पिता जी के साथ गया। आज उन्हें जो भी सामान मिलेगा वह इस बोरी में भरा जायेगा।"
कबाड़ी वाला
"चीनू दौड़ कर ठेले से एक और खाली बोरी ले आया। वे लिफ्ट में ऊपर जाने वाले थे! चीनू की आँखें बड़ी-बड़ी और गोल हो गईं।"
कबाड़ी वाला
"सपने में वह उड़ने लगा।"
उड़ते उड़ते
"उड़ते उड़ते चन्दू बगीचे में आया।"
उड़ते उड़ते
"आसमान में तारे चमक रहे थे, कुछ छोटे, कुछ बड़े।"
उड़ते उड़ते
""बिस्कुट के खाली लिफ़ाफ़े कूड़ेदान में डालो।""
कचरे का बादल
"उसने तो बादल को कूड़ेदान में फेंकने की भी"
कचरे का बादल
"कचरे के बादल से डर कर, बाला ने, छिलके को कूड़ेदान में फेंक दिया।"
कचरे का बादल
"प्लास्टिक की हर बेकार बोतल उठाकर कूड़ेदान में डाल देती।"
कचरे का बादल
"सच तो यह है कि उसे भी साफ़ गाँव में रहना अच्छा लगता था।"
कचरे का बादल
"कभी सोचा है कि जो कचरा हम कूड़ेदान में फेंक देते है उसका क्या होता होगा? नहीं, वह हमारे सिर पर बादल बन कर नहीं मँडराता लेकिन जो भी कचरा हम फेंकते है वो हमारे घर के पास बने बड़े से कचराघर में जमा हो जाता है। सब कुछ एक साथ, सड़ती सब्जियाँ, टॉफ़ी के रैपर, किताबों-कापियों के फटे पन्ने।"
कचरे का बादल
"जब भी हम केले के छिलके या पेंसिल की छीलन सड़क पर फेंकते है, तो यह कचरा सड़क के किनारे इकठ्ठा हो जाता है। कुछ उन नालियों के अंदर चला जाता है और उन में जमा हो जाता है। रूकी हुई नालियों में मक्खी-मच्छर पैदा होते हैं जो बीमारियाँ फैलाते हैं! इससे हमारा पर्यावरण गन्दा होता है और अपने आसपास कूड़ा- कचरा तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता। चीकू के दिल से पूछिये।"
कचरे का बादल
"- कूड़ा-कचरा बिल्कुल न बिखेरें। हमेशा, कूड़ेदान में ही डालें।"
कचरे का बादल
"- सुबह स्कूल जाते समय अगर रास्ते में केला खाते हैं"
कचरे का बादल
"- छिलका रखने के लिए माँ या पापा से एक छोटा लिफ़ाफ़ा ले जाईये, स्कूल पहुँचने के बाद याद से छिलके को कूड़ेदान में डाल दीजिये।"
कचरे का बादल
"- कूड़ेदान को ढक दीजिये जिससे उस में मक्खियाँ बिलकुल न पहुँच पाएँ।"
कचरे का बादल
"पंजाब के किसी गाँव में गेहूँ के खेतों के पास एक गुलमोहर के पेड़ पर मुन्नी गौरैया अपने घोंसले के पास बैठी थी। अपने तीन अनमोल छोटे-छोटे अंडों की निगरानी करती वह उनसे चूज़ों के निकलने का इंतज़ार कर रही थी। मुन्नी सुर्ख लाल फूलों को देखती खुश हो रही थी कि तभी ऊपर की डाल पर एक काला साया दिखा। वह गाँव का लफंगा, काका कौवा था। मुन्नी घबराकर चीं-चीं करने लगी।"
काका और मुन्नी
"काका खुद को बहुत बाँका समझता था। उसे यह बात अच्छी नहीं लगी कि वह सा़फ -सुथरा नहीं दिख रहा। वह झटपट पानी की धारा के पास पहुँचा। वह धारा में अपनी चोंच डुबो ही रहा था कि धारा ज़ोर से चिल्लाई, “काका! रुको! अगर तुमने अपनी गन्दी चोंच मुझ में डुबोई तो मेरा सारा पानी गन्दा हो जायेगा। तुम एक कसोरा ले आओ। उस में पानी भरकर अपनी चोंच उसी में धो लो।”"
काका और मुन्नी
"काका जंगल में जा पहुँचा। उसे नुकीले सींगो वाला एक हिरन दिखा तो वह उससे बोला,"
काका और मुन्नी
"“इतनी गर्मी में तो यह बहुत कड़ा काम है,”"
काका और मुन्नी
"पंजाबी में इसका मतलब होता है,"
काका और मुन्नी
"इस किताब में आपने जितने भी चित्र देखे वह कोलाज"
काका और मुन्नी
"इस पृष्ठ में चार तत्वों वायु, जल, पृथ्वी और दहकते हुए सूर्य को दर्शाया गया है। जैसे इस किताब में कागज़ के टुकड़ों का इस्तेमाल हुआ है वैसे ही तुम कागज़ के टुकड़े"
काका और मुन्नी
"नहीं पकड़ में आती वह,"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"जब पानी में जाता हाथी"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"खिली धूप में कितनी भाए।"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"नहीं फँसेगा बालू में- बालू में भी ऊँट चला।"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"जब पापा बाज़ार गए, तो गया संग में छाता।"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"एक हाथ में झोला उनके, एक हाथ में छाता।"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"जब आती बरसात, साथ में यह भी चलता जाता।"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"खुद बारिश में भीगा करता, पर, यह उन्हें बचाता।"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"कागज़ की इक नाव बनाएँ उसको पानी में तैराएँ।"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"जाने किस नदिया में जाए,"
ऊँट चला, भई! ऊँट चला
"एक गाँव में दो दोस्त घनश्याम और ओम रहते थे। घनश्याम बहुत पूजा-पाठ करता था और भगवान को बहुत मानता था, जबकि ओम अपने काम पर ध्यान देता था। एक बार दोनों ने मिलकर एक बीघा खेत खरीदा और सोचा कि मिलकर खेती करेंगे। जो फ़सल तैयार होगी, उसको बेचकर जो रुपए मिलेंगे, उसमें घर बनवाया जाएगा। ओम खेत में दिन-रात खूब मेहनत करता, जबकि घनश्याम भगवान की पूजा प्रार्थना में व्यस्त रहता।"
मेहनत का फल
"फ़सल तैयार हो गई और उसे बेचा गया। ओम ने कहा, “मुझे धनराशि का ज़्यादा भाग मिलना चाहिए क्योंकि मैंने खेत में ज़्यादा मेहनत की है।” दूसरी ओर घनश्याम ने कहा, “मैंने भी दिन-रात भगवान की पूजा की जिससे अच्छी फ़सल तैयार हुई है।”"
मेहनत का फल
"मछलियों के घर में एक बड़ा-सा रेडियो था। उनकी इज्ज़त इससे और भी बढ़ गई थी।"
मछली ने समाचार सुने
"लेकिन वह समाचार तो खुश करने वाला नहीं था, "नदी में दवाई छिड़क कर मछलियों को पकड़ने वाले आ रहे हैं। अनेकों नदियों से ऐसे ही वे लोग मछलियाँ पकड़ कर ले गये हैं।" यह सुनकर उसे गहरा धक्का लगा। बाकी मछलियों को भी यह समाचार पता चला।"
मछली ने समाचार सुने
"मेंढक और कछुए भी बहुत डर गए। क्या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा था। सब निराश होकर बैठ गये। रोज़ की तरह दादा से रेडियो छीनने कोई नहीं आया। आगे की चिन्ता सभी को सता रही थी।"
मछली ने समाचार सुने
"“आपको कोई तकलीफ़ न हो इसकी व्यवस्था मैं करूँगा।” सभी की मानो जान में जान आई। कॉफ़ी पीकर मुखिया उनको निश्चित रहने का ढाँढस बँधा कर घर गया।"
मछली ने समाचार सुने
"इस चित्र में रंग भरो।"
मछली ने समाचार सुने
"इस चित्र में रंग भरो।"
मछली ने समाचार सुने
"मीठी ईद क्या आई कि लखनऊ में एक मेला-सा लग गया था।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"बाज़ार में यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ आते-जाते लोग नए-नए जोड़े पहने इतराते घूमते थे। दुकानों में मिठाइयों के ढेर मुँह में पानी भरते-इमरती, लड्डू, दिलबहार और चमचम, ज़ायकेदार गुनगुने बड़े कबाब, गर्मागर्म छुनछुन करती आलू की टिक्कियाँ...हर तरह का खाने का सामान, कपड़ा-लत्ता, चमचम करते चाँदी के ज़ेवरात-बाज़ार के चौक की दुकानें दुल्हन जैसी सजी थीं।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"तोहफ़ों से लदीं, मेहरुनिस्सा और कमरुनिस्सा अपने भाई अज़हर मियाँ के साथ हाथों में मीठी-निमकी की पत्तलें लिए चली जा रही थीं। ईद के मौके पर तीनों को बहुत उम्दा चिकनकारी किए नए कपड़े मिले थे जिन्हें पहन कर उनका मन बल्लियों उछल रहा था। मेहरु के कुरते पर गहरे गुलाबी रंग के फूल कढ़े थे और कमरु भी फूल-पत्तीदार कढ़ाई वाला कुरता पहने थी। अज़हर मियाँ भी अपनी बारीक कढ़ी नई टोपी पहने काफ़ी खुश दिखाई देते थे।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"एकाएक अज़हर मियाँ रुक गए, “घर पर बैठी हमारी एक और बहन भी तो है जिसने आज नए कपड़े नहीं पहने हैं। हम में से किसी ने भी उसके बारे में सोचा तक नहीं।”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"बच्चे गोमती के किनारे वाले मेले पहुँच चुके थे। क्या मज़े-मज़े की चीज़े थीं वहाँ! रंगबिरंगी काँच की चूड़ियाँ, रिबन, हार, मिट्टी के बने पशु-पक्षी, सिपाही और गुड़िया-सब के लिए कुछ न कुछ! मेले की चकाचौंध में बच्चे अपनी बहन के बारे में सब भूल-भुला गए।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"मुमताज़ आबिदा ख़ाला, जो कि बच्चों की मौसी थीं, के घर अकेली ही बैठी थी। पास ही कोने में उसकी बैसाखियाँ रखी थीं। उसके हाथ तो"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"कढ़ाई कर रहे थे लेकिन उसका मन दूर अपने घर हरदोई में था जहाँ उसकी अम्मी और दो बहनें रहती थीं। क्या उनको भी उसकी उतनी ही याद आती थी जितनी उनकी उसे?"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"मुमताज़ के अब्बू के गुज़र जाने के बाद घर में पैसे की किल्लत रहने लगी थी। एक दिन आबिदा ख़ाला उसकी अम्मी से कहने लगीं कि मुहल्ले की औरतों को इकट्ठा करके कढ़ाई का काम शुरू करें।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"तब से मुहल्ले की औरतें हर रोज़ एक समय किसी किसी के यहाँ बरामदे में चारपाई-चटाई पर बैठने लगीं और रेडियो पर गाने सुनते-सुनते कपड़े काढ़ने लगीं। मुमताज़ की ज़िम्मेदारी औरतों को चाय पिलाने की थी जबकि बड़ी-बूढ़ियाँ अपने-अपने पानदान से गिलौरियाँ निकाल कर चबाती रहतीं।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"मुमताज़ काम करती तो लक्का और लोटन दाना चुग कर बादलों में गुम हो जाते लेकिन कुछ ही देर बाद थोड़ा और दाना चुगने लौट आते।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"लखनऊ आकर मुमताज़ को एक और दोस्त मिला-पड़ोस के सब्ज़ी वाले का आठ साल का बेटा, मुन्नु! मुन्नु हर रोज़ अपने पिता के साथ सब्ज़ी-भाजी लिए जगह-जगह फेरी लगाता और अपने ख़ास अंदाज़ में गुहार लगाता, “सब्ज़ी ले लो...ओ...ओ।” हाल ही में उसकी दोस्ती मुमताज़ के साथ हुई थी। हर रोज़ मुमताज़ अपना नाश्ता उसके साथ बाँटती और खाते-खाते दोनों बच्चे लक्का और लोटन के खेल देखा करते।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“चिकनकारी तो हम पिछली तीन पुश्तों से करते आ रहे हैं। मैंने अपनी अम्मी से और अम्मी ने नानी से यह हुनर सीखा,” मुमताज़ बोली, “मेरी नानी लखनऊ के फ़तेहगंज इलाके की थीं। लखनऊ कटाव के काम और चिकनकारी के लिए मशहूर था। वे मुझे नवाबों और बेग़मों के किस्से, बारादरी (बारह दरवाज़ों वाला महल) की कहानियाँ, ग़ज़ल और शायरी की महफ़िलों के बारे में कितनी ही बातें सुनाया करतीं। और नानी के हाथ की बिरयानी, कबाब और सेवैंयाँ इतनी लज़ीज़ होती थीं कि सोचते ही मुँह में पानी आता है! मैंने उन्हें हमेशा चिकन की स़फेद चादर ओढ़े हुए देखा, और जानते हो, वह चादर अब भी मेरे पास है।” नानी के बारे में बात करते-करते मुमताज़ की आँखों में अजीब-सी चमक आ गई, “मैंने अपनी माँ को भी सबुह-शाम कढ़ाई करते ही देखा है, दिन भर सुई-तागे से कपड़ों पर तरह-तरह की कशीदाकारी बनाते।”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“अरे वाह, तो तुम पाठशाला भी गई हो!” मुन्नु चहका। मुन्नु भी छुटपन से अपने पिता के काम में हाथ बँटाता आया था। इसलिए उसे कभी पाठशाला जाने का मौका नहीं मिला।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“हाँ, हमारी चिकनकारों की बिरादरी में लड़कियाँ पाठशाला कम ही जाती हैं। मेरी"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“अच्छा आपा, रात में सपने देखती हो?” मुन्नु ने अपने दोस्त को बहलाने के लिए एकदम बात बदली।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“देखती हूँ न! देखती हूँ कि मैं भी लोटन और लक्का की तरह नीले आसमान में उड़ रही हूँ और न जाने कहाँ-कहाँ जाती हूँ सपनों में,” मुमताज़ बोली, “शायद उड़ते-उड़ते किसी रोज़ कहीं नानी से मुलाकात ही हो जाए...।”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“ऐसा है तो जल्दी से जाओ और अपनी नानी की चादर ले आओ, मैं तुम्हें एक खेल दिखाता हूँ,” मुन्नु रुआब से बोला। उसने मुमताज़ को चाँद पाशा के बारे में बताया। चाँद पाशा एक बीमार, बूढ़ा जादूगर था जिससे मुन्नु की मुलाकात अपने पिता के साथ फेरी लगाते हुई थी। उसने मुन्नु को एक बहुत ही मज़ेदार जादू सिखाया था। मुन्नु चाहता था कि मुमताज़ वह जादू देखकर अपना दुःख भूल जाए।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"भागती जा रही है, तेज़, तेज़...और तेज़। लोटन ने अपनी चोंच में चादर का तीसरा कोना और लक्का ने चौथा कोना पकड़ा और वे सब उड़ने लगे, ज़मीन नीचे छूटती जा रही थी और आसमान नज़दीक आ रहा था।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"वे सब किसी दूर, अनजाने शहर में पहुँच गए थे। वहाँ पहाड़ नीले थे, और नीले-नीले आसमान में तरह-तरह के रंगों वाले पंछी उड़ रहे थे। नीचे वादी में फलों से लदे पेड़ और फूलों से महकते बग़ीचे थे। लोटन और लक्का मुमताज़ को लेकर एक फ़िरोज़ी रंग के तालाब के किनारे उतरे।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"किनारे पर लंबे-लंबे गर्म फिरन पहने, पीठ झुकाए कुछ आदमी अपने काम में मसरूफ़ थे। वे लोग बहुत ही महीन सुइयों से गर्म दुशालों पर कढ़ाई कर रहे थे-रंगबिरंगे फूल, पत्तियाँ और पंछी...हूबहू वादी के फूलों और पंछियों जैसे।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"खुरशीद ने मुमताज़ को वह दुशाला दिखाया जो वे काढ़ रहे थे, “देखो बेटी, मैंने कश्मीर के पंछी और फूल अपने शॉल में उतार लिए हैं। यह है गुलिस्तान, फूलों से भरा बग़ीचा और ये रहीं बुलबुल। यह जो देख रही हो, इसे हम चश्म-ए-बुलबुल कहते हैं यानि बुलबुल की आँख। जिस तरह बुलबुल अपने चारों ओर देख सकती है, वैसे ही यह टाँका हर तरफ़ से एक जैसा दिखाई देता है!” कह कर खुरशीद ने मुमताज़ को वह टाँका काढ़ना सिखाया।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"कुछ देर बाद लोटन और लक्का ज़मीन पर लौटे। मुमताज़ अपने नए दोस्तों को अलविदा कह कर लखनऊ की तरफ़ उड़ने लगी और चुटकी बजाते ही उसने देखा कि वह आबिदा ख़ाला के घर पर थी। वहाँ मुन्नु वैसे ही बैठा था जहाँ वह उसे छोड़ आई थी। मुमताज़ ने उसे अपनी कश्मीर-यात्रा के बारे में बताना शुरू ही किया था कि मुन्नु अपने पिता की आवाज़ सुनकर घर भागा।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"मुमताज़ अपनी कढ़ाई में जुट गई। उसके दिमाग में अपनी यात्रा के दौरान देखे कितने ही नए-नए नमूने घूम रहे थे। कुछ ही दिनों में मुमताज़ ने फूल-पत्तियों-पंछियों से भरा एक बड़ा ही खूबसूरत कुरता तैयार कर लिया। हर नमूने के बीचोंबीच चश्म-ए-बुलबुल कढ़ी थी।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“आखिर मुमताज़ ने यह सब कहाँ से सीखा? न वह कहीं बाहर आती-जाती है, न कोई नई चीज़ ही देखती है-तो फिर इतने सुंदर रंगों में ऐसी बढ़िया कढ़ाई वह कैसे बना लेती है,” मेहरु तुनक कर बोली।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"“उदास न हो, आपा,” मुन्नु बोला, “नानी की चादर कब काम आएगी! जाओ, उसे ले आओ और खूब ध्यान लगाकर सोचो। कौन जाने आज तुम किस जादुई नगरी में पहुँच जाओ!”"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"मुमताज़ के काम ने तो सभी का मन मोह लिया था। थोक के व्यापारी और चिकनदार-सबकी ज़ुबाँ पर हरदोई से आई एक छोटी-सी चिकनकारिन का ही नाम था! अपनी नुमाइशों में दिखाने के लिए कुछ आला, अमीर औरतें आबिदा खाला से मुमताज़ का काम माँगने आईं।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"मुमताज़ इतनी खुश थी कि पूछो मत! और वह चाहती थी कि उसकी इस खुशी में उसकी दोनों बहनें भी शरीक हों। उसने कमरु और मेहरु से कहा कि वे भी उसके साथ उस आयोजन में चलें। मुमताज़ की सच्ची खुशी देखकर और अपनी ईर्ष्या सोचकर दोनों को बहुत मलाल हुआ।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"ईनाम के जलसे में कमरु और मेहरु ने देखा कि सब मुमताज़ को कितनी इज़्जत दे रहे थे। कुछ-एक ने तो उन्हें भी ऐसी हुनर वाली लड़की की बहनें होने की बधाई दी।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"कमरु ने कोना पकड़ तो लिया लेकिन वह कुछ पशोपेश में भी थी। आखिर मुमताज़ कह क्या रही थी! उसे तो वहाँ नाचती मुनिया और गुटरगूँ करते, खेलते हुए लक्का-लोटन के इलावा और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"साँझी की प्राचीन कला आज भी भारत के उत्तर प्रदेश में स्थित मथुरा और वृंदावन में प्रचलित है। एक ज़माने में कलाकार पेड़ की पतली छाल का प्रयोग करते थे लेकिन अब तो तरह-तरह के कागज़ भी इस्तेमाल किये जाते हैं। नमूने बहुत विस्तृत होते हैं और अधिकतर धार्मिक दृश्य, फूल-पत्ते, वयन और रेखागणित संरचनाएँ दर्शाते हैं। इस जटिल कला का उपयोग मंदिरों में प्रतिमाएँ सजाने के लिए, कपड़े पर देवी-देवताओं के स्टैंसिल या बच्चों के लिए स्टैंसिल काटने के लिए किया जाता है। तस्वीर में रंग या चमक देने के लिए स्टैंसिल के नीचे रंगीन या धात्विक कागज़ का इस्तेमाल किया जाता है।"
मुमताज़ ने काढ़े अपने सपने
"आज सुबह रज़ा और उसके अब्बा, फ़तेहपुर सीकरी के महल जा रहे थे। बादशाह के गर्मी के मौसम के अंगरखे उन्हें दिखलाने थे। कपड़ों के मामले में राजा साहब काफ़ी नखरैले थे। रहमत खान ने बड़ी मेहनत से अंगरखे बनाये थे-देर रात तक कटाई और सिलाई करी थी। रज़ा ने भी उनका हाथ बँटाया था-सबसे बारीक सुईं और बेहतरीन रेशम के धागे से महीन टाँके लगाये थे।"
रज़ा और बादशाह
"बसन्त की खिली धूप में चारों ओर फूल हँस रहे थे।"
रज़ा और बादशाह
"”अच्छा! आओ मेरे साथ। महाराज अभी सोने के कमरे में हैं। शाही दरबार में जाने से पहले तुमसे मिलेंगे।“"
रज़ा और बादशाह
"”धनी सिंह। ख्वाबगाह में काम करते हैं।“"
रज़ा और बादशाह
"”शुक्रिया! मैं राजपूत हूँ और इस नमूने को मेरे देश में बाँधनी कहते हैं।“"
रज़ा और बादशाह
"कमरे में घुसते हुए रज़ा का दिल ज़ोर से धड़क रहा था। मेहराबदार दरवाज़ों से धूप अन्दर आ रही थी। नगीनों के रंगों वाला मोटा, रेशमी पर्शियन कालीन, उसकी रोशनी में रंग बिखेर रहा था। कमरे में एक ख़ूबसूरत नक्काशीदार पलंग और दो बड़ी सुन्दर कुर्सियाँ थीं। कम ऊँचे पलंग पर रेशमी ओर सुनहरी गद्दियाँ पड़ी थीं। पर्दे भी रेशमी थे!"
रज़ा और बादशाह
"रज़ा ने झुक कर सलाम किया और फिर अपने बादशाह की तरफ़ देखा। एक खिदमतगार हाथ में डिब्बा लिये खड़ा था और अकबर उसमें से गहने चुन रहे थे। कद में बहुत लम्बे नहीं थे पर उनके एक तलवारबाज़ के जैसे चौड़े कन्धे थे। बड़ी बड़ी, थोड़ी तिरछी आँखें, नीचे की ओर मुड़ी मूँछें और ओठों के ऊपर एक छोटा सा तिल था।"
रज़ा और बादशाह
"”सीख रहा हूँ, हुज़ूर,“रज़ा ने घबराया-सा जवाब दिया,”पर कपड़ा काटने में अभी भी गलती हो जाती हैं।“"
रज़ा और बादशाह
"रहमत ने पोटली खोली और अंगरखे पलंग पर सजा दिये। बेहतरीन मलमल से बने हुए थे और बड़ी बारीक कढ़ाई थी। सभी गर्मी के हल्के रंगों में थे, नींबुई, आसमानी, धानी, हल्का जामनी और झकाझक स़फेद। रज़ा जानता था कि बादशाह का पसंदीदा रंग स़फेद था।"
रज़ा और बादशाह
"रहमत ने अकबर को एक स़फेद अंगरखा पहनने में मदद करी। धनी सिंह एक बड़ा-सा आईना ले आये और राजा के सामने लेकर खड़े हो गये।"
रज़ा और बादशाह
"”कढ़ाई अच्छी है और...पहनने में भी आरामदेह है,“"
रज़ा और बादशाह
"रज़ा ने लपक कर धनी सिंह की पगड़ी थामी। उसके लपेटे सीधे करके अकबर की कमर पर बाँध दी। जब तक अकबर आड़े-टेढ़े होकर अपने आप को आईने में निहार रहे थे,"
रज़ा और बादशाह
"इतिहास के कुछ रोचक तथ्य 1. रज़ा, बादशाह अकबर के शासनकाल में अब से 400 साल पहले रहता था। अकबर मुग़ल राजवंश का सबसे महान राजा था। वह एक प्रसिद्ध योद्धा भी था। उसे नये नमूनों के कपड़े पहनने का बहुत शौक़ था। वह पतंगबाज़ी और आम खाने का भी शौकीन था। 2. बाबर, मुग़ल राजवंश का संस्थापक, काबुल का राजा था। उसने 1526 में भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी को पानीपत की लड़ाई में हरा दिया। अकबर, बाबर का पोता था। वह भी एक बड़ा कामयाब सेनापति था और अपने 49 साल के शासन काल में एक भी लड़ाई नहीं हारा।"
रज़ा और बादशाह
"3. दो मुग़ल बादशाहों ने नये शहर बनवाये। अकबर ने आगरा के पास, फ़तेहपुर सीकरी बनवाया और शाहजहाँ ने दिल्ली में, शाहजहाँनाबाद। फ़तेहपुर सीकरी, आज वीरान पड़ा है पर शाहजहाँनाबाद (आज पुरानी दिल्ली कहलाता है) में आज भी लोग रहते हैं और वहाँ ज़िन्दगी की चहल-पहल बरक़रार है।"
रज़ा और बादशाह
"6. मुग़लों के महलों में कई रसोईघर थे। हर रसोईघर से बादशाह के लिये खाना भेजा जाता। ज़ाहिर है कि जब बादशाह सलामत खाने बैठते तो वे तीस किस्म की लज़ीज़ चीज़ों में से अपनी पसन्द की चीज़ खाते। ओहो! मुँह में पानी भर आता है मुग़लई खाने का नाम आने पर- बिरयानी, पुलाओ, कलिया, कोर्मा-यह सब पकवान मुग़लई रसोईघरों से ही निकल कर आये हैं।"
रज़ा और बादशाह
"मैडम ने कहा था कि मुझे तुम्हारी मदद करनी है और तुम्हें यह दिखाना है कि स्कूल में कौन सी जगह कहाँ है, क्योंकि तुम स्कूल में नई आई हो। लेकिन उन्होंने मुझे इस बारे में और कुछ नहीं बताया था।"
थोड़ी सी मदद
"स्कूल से घर लौटते हुए अली, गौरव, सुमी और रानी, मुझसे बार-बार मेरी इस नई ज़िम्मेदारी के बारे में पूछते रहे। मैंने बात टालने की कोशिश की, लेकिन मुझे तो मालूम था कि मुझे क्या काम सौंपा गया है। मैंने उनसे कहा कि पता नहीं तुम लोग किस चीज़ के बारे में बात कर रहे हो। लेकिन यह बात सच नहीं थी। मुझे अच्छी तरह पता था कि वे किस के बारे में पूछ रहे हैं?"
थोड़ी सी मदद
"माँ कहती है कि लोगों को घूरना अच्छी बात नहीं है। लेकिन मैं तो देखता हूँ कि सभी तुम्हें घूरते हैं। वे मुझे भी घूरते हैं क्योंकि मुझे तुम्हारे साथ रहना होता है, तुम्हारा ध्यान रखने के लिए। तुम हमारे स्कूल में क्यों आइं? तुमने अपनी पढ़ाई उसी स्कूल में जारी क्यों नहीं रखी जहाँ तुम पहले पढ़ती थीं?"
थोड़ी सी मदद
"जानती हो कल क्या हुआ? गौरव, अली और सातवीं कक्षा के उनके दो और दोस्त स्कूल की छुट्टी के बाद मेरे पीछे पड़ गए। तुम समझ ही गई होगी कि वह क्या जानना चाहते होंगे! उन्होंने मेरा बस्ता छीन लिया और वापस नहीं दे रहे थे। बाद में उन्होंने उसे सड़क किनारे झाड़ियों में फेंक दिया। उसे लाने के लिए मुझे घिसटते हुए ढलान पर जाना पड़ा। मेरी कमीज़ फट गई और माँ ने मुझे डाँटा।"
थोड़ी सी मदद
"सच कहूँ तो ख़ुद मैं भी यह बात जानना चाहता हूँ और मेरे मन में भी वही सवाल हैं जो लोग तुम्हारे बारे में मुझसे पूछते हैं। हाँ, मैंने पहले दिन ही, जब तुम कक्षा में आई थीं, गौर किया था कि तुम एक ही हाथ से सारे काम करती हो और तुम्हारा बायाँ हाथ कभी हिलता भी नहीं। पहले-पहल मुझे समझ में नहीं आया कि इसकी वजह क्या है। फिर, जब मैं और नजदीक आया, तब देखा कि कुछ है जो ठीक सा नहीं है। वह अजीब लग रहा था, जैसे तुम्हारे हाथ पर प्लास्टिक की परत चढ़ी हो। मैं समझा कि यह किसी किस्म का खिलौना हाथ होगा। मुझे बात समझने में कुछ समय लगा। इसके अलावा, खाने की छुट्टी के दौरान जो हुआ वह मुझसे छुपा नहीं था।"
थोड़ी सी मदद
"आज मेरी बड़ी दीदी का फोन आया। वह दिल्ली में इँजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही हैं। मैंने उन्हें बताया कि हमारी कक्षा में एक लड़की है और उसका एक हाथ नकली है। दीदी ने बताया कि उसे 'प्रॉस्थेटिक हैंड’ कहते हैं।"
थोड़ी सी मदद
"सुनो, मैं तुम्हें एक सलाह देना चाहता हूँ। यह ठीक है कि तुम हमारे स्कूल में नई हो। लेकिन अगर तुम चाहती हो कि कोई तुम्हें घूर-घूर कर न देखे, और तुम्हारे बारे में बातें न करें, तो तुम्हें भी हर समय सबसे अलग-थलग खड़े रहना बंद करना होगा। तुम हमारे साथ खेलती क्यों नहीं? तुम झूला झूलने क्यों नहीं आतीं? झूला झूलना तो सब को अच्छा लगता है। तुम्हें स्कूल में दो हफ्ते हो चुके हैं, अब तो तुम खुद भी आ सकती हो। मैं हमेशा तो तुम्हारा ध्यान नहीं रख सकता न।"
थोड़ी सी मदद
"कभी-कभी, मेरी समझ में नहीं आता कि तुम्हें कैसे समझाऊँ। मैं"
थोड़ी सी मदद
"सुमी अपने जूते के फीते नहीं बाँध सकी। और खेलने के बाद भी उसे जूते के फीते बाँधने का ध्यान नहीं रहा, और वह उलझ कर गिर पड़ी। उसकी ठोड़ी में चोट लग गई। जब मैडम ने उसकी ठोड़ी की चोट देखी तो उस पर ऐंटीसेप्टिक क्रीम तो लगा दी, लेकिन उसे लापरवाही बरतने के लिए डाँट भी पड़ी। “जूतों के फीते बाँधे बिना पहाड़ों में दौड़ लगाई जाती है? घर जाते समय गिर पड़तीं या और कुछ हो जाता तो क्या होता?“"
थोड़ी सी मदद
"तुम जानती हो न कि सँयोग क्या होता है? यह ऐसी बात है कि जैसे तुम कुछ कहो और थोड़ी देर में वही बात कुछ अलग तरीके से सच हो जाए। पिछले पत्र में मैंने तुम्हें सुमी और जूतों के फीतों के बारे में बताया था। और उसके बाद, आज, मैंने तुम्हें जूतों के फीते बाँधते हुए देखा। वाह, यह अद्भुत था! मैं सोचता हूँ कि तुमने यह काम मुझसे ज़्यादा जल्दी किया जबकि मैं दोनों हाथों से काम करता हूँ। अगर तुम मेरी दोस्त न होतीं तो मैं तुम्हारे साथ जूते के फीते बाँधने की रेस लगाता। नहीं, नहीं, शायद मैं तुम्हें कहता कि मुझे भी एक हाथ से फीते बाँधना सिखाओ।"
थोड़ी सी मदद
"सुनो, हमारे साथ खेलने के बारे में मैने पहले जो कुछ भी कहा है उसके लिए मैं क्षमा माँगता हूँ। मुझे लगता है कि तुम सिर्फ़ शर्माती हो। और मैंने एक ही हाथ का इस्तेमाल करते हुए झूला झूलने की भी कोशिश की। और यह काम बहुत ही मुश्किल है, झूले को दोनों हाथों से पकड़ कर न रखा जाए तो शरीर का संतुलन नहीं बन पाता। लेकिन तुम जैसे जँगल जिम की उस्ताद हो। भले ही तुम बार पर लटक नहीं पातीं लेकिन तुम सचमुच बहुत तेज दौड़ती हो, अली से भी तेज, जिसे खेल दिवस पर पहला इनाम मिला था।"
थोड़ी सी मदद
"फ़िल्म सच में बहुत ही बढ़िया थी, है न? मैं इतना हँसा कि मेरा पेट दुखने लगा और मेरे आँसू निकल आए। जब भी स्कूल में फ़िल्म दिखाई जाती है मुझे बहुत अच्छा लगता है। क्योंकि उस दिन पढ़ाई की छुट्टी।"
थोड़ी सी मदद
"पिछली बार, हमारे स्कूल में तुम्हारे आने से पहले, हमें एक बाघ के बच्चे की फ़िल्म दिखाई गयी थी जो जँगल में भटक गया था। हम भी उसे लेकर चिंता में पड़ गए थे क्योंकि वह एक सच्ची कहानी थी। बाद में वह बाघ का बच्चा किसी को मिल जाता है और वह उसे उसके परिवार से मिला देता है। जानती हो ऐसी सच्ची कहानियों को डॉक्यूमेंट्री कहा जाता है। बाघ के बच्चे बड़े प्यारे होते हैं, हैं न?"
थोड़ी सी मदद
"पता है जब मैंने तुम्हें बस में देखा तो मैं बहुत हैरान हुआ था। मुझे इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि मेरे पिता और तुम्हारे पिता एक ही जगह काम करते हैं! लेकिन मैं बहुत खुश हूँ कि तुम दफ़्तर की पिकनिक में आईं, क्योंकि पिछले साल जब हम दफ़्तर की पिकनिक पर गए थे तब उसमें मेरी उम्र का कोई भी बच्चा नहीं था और बड़ों के बीच अकेले-अकेले मुझे ज़रा भी अच्छा नहीं लगा था। मैं बहुत ऊब गया था।"
थोड़ी सी मदद
"अच्छा भई, मैं बहुत थक गया हूँ और सोने जा रहा हूँ। कल स्कूल में मिलेंगे।"
थोड़ी सी मदद
"मुझे लगता है कि मुझे यह बात पहले ही तुम्हें बता देनी चाहिए थी- जब भी वार्षिकोत्सव आने वाला होता है, प्रिंसिपल साहब कुछ सनक से जाते हैं। वे तुम पर चिल्ला सकते हैं - वे किसी को भी फटकार सकते हैं। अगर ऐसा हो, तो बुरा न मानना। मेरी माँ कहती है कि वे बहुत ज़्यादा तनाव में आ जाते हैं, क्योंकि वार्षिकोत्सव कैसा रहा इससे पता चलता है कि उन्होंने काम कैसा किया है।"
थोड़ी सी मदद
"ओह! मुझे अभी अहसास हुआ है कि मैंने तुम्हें जो दो आखीरी पत्र लिखे हैं, उनमें मैंने तुम्हारे प्रॉस्थेटिक हाथ के बारे में बात ही नहीं की। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैं इसके बारे में बिल्कुल ही भूल गया था और मेरे पास तुम्हें बताने के लिए और भी बातें थीं। मज़ेदार बात यह है कि तुम्हारे हाथ को लेकर अब मेरे मन में कोई सवाल नहीं उठते। न जाने क्यों!"
थोड़ी सी मदद
"यह प्रश्नोत्तरी हल करके पता लगाएँ कि नए लोगों के बीच जगह बनाने की कोशिश कर रहे लोगों की मदद करने में आप कितने कारगर साबित हो सकते हैं!"
थोड़ी सी मदद
"1. आपकी अध्यापिका ने कक्षा में नए आए साथी को पूरा स्कूल दिखाने को कहा है। आप क्या सोचेंगे?"
थोड़ी सी मदद
"ब. नए बच्चे स्कूल में ख़ुद क्यों नहीं घूम लेते"
थोड़ी सी मदद
"3. आपके नए सहपाठी को पहले पढ़ाए गये पाठ समझने में दिक्कत हो रही है। आप क्या करेंगे?"
थोड़ी सी मदद
"अ. कक्षा की सबसे होशियार छात्रा से कहेंगे कि वह अपने नोट्स उसे पढ़ने के लिए दे दे। ब. अध्यापिका से कहेंगे कि उसकी मदद करना उनका काम है। स. उससे पूछेंगे कि क्या उसे आपकी मदद चाहिए। 4. आपकी कक्षा की नई छात्रा जरा शर्मीली है। वह किसी के साथ नहीं खेलती। आप क्या करेंगे? अ. उससे कुछ नहीं कहेंगे। जब उसकी झिझक मिट जाएगी तब खेलने लगेगी। ब. उसे बुला कर खेल में शामिल होने को कहेंगे। स. उस के पास जा बैठेंगे। शायद वह बातें करने लगे।"
थोड़ी सी मदद
"कल्लू और उसका दोस्त दामू, सपने में नदी में एक विशाल मछली पकड़ रहे थे और आप सच मानें, मछली"
कल्लू कहानीबाज़
"मुस्करा रही थी! अब ऐसे सपने में यह बेसुरी आवाज़! उफ़! कल्लू ने रज़ाई में से मुचड़ा मुँह बाहर निकाल के मिनमिनी आवाज़ में कहा, “शब्बो, अभी कैसे? मैं अभी तो सोया था!”"
कल्लू कहानीबाज़
"ठंड में कल्लू दाँत किटकिटाता हुआ उठा, “सूरज? कहाँ है सूरज?”"
कल्लू कहानीबाज़
"कल्लन ने जम्हाई मुँह में गटक ली “मुनिया भी?”"
कल्लू कहानीबाज़
"रज़ाई फेंक के कल्लू ने बिस्तर छोड़ा। स्कूल देर से नहीं पहुँच सकता था वह! किसी हालत में नहीं। परसों मास्टर जी ने ऐसा धमकाया था कि एक दिन भी वह फिर देर से आया तो सज़ा ऐसी होगी कि वह याद रखेगा।उन्होंने तो यह भी कह डाला कि अगली कक्षा में नहीं चढ़ायेंगे। और इसके ऊपर से घंटों तक उसे कोने में कान पकड़ के खड़ा रहना पड़ा था।"
कल्लू कहानीबाज़
"हर सुबह के जैसे आज भी कल्लू बिजली की सी फुर्ती से इधर-उधर भाग के तैयार होने लगा। पानी की बाल्टी से बर्फीले पानी के कुछ छींटे आँखों पर डाल के उसने खुद को जगाया।
नहाने का तो सवाल ही नहीं था। शुक्र है कि सर्दियों का मौसम था नहीं तो अम्मी कहाँ मानने वाली थीं। कमीज़, पतलून और स्वेटर आनन फानन में पहन के, चप्पलों में पैर घुसाये।"
कल्लू कहानीबाज़
"अपने छोटे भाई की ओर देख के हाँफते हुए बोला, “शब्बो, सच तू कितना भाग्यवान है। पूरे महीने स्कूल से छुट्टी!”
खिड़की के पास बैठा शब्बो अपने पलस्तर चढ़े पैर को देख के चिहुँका, “हाँ, बिल्कुल ठीक कहा भाईजान। पैर तोड़ने में बहुत ही मज़ा आता है। सारे दिन यहाँ बैठ के इतना बोर हो जाता हूँ सोचता हूँ अपने बाल नोच डालूँ जब आप दामू के साथ फ़ुटबॉल खेलते हो। ज़रूर, बहुत ही भाग्यवान हूँ मैं?”"
कल्लू कहानीबाज़
"जब तक शब्बो अपनी बात पूरी करता, कल्लू घर से निकल कर गली के मुहाने पर पहुँच चुका था। शब्बो ने खिड़की से झाँक के देखा कि दौड़ते कल्लन भाई कोहरे के गुबार में आँख से ओझल हो गये। एक बड़ी सी मुस्कराहट शब्बो के चेहरे पर फैल गई।"
कल्लू कहानीबाज़
"उसकी बहन मुनिया एक अल्मारी के पीछे से प्रकट हुई। उसके चेहरे पर भी चौड़ी मुस्कान खेल रही थी। दोनों इतनी ज़ोर से हँसे कि मुनिया को हिचकियाँ आ गईं।
निकलते हुए कल्लू ने रसोई से एक सूखी रोटी उठा ली थी। उसे चबाते हुए वह खुद से बात करते हुए चला जा रहा था।"कहानी कल्लन मियाँ। एक नई, मानने लायक कहानी नहीं तो फिर कोने में खड़े पाये जाओगे।”"
कल्लू कहानीबाज़
"जीवन एक रहस्य है- कल्लू को ऐसा ही लगता था। उसे स्कूल पसंद था, सच में पसंद था।"
कल्लू कहानीबाज़
"गणित के सवाल, विज्ञान,फुटबॉल खेलना और स्कूल के कार्यक्रमों में गाना - यह सब उसे पसंद था। पर फिर क्यों, क्यों वह कभी भी समय से स्कूल नहीं पहुँच पाता था? मास्टर जी भी यह समझ नहीं पाते थे। अब परसों की बात थी कि कल्लू की खिल्ली उड़ाते हुए बोले थे कि बेहतर होगा कि कल्लू रात को स्कूल के बरामदे में ही सो रहे और यह सुन के सब बच्चे कल्लू पर हँसे थे।"
कल्लू कहानीबाज़
"मुश्किल यह थी कि अब मामला गम्भीर होता जा रहा था। अब मास्टर जी ने अगर उसे कक्षा नौ में नहीं चढ़ाया तो कल्लू को लेने के देने पड़ जाने वाले थे क्योंकि अब्बू स्कूल छुड़ा के उसे खेतों में काम पर लगा देंगे। अब कौन पालक तोड़ेगा और गाजर और मटर बटोरेगा जब कि वह स्कूल जा सकता है।"
कल्लू कहानीबाज़
"कल्लू असल में बारहवीं कर के कमप्यूटर सीखना"
कल्लू कहानीबाज़
"पिछले महीने वे पास के शहर में कल्लू की कक्षा को कमप्यूटर की प्रदर्शनी में ले गये थे। क्या मशीनें थीं! वाह! वहाँ के दुकानदार ने उन्हें सही तरह से "माउस" का इस्तेमाल सिखाया था और इन्टरनेट पर जाने का तरीका भी। वह तो बिल्कुल जादू के जैसा था। अब कल्लू और दामू भी माउस की जादूगरी सीखना चाहते थे कि वे भी कमप्यूटर की स्क्रीन पर "ज़िप-ज़ैप" दौड़ सकें।"
कल्लू कहानीबाज़
"जब वे बस में लौट रहे थे तो दामू और उसने मिल के एक कमाल की योजना बनाई थी। नया राजमार्ग खजूरिया गाँव के बगल से निकलता था। दामू और कल्लन मिल के वहाँ एक ढाबा, एस टी डी फ़ोन बूथ, कमप्यूटर सेन्टर खोल सकते थे। दामू, जिसे सपने में भी खाने के ख़याल आते थे, ढाबा चला सकता था और कल्लू एस टी डी बूथ। बूथ से लोग घर को फ़ोन लगायेंगे और आस-पास के सभी गाँवों के लोग मण्डी में सब्ज़ी, गेहूँ और गन्ना भेजने से पहले इन्टरनेट पर आज के भाव देख सकते थे।"
कल्लू कहानीबाज़
"भागते कल्लू के पास जवाब देने की फुर्सत कहाँ थी? धरमपाल चाचा को मज़ाक सूझता रहता है, बड़बड़ाते कल्लू ने कदम ताल न तोड़ी। यहाँ कल्लू की जान पर बन आई थी और उन्हें अपने पकोड़ों से फुर्सत नहीं। और कल्लू की स्कूल की देरी में हँसने वाली कौन सी बात थी? वह तो हर हफ़्ते की कहानी थी!"
कल्लू कहानीबाज़
"हाँ, सबसे बुरा तो तब हुआ था जब वह परसों देर से पहुँचा था। 26 जनवरी के कार्यक्रम का रिहर्सल था और जब वह स्कूल के अहाते में पहुँचा तो राष्ट्रगान की “जय जय जय जय हे” वाली पंक्ति गाई जा रही थी। और कल्लू को वहाँ सामने होना चाहिये था। दामू, मुनिया, और सरू के साथ गाने की अगुआई करते हुए।"
कल्लू कहानीबाज़
"“नहीं मास्टर जी,” कल्लू की आँखों में आँसू छलक आये और ये सचमुच के आँसू थे। जब चाहो निकाल दो वाले मगरमच्छी आँसू नहीं। वह सच में शो में भाग लेना चाहता था। “मास्टर जी!” उसकी आवाज़ में घबराहट और बेचारगी दोनों थी
“मैं वादा करता हूँ मैं फिर कभी देर नहीं करुँगा। एक मौका...”"
कल्लू कहानीबाज़
"कल्लू ने नाक पोंछ के सिर हिलाया। तब तक वे दोनों कक्षा में पहुँच चुके थे और कल्लू अपनी जगह की तरफ़ बढ़ा। मास्टर जी तुरन्त बोले, “कहाँ जा रहे हो? कोने में खड़े हो जाओ। कान पकड़ो।”
उसके सहपाठी हँसने लगे और मास्टर जी ने आखिरी धमकी फेंकी, “शायद मैं तुम्हें अगली कक्षा में न चढ़ाऊँ। कल्लन-आठवीं फेल देर से आने से अंक कटने की वजह से।”
और आज वह फिर देर से जा रहा था।"
कल्लू कहानीबाज़
"“एक अच्छी कहानी... एक विश्वास करने लायक बहाना।” पहले कितने बहाने खोजे थे उसने। आज एक नया बहाना खोजना इतना मुश्किल क्यों लग रहा था? उसके दिमाग में वह छवि कौंध गयी जहाँ मास्टर जी भवें सिकोड़े उसकी तरफ़ अविश्वास से घूर रहे हैं और वह हकलाता-तुतलाता बहाना बना रहा है। इतना मग्न था कल्लन कि सीधे भैंसों के झुण्ड से जा टकराया।"
कल्लू कहानीबाज़
"हाय मेरी किस्मत, अपने पर कुढ़ता हुआ रंभाती भैसों से बच के निकला। यहाँ जान के लाले पड़े हैं और मैं पहुँचा भी तो कहाँ? बदरी और उसकी मोटी भैसों के पास घास चरने। हाँफता, मिट्टी में फिसलता वह किसी तरह से वहाँ से भागा। बदरी, भैसों का अजीबोग़रीब मालिक अपनी मन भर की पगड़ी पहने डंडा लहरा रहा था और मोटी मूछों के पीछे मुस्करा रहा था।"
कल्लू कहानीबाज़
"कल्लू भागता रहा। मन ही मन उसने सोचा, पूरा गाँव मेरे खिलाफ़ है, दिमाग का पेंच ढीला बदरी भी। मुझ गरीब का मज़ाक बनाने में उन्हें मज़ा आता है। फिर उसे झटके से याद आया कहानी-बहाने की समस्या तो अभी वैसी ही बनी हुई थी। विकराल और हल-विहीन। अम्मी बीमार थी और उसे नाश्ता बनाना था। नहीं। दो बार इस्तेमाल कर चुका था। इस बार नहीं चलेगा।"
कल्लू कहानीबाज़
"किसी ने उसका कलम चुरा लिया? कलम तो उसके बस्ते में था। उसकी चप्पल टूट गई और उसे मरम्मत कराने जाना पड़ा। नहीं रे। चप्पल तो उसकी बिल्कुल नई थी।"
कल्लू कहानीबाज़
"दामू के घर से गुज़रते उसने देखा उसका सबसे प्यारा दोस्त और उसकी बहन सरु, आँगन में चारपाई पर बैठे नाश्ता खा रहे थे। हा! उन्हें भी देर हो गई थी, कल्लू ने विजयी भाव से सोचा और अभी तो वे खा रहे थे इसलिये मेरे बाद ही पहुँचेंगे। शायद मास्टर जी उन पर गुस्सा दिखाने में मुझे भूल ही जायें?"
कल्लू कहानीबाज़
"“पराँठे, कल्लू भैया,” सरु ने पुकारा “गोभी के पराँठे।” “बिल्कुल समय नहीं है।” कल्लू ने भागते हुए, हाँफते हुए जवाब दिया, “स्कूल में मिलेंगे।""
कल्लू कहानीबाज़
"“ठीक है। स्कूल में मिलते हैं” दामू ने कंधे उचका दिये और खाना खाने लगा।"
कल्लू कहानीबाज़
"दामू और सरु के लिये कितना आसान है, कल्लू मन ही मन बुदबुदाया। स्कूल के बगल में रहते हैं। स्कूल की घंटी बजने पर भी घर छोड़ेंगे तो देर नहीं होगी। स्कूल के फाटक पर पहुँचते-पहुँचते कल्लू का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मुँह में पान की गिलौरी दबाते वहाँ कौन खड़ा था भला? मास्टर जी। हाय री किस्मत!"
कल्लू कहानीबाज़
"एक बार की बात है, जब हम शहर जा रहे थे, तब हमने देखा कि शहर और देहात में पॉलिथीन बहुत उपयोग किया जाता है। तब हमने सोचा कि क्यों न हम सब मिलकर कुछ करें।"
पॉलिथीन बंद करो
"तब हमने एक तरकीब अपनाई। हम दो दिन यहीं रुक कर लोगों से इसी बात पर चर्चा करने का सोच ही रहे थे कि तभी एक औरत पॉलिथीन में सब्ज़ी और फल के छिलके फेंकते हुए दिखी। हमने अपनी माँ से कहा कि वह उस औरत से बात करें जिस पर हमारी माँ ने सहमति दिखाते हुए कहा कि हम सब लोगों से बात करेंगे।"
पॉलिथीन बंद करो
"हम फिर उस औरत के घर गए और कहा कि पॉलिथीन के प्रयोग से हमारी जान भी जा सकती है क्योंकि जब हम उसे जलाते हैं तो उससे ज़हरीली गैस निकलती है जो टी बी और साँस लेने में तकलीफ़ जैसे अन्य रोग पैदा करती है।"
पॉलिथीन बंद करो
"यह सब मैंने अपने गाँव में सीखा था। आज मेरे गाँव में किसी को न टी बी है न ही साँस लेने में दिक्कत क्योंकि मेरा गाँव एक पॉलिथीन मुक्त गाँव है। हम सब अन्य गाँव में उन्हें भी पॉलिथीन मुक्त बनाने के लिए एक ही नारा लगाते हैं – "पॉलिथीन बंद करो जीवन की शुरुआत करो।""
पॉलिथीन बंद करो
"युवा ध्यान चंद को हॉकी से बहुत प्रेम था। लड़कपन में वे और उनके दोस्त ताड़ के पेड़ से टहनियों को काट कर उनका उपयोग हॉकी स्टिक के रूप में किया करते थे।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"बहुत कम लोगों को यह पता है कि वे सेना में भर्ती होने के पहले से ही सेना के लिए हॉकी खेलने लग गए थे। १४ साल की उम्र में वे अपने पिताजी के साथ सेना की दो टीमों के बीच मैच देखने गए थे। जब एक टीम हारने लगी जो ध्यान चंद ने अपने पिताजी से कहा कि अगर उनके पास हॉकी स्टिक होती तो वे उस टीम को जिता देते।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"वो अधिकारी उस बात से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ध्यान चंद को बच्चा पलटन में शामिल कर लिया।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"प्रचलित कहानियों के अनुसार ध्यान चंद सैनिक के अपने कार्य को पूरा करने के बाद हॉकी का अभ्यास किया करते थे। लेकिन तब तक रात हो जाया करती थी, और उस ज़माने में फ़्लड लार्इट्स नहीं थीं। इसलिए ध्यान चंद अभ्यास करने के लिए चाँद उगने का इंतज़ार किया करते थे। चाँदनी रातों में पेड़ दूधिया रोशनी में नहाए होते, जब कुत्ते हर जगह रो रहे होते, तब ये दुबला पतला नौजवान अपनी तेज़ गति से चलने वाली हॉकी स्टिक के साथ मैदान में दिखार्इ पड़ता जहाँ वो गेंद को गोल पोस्ट में डाल रहा होता।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"क्योंकि वे अपना खेल शुरु करने से पहले चाँद उगने का इंतजार किया करते थे, सेना में उनके साथी उन्हें चाँद कहा करते थे और यह नाम उनके साथ बरकरार रह गया। वो ध्यान चंद थे, जो चाँदनी रात में अपने हुनर को निखारते रहते थे।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"ध्यान चंद की मेहनत रंग लार्इ। लोग कहते हैं कि कर्इ बार वे रेल की पटरी पर अभ्यास किया करते थे और दौड़ते हुए कभी भी गेंद को पटरी से नीचे नहीं गिरने देते थे। शायद यही कारण था कि हॉकी के वास्तविक खेल में भी उन्होंने गेंद पर नियंत्रण के लिए बहुत नाम कमाया। आखिरकार उन्होंने इसे बड़ी मेहनत से रेल की पटरियों पर अभ्यास करके कमाया था।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"एक बार महान धावक मिल्खा सिंह ने ध्यान चंद से पूछा कि वे अपने खेल में इतने निपुण कैसे हैं। ध्यान चंद ने जवाब दिया कि वे एक खाली टायर को गोल से बाँध देते और पूरे दिन गेंद को उस टायर में से निकालते रहते। ध्यान चंद बहुत सारे गोल किया करते थे और आने वाले वर्षों में उन्होंने भारत के लिए बहुत से मैच और पदक जीते।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"लेकिन जो चीज़ उनकी ख़ास बात बनकर उभरी थी वो था हॉकी स्टिक चलाने का उनका असाधारण कौशल, हॉकी स्टिक के साथ गेंद को इस प्रकार नियंत्रित करने की क्षमता, मानो मैदान में और कोर्इ खिलाड़ी है ही नहीं। मानो जैसे वे दोबारा रात को अकेले अपने खेल के मैदान में अभ्यास कर रहे हों।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"लेकिन वे सिर्फ़ हॉकी स्टिक के अपने कौशल के सहारे की ध्यान चंद नहीं बने। हॉकी, जो कि एक टीम का खेल है, उसमें ध्यान चंद एक प्रभावी टीम साथी के रूप में उभरे। जब वे मैदान में दौड़ रहे होते, उनका मस्तिष्क एक शतरंज की बाज़ी के रूप में सोचता। जैसे अपको पता होता है कि आपकी कक्षा में आपके मित्र कौन कौन से स्थान पर बैठते हैं और आप बिना देखे यह बता सकते हैं कि “काव्या यहाँ बैठती है, रोमिल यहाँ बैठता है” ध्यान चंद के लिए हॉकी ठीक वैसा ही था। बिना देखे उनको पता होता था कि उनके टीम के साथी कहाँ खड़े हैं, और वे किसको गेंद पास कर सकते हैं।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"और इन सटीक पासों की वजह से वे जादूगर के रूप में जाने जाते थे। उनके अवकाश प्राप्ति के कर्इ सालों बाद उन्होंने अपने सुंदर खेल के बारे में इस प्रकार से समझाया, “रहस्य मेरे दोनों हाथों, दिमाग और नियमित प्रशिक्षण में है।”"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"ध्यान चंद के पिता समे वर दत्त सिंह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी करते थे और वे स्वयं भी हॉकी खेला करते थे।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"लोग कहा करते थे कि उनको छोटी उम्र से ही रबड़ी बहुत पसंद थी। उनकी माँ उनके लिए अक्सर रबड़ी बनाया करती थीं। क्या यही कारण था कि उनकी कलार्इयाँ लचकदार व जाँघें मज़बूत स्टील की स्प्रिंग जैसी थीं जो हॉकी खेलने में सहायता करती थीं?"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"सेना में अपनी सेवा के दौरान समे वर का हमेशा स्थानांतरण होता रहा, इसलिए समे वर दत्त कभी भी अपने बच्चों के लिए निर्बाध शिक्षा को सुनिश्चत नहीं कर सके। अंत में जब सरकार ने उन्हें झाँसी में अपना मकान बनाने के लिए कुछ ज़मीन दी, तभी उनके जीवन में कुछ ठहराव आया। लेकिन तब तक ध्यान छह साल तक पढ़ कर स्कूल छोड़ चुके थे।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"हालाँकि झाँसी में ध्यान स्कूल जाना बंद कर चुके थे, लेकिन उन्होंने अपने पिता"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"के खेल को पूरे जोश के साथ अपनाया। १६ साल की उम्र में जब वे सेना में भर्ती"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"१९२० के दशक के मध्य में वे एक उभरते हुए हॉकी खिलाड़ी थे। उस दौरान उन्होंने सेना की टीम के साथ न्यूज़ीलैंड का दौरा भी किया, और अपनी टीम को २१ में से १८ मैच जीतने में सहयोग किया। स्वाभाविक रूप से उन्हें १९२८ में भारतीय टीम में चुन लिया गया जो एम्सटर्डम ओलंपिक जाने वाली थी।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"टीम यूरोप रवाना होने से पहले अपने अभ्यास मैच में हार गर्इ - ध्यान ने टीम की ओर से दो गोल किये, लेकिन उनकी विरोधी बॉम्बे टीम ने तीन गोल कर दिये। इस हार ने टीम को जोश दिला दिया। उन्होंने इंग्लैंड व यूरोप में अभ्यास मैचों को इतने बड़े अंतर से जीता कि, मर्इ के महिने में जब टूर्नामेंट शुरु हुआ, बाकी टीमों के मन में ज़रूर भारत की इस तूफ़ानी टीम का डर बैठ गया होगा।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"एम्सटर्डम में भारत ने ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, डेनमार्क और स्विटज़रलेंड को हराया। २६ मर्इ को फ़ाइनल मैच में भारत ने नीदरलैंड को हराया। पूरे टूर्नामेंट के दौरान भारतीय टीम ने एक भी गोल नहीं खाया। भारत की ओर से किये गए २९ गोल में से ध्यान चंद ने १४ गोल किये।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"एक स्थानीय अखबार ने इसके बारे में कुछ इस प्रकार से लिखा, “यह हॉकी का खेल नहीं है, यह जादू है, ध्यान चंद वास्तव में हॉकी के जादूगर हैं।” जिसने भी ध्यान चंद की स्टिक से गेंद को चिपके हुए देखा है, उसको वास्तव में यह पता है कि इन शब्दों का क्या अर्थ है।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"भारत ने ओलंपिक में हॉकी का स्वर्ण पदक जीत लिया था।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"१९३२ के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में केवल ३ टीमों ने हॉकी"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"तब तक ध्यान चंद के छोटे भार्इ रूप भी टीम में आ चुके थे और दोनों भार्इयों ने मिल कर ३५ में से २५ गोल किये थे। एक अमेरिकी पत्रकार ने लिखा कि यह भारतीय टीम “पूर्व का एक तूफ़ान है।” और यह तूफ़ान अभी शुरु ही हो रहा था। १९३२ के अपने विजयी दौरे में भारतीय टीम ने ३७ मैचे खेले और इनमें ३३८ गोल किये। इनमें से १३३ ध्यान ने किये थे। १९३४ में ४८ मैचों में भारतीय टीम ने ५८४ गोल किये, जिसमें से ध्यान चंद ने २०१ गोल किये।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"इसके बाद आया बर्लिन ओलंपिक। उस समय जर्मनी, एडोल्फ़ हिटलर के नेतृत्व में नाज़ी शासन के अपने प्रारंभिक काल में था। हिटलर का यह मानना था कि जर्मन दुनिया के दूसरे लोगों की तुलना में जीवन के सभी क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ हैं।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"उनकी यह धारणा आने वाले वर्षों में मानवीय इतिहास के सबसे बर्बर रूप में लोगों के सामने प्रस्तुत हुर्इ। लेकिन १९३६ में, हिटलर ने बर्लिन ओलंपिक को अपने विकृत विचारों को दुनिया व देश को दिखाने के अवसर के रूप में देखा।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"लेकिन हिटलर की योजना को अधिक कामयाबी नहीं मिली, और इसका आंशिक कारण ध्यान चंद व भारतीय हॉकी टीम थी। पूर्व का तूफ़ान शांत नहीं हुआ था और उसने हंगरी, अमेरिका, जापान और फ़्रांस को हराते हुए फ़ाइनल में प्रवेश किया। जर्मनी भी फ़ाइनल में पहुँच चुका था, और हिटलर ने सोचा कि जर्मनी की टीम पूर्व से आए इन भूरे लोगों को अपना वास्तविक स्थान दिखा देगी। और फ़ाइनल में जर्मनी ने एक गोल कर दिया था, जो चारों टीमें मिलाकर भारत के ख़िलाफ़ अब तक नहीं कर पार्इ थीं।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"अपने इर्द गिर्द प्रसिद्धी का घेरा होने के बावजूद उनकी दृष्टि में उनका सर्वश्रेष्ठ मैच १९३३ का बैटन कप का फ़ाइनल मैच था, जो एक भारतीय टूर्नामेंट था। अपनी घरेलू टीम झाँसी हीरोज़ के लिए खेलते हुए उन्होंने अपने साथी खिलाड़ी र्इस्माइल को एक लंबा पास दिया, र्इस्माइल “जेसी ओवेन्स की गति से लगभग आधा मैदान भागे” और उन्होंने मैच का इकलौता गोल किया।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"ध्यान चंद के लिए टीम वर्क, यानि पूरे दल के साथ समन्वय, हमेशा महत्वपूर्ण रहा। और शायद उनका जेसी ओवेन्स - एक महान धावक जिन्होंने बर्लिन में मैडल जीता और सिद्ध किया कि हिटलर के विचार कितने विकृत थे - के बारे में उल्लेख करना यह प्रदर्शित करता है कि वे ओलंपिक को कितना महत्वपूर्ण समझते थे।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"ध्यान चंद १९५६ में सेना से मेजर के पद से रिटायर हुए। उस साल उन्हें पद्म भूषण के सम्मान से नवाज़ा गया। इसके बाद उनको पटियाला में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पोर्ट्स में चीफ़ हॉकी कोच के पद पर नियुक्त किया गया।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"उन्होंने कर्इ वर्षों तक वहाँ, और देश के कर्इ हिस्सों में विभिन्न कैंपों में प्रशिक्षण दिया। वे इस बात से बहुत खुश थे कि उनके बाद उनके पुत्र अशोक ने भी हॉकी खेलने की परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाया।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"अशोक भी अपने पिता की भाँति एक विश्व स्तरीय खिलाड़ी थे जिनको हॉकी के कुछ अद् भुत कौशल अपने पिता से विरासत में मिले थे। अशोक ने १९७५ के फ़ाइनल में वो गोल किया था जिसने भारत को विश्व विजेता बनाया था।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"दुर्भाग्य से तब तक भारत हॉकी की एक शक्ति से पतन की ओर अग्रसर था। वो विश् व कप शायद अंतिम महत्वपूर्ण टूर्नामेंट था जिसे भारत जीत पाया था। रिटायर्ड मेजर, जिसके पास इस खेल में विजय की इतनी गौरवशाली यादें थीं कभी इस बात को स्वीकार नहीं कर पाए कि जो खेल उनके दिल के इतने करीब था, उसमें उनकी टीम इतना संघर्ष कर रही थी। जब १९७६ के मांट्रियल ओलंपिक में भारतीय टीम छठे स्थान पर रही तब ध्यान चंद ने दर्द बयान करते हुए कहा, “कभी नहीं सोचा था कि ऐसा दिन भी देखना पड़ेगा।”"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"ध्यान चंद ने अपने अंतिम वर्ष अपने प्रिय स्थान झाँसी में बिताए। वहाँ रहने वाले लोग इस महान पुरूष को देखा करते थे, जो कभी बाज़ार जा रहे होते तो कभी अपने मित्रों से मिलने अथवा कभी घर के काम निपटाने के लिए सार्इकिल पर जाते हुए दिखार्इ दे जाते थे। उनका निधन ३ दिसम्बर १९७९ को नर्इ दिल्ली के एक अस्पताल में हुआ। उनका पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ झाँसी हीरोज़ ग्राउंड पर अंतिम संस्कार किया गया।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"आज हम उनके जन्मदिन, २९ अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाते हैं, और भारतीय खेल जगत के सर्वकालिक सर्वोच्च पुरस्कार, ध्यान चंद पुरस्कार को उनके नाम पर रखा गया है। यदि भारत खेल में पुन: कभी शक्तिकेंद्र के रूप में उभरता है तो हम कह सकते हैं कि इसके पीछे इस महान व्यक्ति की प्रेरणा है। एक जादूगर जो कभी हॉकी खेलता था, जिसने पूरी दुनिया को रोमांचित कर दिया।"
ध्यान सिंह 'चंद' : हॉकी के जादूगर
"पेड़ों पर चढ़कर कच्चे आम तोड़ना
मोरू को अच्छा लगता था। वह टहनियों
पर रेंगते हुए ऐसी कल्पना करता मानो किसी घने जंगल में चीता हो। उसे कीड़े पकड़ना भी पसंद था। चमकदार पन्नी सी चमचमाते सर वाली हरी-नीली घोड़ा मक्खी, पतला और चरचरा सा टिड्डा, पीली तितली जिसका रंग पीले गुलाल सा उसकी उंगलियों पर उतर आता था। मोरू को पतंग उड़ाना भी अच्छा लगता था। जितनी ऊँची उड़ सके उतना अच्छा। सबसे ऊँची छतों पर चढ़ कर वह अपनी पतंग बादलों से कहीं ऊपर तक उड़ाता जैसे वह एक चमकता हुआ पक्षी हो जो सूरज तक पहुँचने की कोशिश कर रहा हो।"
मोरू एक पहेली
"मोरू को अंक अच्छे लगते थे। 1 का अंक उसे दुबला और अकेला सा लगता था तो 100 मोटा और अमीर सा। 9 कितना इकहरा और आकर्षक लगता खास तौर पर वह जब 1 के बगल में खड़ा हो कर 19 बन जाता। अंक उसे कभी न ख़त्म होने वाली सीढ़ी जैसे लगते। मोरू कल्पना करता कि वह एक-एक कर के सीढ़ी चढ़ रहा है।"
मोरू एक पहेली
"जब वह थक जाता तो खुद को सीढ़ियों के जंगले पर फिसलते हुए देखता और सब अंक उसकी ओर हाथ हिला रहे होते। दोपहर के खाने में अक्सर सबके आधे पेट रह जाने पर ख़त्म हो जाने वाले चावल से नहीं, उन दोस्तों से नहीं जिन्हें खेल जमते ही घर जाना होता, अंक हमेशा मोरू के पास रहते। कभी न ख़त्म होने वाले अंक कि जब चाहे उनके साथ बाज़ीगरी करो, छाँटो, मिलाओ, बाँटो, एक पंक्ति में लगाओ, फेंको, एक साथ मिलाओ या अलग कर दो।"
मोरू एक पहेली
"मोरू को स्कूल जाना अच्छा लगता क्योंकि उसके कई दोस्त भी स्कूल जाते थे। सवेरे उठ कर बाहर जाना उसे अच्छा लगता था। स्कूल के अहाते के अन्दर खेल का मैदान उसे अच्छा लगता था। पर उसे कक्षा में जाना अच्छा नहीं लगता था।"
मोरू एक पहेली
"उसे शिक्षक अच्छे नहीं लगते थे। कक्षा में वह अपने को कैद महसूस करता था। वहाँ कई चीज़ें करने की मनाही थी। बच्चे सवाल नहीं पूछ सकते थे, वे इधर-उधर घूम नहीं सकते थे और बोल भी नहीं सकते थे। शिक्षक के तेवर चढ़े रहते थे।"
मोरू एक पहेली
"रोज़ सुबह शिक्षक बोर्ड पर कुछ लिख देते थे। उसके बाद ऊँची आवाज़ में सब बच्चों को अपनी स्लेटों पर उसे उतारने का आदेश देते। फिर वह बाहर चले जाते। अगर लड़के बोर्ड पर लिखी चीज़ों की नकल अच्छे से करते तो वह उन पर नज़र डाल लेते। अगर वह ऐसा नहीं कर पाते तो वह नाराज़ हो जाते। जब वह गुस्से में होते तो बच्चों को बुरा भला कहते। और जब गुस्सा और बढ़ जाता तो वह उन्हें मारते थे।"
मोरू एक पहेली
"उसकी स्लेट टूट गई थी और उसकी माँ के पास नई स्लेट खरीदने के पैसे नहीं थे। मोरू ने दीवार पर चढ़ने वाली सैकड़ों चींटियाँ गिनना शुरू किया। उसने बाहर पेड़ को देखा और उसे उसकी पत्तियाँ बिलकुल सही लगीं। सही पत्तियों की परछाईं भी सही होती है। मन ही मन मोरू ने स्कूल के अहाते की दीवार में टूटी ईंटों की संख्या गिनी। उसने हिसाब लगाया कि अगर हर ईंट की कीमत पाँच रुपये है तो सारे छेद भरने में एक हज़ार से ज़्यादा रुपये लगेंगे।"
मोरू एक पहेली
"“तुम्हारी स्लेट कहाँ है? स्कूल ले कर नहीं आये क्या?” शिक्षक चिल्लाये। मोरू को दिख रहा था कि वे गुस्से में थे।"
मोरू एक पहेली
"“मेरी पुरानी स्लेट टूट गई और मेरे पास नई खरीदने के पैसे नहीं हैं।” मोरू बोला। शिक्षक गुस्से में थे और उन्होंने अपनी छड़ी से मोरू को पीटा। मोरू धीरे से बोला, “अगर स्लेट होती तो भी मैं सवाल नहीं करता क्योंकि मैं करना नहीं चाहता।”"
मोरू एक पहेली
"कभी-कभी घंटों तक वह फल-सब्ज़ी के बाज़ार में गायब रहता। छत पर जा कर वह अपनी पतंग उड़ाने की कोशिश करता पर आसमान खाली होता तो इसमें ज़रा भी मज़ा नहीं आता।"
मोरू एक पहेली
"बरसात का मौसम आया और गरमी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला। सबने सोचा कि अब तक मोरू भूल-भाल गया होगा और सबके साथ वह स्कूल चला जायेगा। “नहीं!” उसने ज़ोर से कहा। ऐसे ही एक साल गुज़र गया। सबने मोरू से कोई भी आशा रखनी छोड़ दी। शायद मोरू ने भी ऐसा ही किया। वह और बहुत कुछ करने लगा। बाज़ार में जा कर वह सब्ज़ीवालों की नाक में दम किये रहता।"
मोरू एक पहेली
"कुछ दिनों बाद शिक्षक फिर वहाँ से जा रहे थे। वह एक बहुत बड़ा थैला उठाये हुए थे। थैला बहुत भारी था। शिक्षक काफ़ी मुश्किल में थे। मोरू ने सर खुजलाया। शिक्षक धीरे-धीरे वहाँ से निकले। मोरू ने कुछ सोचा और फिर शिक्षक के पीछे भागा। बिना कुछ बोले उसने थैले को एक तरफ़ से थामा। शिक्षक को कुछ राहत मिली और दोनों मिल कर उस भारी बोझ को स्कूल तक ले गये।"
मोरू एक पहेली
"“क्या तुम इन्हें बाहर निकालने में मेरी मदद करोगे?” शिक्षक ने पूछा। मोरू ने किताबें बाहर निकालना शुरू किया। कुछ कहानियों की किताबें थीं जिनके आवरण पर तस्वीरें बनी थीं। कुछ में बड़े अक्षर थे। कुछ में इतने शब्द थे कि मालूम होता था उन्हें पन्नों में दबा के बैठाया गया हो। मोरू रोमांचित हो उठा। उसने दो साल से किसी किताब को हाथ नहीं लगाया था।"
मोरू एक पहेली
"अगले दिन मोरू ने स्कूल छूटने का इन्तज़ार किया। जब सब बच्चे जा चुके थे और शिक्षक अकेले थे, मोरू चुपचाप अन्दर आया और दरवाज़े पर आ कर खड़ा हो गया। शोरोगुल और हँसी मज़ाक के बगैर स्कूल कुछ भुतहा सा लग रहा था। शिक्षक ने नज़र उठाई और बोले, “अच्छा हुआ जो तुम आ गये। मुझे तुम्हारी मदद चाहिये।” मोरू को अचरज हुआ। शिक्षक क्या मदद चाहते होंगे? उनके पास तो मदद के लिये स्कूल में बहुत से बच्चे थे। वे धीरे से बोले, “क्या तुम किताबों को छाँटने में मेरी मदद कर सकते हो?”"
मोरू एक पहेली
"फिर आई अंकों वाली किताबें। मोरू की आँखें और उंगलियों की तेज़ी कुछ ढीली पड़ी। मोटे अंक पतले अंकों के साथ नाच रहे थे। दो अंक एक के ऊपर एक ऐसे बैठ गये जैसे कोई ढुलमुल इमारत हो जो अपनी नींव भरने का इन्तज़ार कर रही हो। गुणा के सवालों में जैसे संख्या बढ़ती जाती थी, वो कुछ नाटे और नीचे की तरफ़ चौड़ाते लग रहे थे। भाग इसका ठीक उलटा था। शुरूआत में बड़ी संख्या और अगर ध्यान से करते जाओ तो अन्त में लम्बी पतली आकर्षक पूँछ बन जाती थी। अगर भाग्यशाली हो तो अन्त में कुछ नहीं बचेगा। एक-एक कर के सारे अंक और उनके करतब मोरू के पास लौट आये।"
मोरू एक पहेली
"अँधेरा हो चला था और स्कूल में बिजली नहीं थी। “अब तुम्हें घर जाना चाहिये मोरू, पर कल फिर आ सकते हो?” शिक्षक ने पूछा, “पर क्या उस समय आओगे जब बच्चे यहाँ हों?” अगले दिन स्कूल शुरू होने के कुछ देर बाद मोरू आया। बच्चे उसे देख कर हैरान थे और कुछ डरे भी। अब तक मोरू का मौहल्ले के अकड़ू दादाओं में शुमार होने लगा था। “अब मेरी मदद करने वाला कोई है,” शिक्षक ने कहा।"
मोरू एक पहेली
"उन्होंने मोरू को छोटे बच्चों के साथ लगाया। कुछ किताबें थीं जिनमें बच्चों को लिखना था। वे बोले, “इन अंकों को आरोही और अवरोही क्रम में लगाने के लिये इन बच्चों की मदद करो।” छोटे बच्चे मोरू के आसपास जमघट लगाने लगे। उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि मोरू जैसे अक्खड़ को इतना कुछ आता था।"
मोरू एक पहेली
"मोरू ने उन्हें कतार में खड़ा करवाया - सबसे छोटे बच्चे एक छोर पर और लम्बे वाले दूसरे छोर पर। उसने उन्हें हाथों में अंक पकड़ाए। अब सब आसान हो गया। जैसे छोटे और लम्बे बच्चों के साथ हुआ कि किसे कहाँ खड़ा होना था वैसे ही अंकों के साथ करना था।"
मोरू एक पहेली
"रोज़ मोरू कुछ देर के लिये आता और शिक्षक उसे कुछ काम और फिर उससे बड़ा काम दे देते। रोज़ मोरू को लगने लगा कि उसका अंकों से लगाव बढ़ता ही जा रहा है और उसकी योग्यता और रोमांच छोटे बच्चों में भी समाते जा रहे हैं।"
मोरू एक पहेली
"एक महीने बाद मोरू की माँ सुबह के दस-ग्यारह बजे उसे ढूँढ रही थीं। वह कहीं भी नहीं मिल रहा था। उन्होंने छत पर देखा पर उसकी पतंगें मायूस सी पानी की टंकी के पास पड़ी थीं। उन्होंने दीवार पर झाँका जहाँ वह रोज़ टाँगें झुलाए बैठा रहता था पर दीवार खाली थी। उन्होंने आम के पेड़ पर देखा जहाँ पत्तियाँ हवा में सरसरा रही थीं लेकिन किसी भी टहनी पर मोरू नहीं था।"
मोरू एक पहेली
"वह बाज़ार तक गईं पर सभी सब्ज़ीवाले आराम से अपनी सब्ज़ियाँ बेच रहे थे। आज उन्हें सताने वाला लड़कों का गुट कहीं नहीं था। अन्त में वह गली पार कर रही थीं तो उनकी नज़र अनायास ही स्कूल की खिड़की पर टिक गई।"
मोरू एक पहेली
"वहाँ मोरू नज़र आ रहा था। वह सर झुकाये ध्यान से अपनी कॉपी में कुछ देख रहा था। उसके माथे पर सोच की रेखाएँ दिख रही थीं और उसकी आँखों में गहरी तल्लीनता थी। वह अपनी उम्र के बाकी लड़कों के साथ गणित के मुश्किल सवाल हल करने में लगा हुआ था। शिक्षक की नज़र भी बाहर गई और वह मोरू की माँ की तरफ़ देख कर हल्के से मुस्कराये।"
मोरू एक पहेली
"मोरू फिर से स्कूल में था। इस बार वह बहुत कुछ सीख रहा था। और उससे भी बड़ी बात यह थी कि उसे पढ़ना-लिखना अच्छा लग रहा था।"
मोरू एक पहेली
"तो, तुम इस सोच में डूबे रहते हो?"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"मुझे लगता है कि आकाश में एक बड़ा दानव, शायद कुंभकर्ण, सोया हुआ है,"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"और बारिश उसकी नींद में बाधा डालती है।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"पर मैंने तो अपनी किताबों में कुछ और ही पढ़ा है...।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"आकाश में मोटर साइकिल चालकों का एक गुट है।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"बारिश में मोटर साइकिल की दौड़ लगाते हैं।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"यह तो बारिश में होड़ लगाने वाले"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"आसमान में रहने वाली"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"घर में रहकर बेचैन हो जाते हैं,"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"आसमान में ज़ोरों से लुढ़कता है,"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"पर मेरी किताबों में तो कुछ और ही लिखा है।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"मेरी किताबों में लिखा है कि"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"बिजली ही बादलों में गड़गड़ाहट पैदा करती है?"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"उन किताबों में लिखा है कि"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"हमारे घरों में रोशनी करती है,"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"पर दादी, तुम तो बिजली के बारे में बता रही हो,"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"मुझे तो बादलों की गड़गड़ाहट के बारे में समझना है।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"मेरी पुस्तक में यह भी लिखा है कि"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"प्रकृति में हर वस्तु छोटे-छोटे परमाणुओं से बनी है। हर एक परमाणु के बीच में एक नाभिक होता है, जिसमें दो प्रकार के कण होते हैं-प्रोटोन एवम् न्यूट्रॉन। नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन घूमते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हमारी धरती सूर्य के चक्कर काटती है।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"प्रोटोन और इलेक्ट्रॉन में आवेश होता है-प्रोटोन में घनात्मक और इलेक्ट्रॉन में ॠणात्मक। अब क्योंकि हर परमाणु में प्रोटोनों की संख्या और इलेक्ट्रॉनों की संख्या बराबर होती है, परमाणु अनाविष्ट होता है।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"परन्तु जब दो परमाणु आपस में टकराते हैं तो कभी-कभी इलेक्ट्रॉनों का आदान-प्रदान हो जाता है। अब जिस परमाणु से इलेक्ट्रॉन निकल गए उसमें प्रोटोनों की मात्रा इलेक्ट्रॉनों से अधिक हो जाती है। अतः उस परमाणु में धन आवेश हो जाता है। इसी तरह, जिस परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटोनों से अधिक हो जाती है, उसमें ॠण आवेश हो जाता है। इन आवेश वाले परमाणुओं को आयन कहते हैं।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"अब गरजते बादलों में, वायु ब़र्फ के टुकड़े और पानी की बूँदों को ऊपर की ओर ले जाती है। यह जब आपस में टकराते हैं तो इनके परमाणु आयन बन जाते हैं। अब धन आवेश वाले आयन हल्के होने की वजह से ऊपर उठते हैं और ॠण आवेश वाले आयन धरती की ओर, बादल के निचले हिस्से की ओर जाते हैं।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"प्रकृति का यह नियम है कि विपरीत आवेश एक दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। बादल के निचले हिस्से वाले ॠण आयन धरती की सतह के धन आयनों को आकर्षित करते हैं। यह आयन एक दूसरे की ओर आते हैं ओर इसी से बिजली पैदा होती है-वही डरावनी बिजली, जो वर्षा के मौसम में अम्बर पर चमकती है।"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"गुब्बारे पर ऊन रगड़ने से, दोनों के बीच में इलेक्ट्रॉनों का आदान-प्रदान हो जाता है। गुब्बारे
में इलेक्ट्रॉनों की मात्रा अधिक होने से उसमें
ॠण आवेश हो जाता है। अब जब तुम इस
गुब्बारे को दीवार पर लगाते हो, तो गुब्बारे के"
दीदी, दीदी, बादल क्यों गरजते हैं?
"राजा नल्लन अच्छे राजा थे। मगर हाल में, दिन के समय जागे रहना उनके लिए बड़ा मुश्किल हो रहा था। दिन भर राजदरबार में जम्हाईयाँ लेते रहते थे। इसीलिए लोगों ने उन्हें कोट्टवी राजा बुलाना शुरू किया, क्योंकि तमिल भाषा में जम्हाई को कोट्टवी कहते हैं।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"अगले दिन सभा में, कोट्टवी राजा ने पूछा, “मुख्य मंत्रीजी, आप क्या करते हैं जब आपको रात में नींद नहीं आती?”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"“मेरी माँ कहा करती थीं देवी भरे पेट को इंकार नहीं कर सकती। सो मैं अपने रसोइए से कहता हूँ कि मुझे शानदार भोजन बनाकर दे, गरम, मीठे पकवानों से भरा। बस, खाने के दो मिनट के अंदर, मैं पूरी नींद में होता हूँ।”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"राज संगीतकार को यह खाने की कहानियाँ बिलकुल नहीं भा रही थीं। भरा पेट हो, तो वो गा ही नहीं सकते! मगर वो भी कुछ मदद करना चाहते थे। सो उन्होंने कहा, “हमारे वंश में, महाराज, हम निद्रा देवी का स्वागत हमेशा संगीत से ही करते हैं। नीलाम्बरी राग में गाई हुई कोई सुन्दर रचना, वीणा की संगत में... आ हा, परमानन्द!”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"राजकवि ने कहा, “महल के बगीचे में एक हल्की सी सैर, मंद मंद हवा के बीच, पारिजात पर चांदनी बिखरती हुई.... आह! उस क्षण की मधुरता और सुंदरता आपकी सारी थकान को मिटा देगी महाराज। निद्रा देवी को शांत मन से बड़़ा लगाव है।”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"घी के साथ गरम चावल, गरमा गरम साम्बर, तले हुए आलू, जिमीकंद और खसखस की खीर। और इस सब को ढंग से पचाने के लिए, ठंडी छाछ। इस आशा में कि वो रात को अच्छी नींद सो पाएंगे, राजा ने हर चीज़ को दो - दो बार खाया।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"“फटाफट मुझे एक गिलास गरम दूध में शहद मिलकर लाके दो!"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"कोट्टवी राजा ने एक ही सांस में उसे पी लिया। ओह! पेट कितना भर गया! उठना नामुमकिन, हिलना नामुमकिन और लेट कर सो जाना तो बिलकुल ही नामुमकिन।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"राज संगीतकारों को बुलावा भेजा गया। वो भागे भागे आए, पगड़़ियाँ टेढ़़ी-मेढ़़ी बंधी हुईं, जल्दी में पहनी हुई धोतियाँ खुली-बंधी सी। रात आधी गुज़र चुकी थी।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"रात की शान्ति में उस मधुर धुन को सुनने में क्या आनंद आ रहा था। कोट्टवी राजा को चैन मिला। आहा परमानंद!"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"वो चांदनी में चलते रहे, और पंछियों की धीमी चहक में राज महल के बड़े से बगीचे की परिक्रमा करते रहे। राजा को बड़ी शांति की अनुभूति हुई और उन्होंने सोचा, “आहा! यही समय है लौट कर सोने का।”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"रानी ने मामले को अपने हाथों में लिया। उन्होंने दूध का एक छोटा गिलास मंगवाया, और मालिश वाले से राजा के पाँव भी दबवाए। कुछ ही देर में निद्रा देवी ने आकर आशीर्वाद दिया। आख़िरकार राजमहल में उस रात को शांति छा गई।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"और फिर, अंत में, वो रात के भोजन के बाद ही सो गए। प्रायः हर सुबह वो चुस्ती से जागते! उनकी चाल में उचक आ गई और वो सभी की ओर देखकर मुस्कुराने लगे।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"मगर इधर रसोईए, संगीतकार, विदूषक, मालिश वाले और रानी का क्या हाल हुआ? वो रात भर सेवा में तत्पर रहे, उन्हें कभी यह नहीं पता होता था कि कब राजा जाग जाएँ और उन्हें बुला बैठें। और अब ये सब लोग दिन भर थके और चिड़़चिड़़े रहने लगे। वही हाल उनका भी था जो उनका इंतज़ार करते थे- रसोइए की बीवी, संगीतकार का बेटा, विदूषक का भाई, मालिश वाले के पिताजी, रानी की परिचारिका, परिचारिका का पति, पति का भाई, भाई का दोस्त, दोस्त के माँ - बाप... सारा शहर।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"राजा अपनी निद्राहीन प्रजा के लिए बहुत ही चिंतित हो उठे। अपने इस विस्तृत कार्यक्रम की सलाह तो हर किसी को वो दे नहीं सकते थे। उन्होंने अपने राजपुरोहित से सुझाव माँगा। उस बुद्दिमान इंसान को पता था कि यह एक जटिल समस्या है। “सभी से कहिए आज से पंद्रह दिन बाद नगर सभा में एकत्रित हों। सभी लोग गरम पानी से नहा कर, भोजन करके, सूर्यास्त पर हाज़िर हों। मैं सभी को आशीर्वाद देने के लिए निद्रा देवी को वहाँ बुलाऊँगा।”"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"एक संगीतकार ने धुन के बीच में ही जम्हाई ली और उसकी देखा देखी आस पास के बीस और जनों ने भी। फिर उनके पड़ोसियों ने जम्हाई ली और पूरी सभा में जम्हाइयों की लहर सी दौड़़ पड़़ी।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"निद्रा देवी इतनी सारी जम्हाइयों की पुकार को कैसे अनसुना कर देतीं? वो शहर में भागी भागी आईं, और सभी को नींद के एक ठंड़े झोंके से छू गईं।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"और उस दिन के बाद से, वो हर रात कोट्टवी राजा के देश में हर एक को अपना आशीर्वाद देती रहीं। सभी लोग चैन से रात में सोते रहे।"
कोट्टवी राजा और उनींदा देश
"जहां हमें लगाना था गहराई में गोता, वहां पहुँच फिर से जांचा - परखा सारा साज - सामान। पैरों में पहने बतख के पैरों जैसे 'फ़िन’, और चेहरे पर मुखौटे जैसा गोताखोरी वाला 'मास्क’ चढ़ाया।"
गहरे सागर के अंदर!
"* जिन जीवों के नाम ' बोल्ड ' अक्षरों में छपे हैं, उनके बारे में और ज़्यादा जानने के लिए किताब के आख़िरी पन्नों को देखें।"
गहरे सागर के अंदर!
"इस 'ट्रम्पेटफ़िश’ ने ख़ुद को दूसरों की नज़र से बचाने के लिए,... 'येलो टैंग’ के झुंड में अलग नज़र न आने के लिए, अपना रंग ही बदल डाला। फिर भी क्या तुमने इसे आसानी से नहीं ढूंढ निकाला?"
गहरे सागर के अंदर!
"' सी अनैमॉनी ’ की आड़ में ' क्लाउनफ़िश ’ को मिलती है छत जैसी छाया। बड़ी होशियारी से करती हैं उसकी रखवाली, लेकिन आख़िरकार पास से उसकी तस्वीर खींचने का मौका हाथ आया!"
गहरे सागर के अंदर!
"हमने इस 'हनीकोम्ब मोरे ईल’ को ' क्लीनर रास ’ से अपने दांत साफ़ करवाते हुए देखा। इन्हीं मछलियों के एक दूसरे जोड़े ने हमारी रगड़ाई - सफ़ाई करने में भी दिलचस्पी दिखाई!"
गहरे सागर के अंदर!
"इस खेल में ऑक्टोपस की जीत हुई। आठ पैरों वाले ये जीव जन्मजात बहरूपिये होते हैं। यूं पाइपफ़िश भी छुपने के लिए रूप बदलने में किसी से कम नहीं!क्या इस तस्वीर में दो घोस्ट पाइपफ़िश नज़र आ रही हैं?"
गहरे सागर के अंदर!
"समुद्र की तली में हमें व्हाइटटिप रीफ़ शार्क का जोड़ा भी आराम करते हुए मिला। ये मछलियां बड़ी ज़रूर होती हैं, लेकिन ख़तरनाक नहीं, इसलिए हम उन्हें ठीक से देखने के लिए उनके काफ़ी पास तक जा पहुंचे।"
गहरे सागर के अंदर!
"जब हम अपनी 'बोट’ पर लौटने के लिए ऊपर जाने लगे, तब उड़ान भरने के अंदाज़ में तैरती मैंटा रे ने दर्शन देकर हमें रोमांचित कर दिया। दो रिमोरा मछलियां इसके दोनों ओर साथ - साथ तैर रही थीं।"
गहरे सागर के अंदर!
"प्रवाल ऐसे जीव हैं जिन्हें वनस्पति और जंतु दोनों माना गया है। बहुत छोटे - छोटे हज़ारों काई जैसे हरे - नीले ऐल्गी यानी शैवाल इनके अंदर रहते हैं, और इन्हें पनपने में मदद करते हैं। प्रवाल का कंकाल शरीर के अंदर नहीं, बाहर होता है!... और इनके रंग - रूप होते हैं अनेक!"
गहरे सागर के अंदर!
"प्लैंक्टन अनेक समुद्री जीवों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत है। कई किस्म की काई जैसी वनस्पतियां, जीवाणु, दूसरे सूक्ष्म जीव और बड़े समुद्री जीवों के अंडे - लार्वे जो पानी की धाराओं में बहते रहते हैं, उन्हें ही प्लैंक्टन कहते हैं।"
गहरे सागर के अंदर!
"फ़ेदर स्टार भले ही देखने में पौधों जैसे हों, लेकिन यह वास्तव में एक किस्म के जंतु यानी जानवर ही होते हैं। यह अपनी पंख जैसी दिखने वाली बाजुओं से पानी में बहते प्लैंक्टन को पकड़ - पकड़ कर चट कर जाते हैं।"
गहरे सागर के अंदर!
"रीफ़ ऑक्टोपस दूसरों की नज़रों से बचने के लिए अपना रंग बदल लेते है! कभी चिकने और कभी खुरदुरे हो जाते हैं। यह रीफ़ यानी मूंगे कि दीवार में बनी गुफ़ाओं में रहते हैं, या फ़िर समुद्र की तली में, रेती में घुस जाते हैं!"
गहरे सागर के अंदर!
"मैंटा रे बड़ी विशाल मछलियां होती हैं, जिनके पंख पक्षियों के डैनों जैसे फैले हुए होते हैं। इनकी मदद से यह पानी के अंदर बिलकुल बाज़ और गिद्ध वाले अंदाज़ में धीरे - धीरे पंख चलाते हुए आगे बढ़ती हैं। कुछ मैंटा रे के डैने तो इतने बड़े होते हैं कि एक पंख के सिरे से दूसरी तरफ़ वाले पंख के सिरे तक की दूरी 23 फ़ीट तक हो सकती है!"
गहरे सागर के अंदर!
"ड्यूगॉन्ग समुद्र में पाये जाने वाले सील, वॉलरस और व्हेल जैसे स्तनधारी जीव होते हैं। इनका पसंदीदा भोजन है समुद्री घास। ख़ास बनावट वाले अपने थूथन - नुमा मुंह से समुद्री घास चरते रहते हैं। इन्हें समुद्री गाय भी कहा जाता है।"
गहरे सागर के अंदर!
"रास्ते में वह अमरूद एक कँटीली झाड़ी में गिर गया।"
गौरैया और अमरूद
"गौरैया पास में काम करने वाले किसान के पास गई। जिस लड़के ने अमरूद निकालने से इन्कार किया था, उसे पीटने के लिए कहा। किसान बोला, “नहीं होगा!”"
गौरैया और अमरूद
"वहीं घास चरती हुई गाय के पास जाकर गौरैया बोली, “मेरा अमरूद कँटीली झाड़ी में गिरा है। निकाल कर देने के लिए उस लड़के से कहा तो उसने मना कर दिया। उस लड़के को पीटने के लिए किसान से कहा तो उसने भी मना कर दिया। अब तुम उस किसान के खेत को चर लो।”"
गौरैया और अमरूद
"गौरैया चूहे के पास जाकर बोली, “मैं बाज़ार से एक अमरूद लाई। वह कँटीली झाड़ी में गिर गया। उस लड़के ने निकाल कर नहीं दिया। किसान, गाय, मछुआरे किसी ने मेरी बात नहीं मानी। तुम इस मछुआरे के जाल के टुकड़े कर दो।” चूहे ने कहा, “ना बाबा ना! जाल के टुकड़े नहीं करूँगा।”"
गौरैया और अमरूद
"लड़के ने कँटीली झाड़ी में से अमरूद निकाल कर गौरैया को दे दिया।"
गौरैया और अमरूद
"झटपट अमरूद खाने के इरादे से एक जगह जाकर बैठ गई। अमरूद पर एक चोंच ही मारी थी कि उसे सिर पर भारी चोट महसूस हुई। आँखों के आगे अँधेरा छा गया और वह गिर पड़ी। यह कैसे हुआ? जब उसने अमरूद खाना शुरू कि या था उसी समय एक कौआ एक लकड़ी के टुकड़े करे चोंच में दबाकर उड़ रहा था। वह लकड़ी का टुकड़ा उसकी चोंच से निकलकर गौरैया की खोपड़ी पर गिर पड़ा। बस, यहीं पर कहानी खतम!"
गौरैया और अमरूद
"जादव से साँपों को इस तरह धूप में झुलस कर मरते नहीं देखा जा रहा था। यह नज़ारा देख कर वह इतने दुःखी हुए कि वहीं बैठ कर रोने लगे।"
जादव का जँगल
"वह तेज़ी से अपने गाँव की ओर दौड़े और वहाँ पहुँच कर बाँस के अँखुए एक थैले में ठूँस-ठूँस कर भरने लगे।“दूसरे पेड़-पौधे गर्म रेत में नहीं पनप पाएँगे, लेकिन बाँस लग जाएगा। बाँस बहुत कुछ सह सकता है!”"
जादव का जँगल
"बाँस के अँखुए लेकर जादव उस बँजर रेतीली जगह पर पहुँचे और उन्हें जगह-जगह रोपने लगे। गर्म मौसम में यह बहुत कठिन काम था और उन्हें इसमें कई बरस लग गये।"
जादव का जँगल
"एक साल महानद सूखकर एक पतली सी धारा भर रह जाता तो दूसरे साल उसमें बाढ़ आ जाती। कभी उसके सैलाब में काफ़ी सारी रेत बह कर आ जाती, तो कभी उसकी धारा में तमाम रेत बह जाती। ज़ोरदार बारिश के दिन आए और चले गए। लेकिन जादव ने बाँस की रोपाई जारी रखी।"
जादव का जँगल
"समय आने पर बाँस के अँखुओं में से जड़ें फूटीं, और बाँस के झुरमुट पनपने लगे। बाँसों के बढ़ने के साथ रेत पर छाया रहने लगी, और इस छाया में कीड़े-मकोड़े पनपने लगे।"
जादव का जँगल
"कीड़े-मकोड़े ज़मीन के अंदर घुस कर अपनी सुरँगें बनाने लगे। बाँस के साये में ज़मीन का हुलिया बदलने लगा। भुरभुरी सफ़ेद रेत की जगह अब भूरी मिट्टी जमने लगी। बेजान रेत जड़ों में जान फूँकने वाली मिट्टी में बदल गयी।"
जादव का जँगल
"उन्होंने अपने बाँस के झुरमुट में नज़र दौड़ायी और सोचने लगे,"
जादव का जँगल
"गाँव कस्बों में बदल गये। ज़मीन तो ज़मीन, आसमान तक की रँगत में फ़र्क पड़ गया।"
जादव का जँगल
"सुबह नारँगी और दिन में नीला नज़र आने वाला आसमान कभी बैंगनी तो कभी गुलाबी नज़र आने लगा।"
जादव का जँगल
"कोई पास से तो कोई दूर से, तमाम सारे पक्षी मुलाई के लगाए पेड़ों में घोसले बनाने के लिए आ गए।"
जादव का जँगल
"सुरीली आवाज़ में गाने वाले पक्षी भी आए, और तीखे स्वर बिखेरने वाले भी पक्षी आए, और वार्बलर, थ्रश, दुम हिलाकर फुदकने वाले पक्षी आए और एक स्वर में रट लगाने वाले पक्षी भी आए जादव के बनाए मधुबन में।"
जादव का जँगल
"आख़िर में साँप आए।"
जादव का जँगल
"लहराते, बलखाते, सरसराते साँप जादव के पेड़ों की छाँव में ठँडक का मज़ा लेने के लिए।"
जादव का जँगल
"जिधर जाए नज़र, उधर हरियाली का रँग भरा। धूप में भी हरा, छाँव में भी हरा। हर तरफ़ हरा ही हरा!"
जादव का जँगल
"जादव की कई-पेड़ों-वाली-जगह अब जँगल में बदल चुकी थी! और जादव की ख़ुशी का ठिकाना न था!"
जादव का जँगल
"इसके बाद जादव के मन में एक और विचार आया -"
जादव का जँगल
"वह निकल पड़े दुनिया भर में पेड़ लगाने।"
जादव का जँगल
"लेकिन दुनिया में बिना-पेड़ों-वाली-जगह बहुत हैं।"
जादव का जँगल
"पुराने समय में जितने जँगल थे,"
जादव का जँगल
"समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, और हवाओं में ठंडक बढ़ती जा रही है।"
जादव का जँगल
"जादव ‘मुलाई’ पायेंग एक पर्यावरण सँरक्षणकर्ता हैं जिन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है, जो कि भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले सबसे बड़े नागरिक सम्मानों में से एक है। जादव असम के माजुली गाँव में रहते हैं।"
जादव का जँगल
"सोलह साल की उम्र में ब्रह्मपुत्र के रेतीले किनारे पर साँपों को गर्मी में तड़प-तड़प कर मरते देख जादव बेहद दुःखी हुए, और उन्होंने वहाँकुछ छायादार पेड़ लगाने का फ़ैसला किया। सबसे पहले उन्होंने आसानी से पनपने वाले बाँस लगाए। बड़ी मेहनत से एक-एक करके लगातार पेड़ लगाते-लगाते उन्होंने पूरा जँगल ही खड़ा कर दिया। यह 1979 की बात है।"
जादव का जँगल
"अगले तीन दशकों में जादव ने पेड़ लगा-लगा कर बंजर ज़मीन की सूरत और सीरत बदल डाली। नदी की धारा में साढ़े पाँच सौ हैक्टेयर का रेतीला टापू अब घने जँगल में बदल चुका है जिसमें किस्म-किस्म के पेड़-पौधे और जीव-जंतु पाए जाते हैं। इनमें हाथी, बाघ, कपि, हिरन और कई किस्म के स्थानीय और प्रवासी पक्षी शामिल हैं। जादव ने हर रोज़ ख़ुद जाकर अपने जँगल की देखरेख का सिलसिला जारी रखा है। आज भी उन्हें जहाँ कहीं थोड़ी सी ख़ाली जगह दिखाई देती है, वह वहाँ पेड़-पौधे लगा देते हैं।"
जादव का जँगल
"फिर दो जग पानी डाल कर सींचें। आपको कई हफ़्ते तक मिट्टी सूखने पर सिंचाई करनी पड़ेगी, और इंतज़ार करना पड़ेगा तब कहीं गुठली में से पौधा निकलेगा! पौधे को बड़ा होने में बहुत समय लगता है। इसलिए फिक्र न करें, और जल्दबाज़ी तो बिलकुल भी नहीं!"
जादव का जँगल
"आपकी बोई हुई गुठली में से अंकुर फूटने के बाद वह आम के स्वस्थ पौधे के रूप में पनप जाए, तो तैयार रहें उसकी सिंचाई, देखभाल और पहले से भी ज़्यादा इंतज़ार के लिए! ध्यान रखें कि कहीं आपके पोधे को कीड़े-मकोड़े या कोई जानवर न खा जाएँ या फिर कोई उसे अपने पैरों तले न रौंद जाएँ। अगर इंतज़ार करते-करते आप ऊबने लगें तो कुछ किताबें पढ़ डालें, कुछ गीत गुनगुना लें, और कुछ और पौधे लगा दें!"
जादव का जँगल
"कुछ साल में, जब आप पहले से लंबे हो जाएँगे, तब आपका आम का पेड़ भी आपके साथ बढ़ रहा होगा। बढ़ते-बढ़ते वह एक बड़े पेड़ में बदल जाएगा जिस पर आप चाहें तो चढ़ सकेंगे, या फिर उसके साये में पिकनिक कर सकेंगे। तब शुरू होगा असली मज़ा! तब आपका पेड़ आम देने लगेगा, जिन्हें आप और आपके दोस्त खा सकेंगे। इससे भी ज़्यादा बढ़िया बात यह होगी कि आम खाना पसंद करने वाले तमाम दूसरे जीव भी आपके पेड़ की ओर खिंचे चले आएंगे - पक्षी, चींटियाँ, गिलहरियाँ, चमगादड़, बन्दर और मकड़ियाँ।"
जादव का जँगल
"इनमें से कुछ फल खाने आएँगे, कुछ पेड़ का रस पीने आएँगे, कुछ इसके फूलों का रस पीने आएँगे और कुछ जीव इस पेड़ पर जमघट लगाये जीवों को चट करने के चक्कर में होंगे! सभी पेट भरने के चक्कर में रहेंगे, ऐसा भी नहीं है। कुछ ऐसे भी जीव होंगे जो आपके पेड़ की छाँव में आराम करने, उसकी डालों में कुछ देर चैन की नींद लेने आएँगे। आपका पेड़ अलग-अलग जीवों के लिए अलग काम का होगा!"
जादव का जँगल
"तब आप रोज़ाना कुछ समय यह देखने में बिता सकते हैं कि आपके आम के पेड़ पर कौन आता है, कब आता है, और क्या करता है। आप जो कुछ देखें उसे एक जगह लिख कर रखें। इसके अलावा, आप जो कुछ देखें उसके चित्र भी बना कर रखें।"
जादव का जँगल
"अब जरा सोचिए, जादव को पेड़ों से भरा अपना पूरा जँगल लगाने में कितना मज़ा आया होगा!"
जादव का जँगल
"कछुए और खरगोश की दौड़ तो याद है न? उस दौड़ के बाद जानवरों के पूरे राज्य में सभी कछुए और खरगोश के बारे में चर्चा करने लगे। जहाँ देखो, उन्हीं की बात होती थी।"
कछुआ और खरगोश
"दौड़ में कुछ आलस के कारण खरगोश हार गया। अपनी मंज़िल की ओर लगातार चलकर कछुआ विजयी हुआ, लेकिन जंगल की प्रजा में दोनों के लिए कोई भेदभाव नहीं था। दोनों की ही बहुत इज्ज़त होती।"
कछुआ और खरगोश
"कुछ दिनों बाद उस जंगल के राजा को पड़ोसी जंगल के राजा के साथ ज़रूरी काम पड़ा। उनकी बातचीत तुरंत होनी ज़रूरी थी। लेकिन राजा को फुर्सत नहीं मिल रही थी। और कामों में उलझे होने के कारण उसके लिये पड़ोसी राज्य जाना संभव नहीं था।"
कछुआ और खरगोश
""तुम दोनों में से किसी एक को पड़ोसी राज्य जाना पड़ेगा। मेरा संदेश उन्हें देकर उनका जवाब लेकर एक दिन के अन्दर वापस आना होगा।""
कछुआ और खरगोश
"पड़ोसी राज्य पहुँचने का रास्ता बहुत कठिन था। काँटों और पत्थरों से भरा था। बीच में दो नदियाँ भी पड़ती थीं। चाहे कछुआ हो या खरगोश रास्ता आसानी से तय होने वाला नहीं था। और एक ही दिन में तो वह रास्ता तय करना असंभव ही था।"
कछुआ और खरगोश
"तब खरगोश और कछुए ने एक साथ बैठकर बहुत सोचा। हम दोनों में से किसी एक से यह काम न होगा इसीलिए दोनों साथ मिलकर चलेंगे। जंगल के रास्ते पर खरगोश अपनी पीठ पर कछुए को बिठाकर दौड़ लगाएगा। नदी पार करते समय खरगोश कछुए की पीठ पर चढ़ जायेगा। यह तय करके दोनों को तसल्ली हुई।"
कछुआ और खरगोश
"रास्ते में नदी आई। तब कछुए ने खरगोश को अपनी पीठ पर बिठाकर नदी पार कराई। फिर से खरगोश ने कछुए को पीठ पर बिठाकर दौड़ लगाई। दूसरी नदी आते ही कछुए ने अपना काम किया।"
कछुआ और खरगोश
"इस चित्र में रंग भरो।"
कछुआ और खरगोश
"इस चित्र में रंग भरो।"
कछुआ और खरगोश
"मीमी एक छोटी सी लड़की थी जो एक भीड़-भाड़ वाले शहर में रहती थी।"
कहानियों का शहर
"स्कूल में टीचर ने कहा, "नहीं-नहीं, चलो पहले जोड़-घटाने के कुछ सवाल हल करो।""
कहानियों का शहर
"दीदी स्कूल के बरामदे में बैठ गईं। उन्होंने एक छोटे से शेर के बारे में कहानी शुरू की जो जंगल में"
कहानियों का शहर
"मीमी चुपचाप सुन रही थी। उसे सिर्फ़ दीदी की आवाज़ सुनाई दे रही थी। उसे लगा जंगल के विशाल पेड़ों की टहनियाँ हवा में हिल रही हैं। ऊँची-ऊँची घास सरसरा रही है। नन्हे शेर के बाल मुलायम थे।"
कहानियों का शहर
"थोड़ी ही देर में मीमी की पूरी कक्षा घेरा बनाकर खड़ी हो गई। वे भी मन लगाकर सुन रहे थे, और कहानियों की ज़िद कर रहे थे।"
कहानियों का शहर
"बड़े-बड़े शहरों और छोटे-छोटे गाँवों में रहने वाले बच्चों की कहानियाँ।"
कहानियों का शहर
"जो बच्चे स्कूल में नहीं थे वे भी आने लगे।"
कहानियों का शहर
"उन्होंने जाना कैसे कहानियाँ गढ़ें, कहानियाँ कैसे बुनें। कहानियों को मिलाकर कैसे नयी कहानियाँ बनायें और नीले आसमान में जैसे पतंग उड़ाते हैं, वैसे कल्पना की डोर पर कैसे कहानियाँ उड़ाएँ।"
कहानियों का शहर
"कुछ ही दिनों में पूरे शहर में कहानियाँ फैल गईं। माँ ने काम बन्द किया और पापा ने अखबार।"
कहानियों का शहर
"बस ड्राइवर अपनी सीट पर से कूदकर आ गया और सुनने लगा। बस के सारे यात्रियों के साथ बैठकर उन्हें अपनी कहानियाँ सुनाने की ऐसी जल्दी मची थी, कंडक्टर अपना बैग, टिकट और पैसा बस में भूल आया।"
कहानियों का शहर
"शहर में ट्रेन चली नहीं क्योंकि सारे ड्राइवर कहानियों में खोये हुये थे। अखबार भी नहीं छपे। मकान बनने बन्द हो गये।"
कहानियों का शहर
"होटल में खाना मिलना बंद हो गया, भेल वाले ने भेलपुरी नहीं बनाई। मछुआरे मछली पकड़ने नहीं गये। कोई कुछ करना ही नहीं चाहता था, बस कहानियाँ सुनाना और सुनना!"
कहानियों का शहर
"चौराहे पर जहाँ चारों ओर कार-स्कूटर की भीड़ लगी हुई थी, उनके बीच में पुलिस वाला बैठा कहानियाँ सुना रहा था! घरों में टेलीविजन चले ही नहीं। चारों तरफ़ बस कहानियाँ, सिर्फ़ कहानियाँ।"
कहानियों का शहर
"शहर के मेयर को चिंता होने लगी, "अब क्या किया जाये?" समुद्र के किनारे अपने घर में चहलकदमी करते हुए उन्होंने अपने मंत्रियों से बात की।"
कहानियों का शहर
""कोई कुछ कर ही नहीं रहा है। शहर में सारा काम बन्द पड़ा है।""
कहानियों का शहर
"तब अंत में दीदी और मीमी को खोज कर, समुद्र के किनारे, मेयर के निवास पर हाज़िर होने का हुक्म मिला। मंत्रियों को बताया गया था कि इन दोनों से शहर में कहानियों की बाढ़ आई है जिसमें सारा शहर गोते लगा रहा है।"
कहानियों का शहर
"ऊँचे खम्बों और ऊँची छत वाले उस विशाल कमरे में नन्ही मीमी और भी छोटी दिख रही थी। उसने दीदी का हाथ कसकर पकड़ लिया।"
कहानियों का शहर
"मेयर की रौबीली आवाज़ गूँजी,"कहानियों ने तो नाक में दम कर रखा है। हमारा इतना बड़ा शहर ठप्प हो गया है। आखिर हम करें क्या?" कमरे में सन्नाटा छा गया।"
कहानियों का शहर
"उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई दी, "ठीक है! एक शर्त है। आप ऐलान कर दीजिए कि इस शहर में हर सुबह और हर शाम को एक कहानी सुनाई जाएगी। इस तरह सबके पास कहानियाँ होंगी और वे अपना काम भी कर सकेंगे।""
कहानियों का शहर
"सबने जैसे चैन की साँस ली हो। तब से आज तक उस शहर में हर जगह एक कहानी सुबह और दूसरी रात को सुनाई जाती है!"
कहानियों का शहर
""लेकिन सब कहते हैं कि मैं बिल्कुल इम्मा के जैसी दिखती हूं। देखो, यहां तक कि हमारी ठुड्डी में गड्ढे भी एक जैसे हैं जिससे हमारी ठुड्डी दो हिस्सों में बंटी हुई सी नज़र आती है।""
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
""तुम थोड़ी-थोड़ी हम दोनों जैसी लगती हो, क्योंकि तुम हमारी प्यारी लांगलेन हो," इम्मा बोली और उसे बाहों में भींच कर गले से लगा लिया।"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
""हां, यह एक विशेषता है, लांगलेन। कोई भी गुण या लक्षण जो तुम में है, वह एक"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
""लेकिन! लांगलेन ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा, "न तो मेरी दादी और न ही नानी की ठुड्डी में गड्ढा है। आपको यह विशेषता कहां से मिली?""
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"मेरे नानाजी, जिन्हें हम बच्चे पूफ़ू कहते थे, उनकी ठुड्डी में गड्ढा था। उनके बच्चों में, जिनमें"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"में जाने को अनुवांशिकता कहते हैं। हमारी विशेषताएं एक समान हो सकती है, लेकिन हम में से हरेक अलग है। तुम्हारी तमाम विशेषताओं का मेलजोल तुम्हें विशिष्ट बनाता है!""
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
""मेरी ओर देखो लांगलेन," अप्पा बोले। "मैं बिल्कुल विशिष्ट हूं। मेरा क़द ख़ूब लंबा है, मेरे सिर, चेहरे और कानों पे बड़े-बड़े घुंघराले बाल हैं। और मैं दुनिया में सबसे चौड़े पैरों वाला व्यक्ति हूं। अगर तुम्हारे कानों पर बहुत बड़े-बड़े और घुंघराले बाल हों तो तुम क्या करोगी?""
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"इम्मा दोनों की ओर देख कर हंस पड़ीं। औरतों के कानों में बाल नहीं होते, लेकिन लगता है कि ऐसे बेवकूफ़ी भरे मज़ाक करने की विशेषता तुम्हें अपने पिताजी से मिली है!""
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"अप्पा कमरे से बाहर चले गए और लांगलेन अपनी इम्मा की गोद में समा गई।"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
""इम्मा, मेरा एक सवाल और है। *इबोक हमेशा कहती हैं कि हंसते समय आपके भी गालों में गड्ढे पड़ जाया करते थे। वह अब कहां गुम हो गए?""
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"हंसते हुए इम्मा बोली, "गालों में गड्ढे पड़ने वाली विशेषता मुझे अपनी मां से मिली थी। लेकिन, हरेक विशेषता के पीछे कई वजह होती हैं। और किसी वजह से कोई विशेषता सामने आती है, तो किसी दूसरी वजह से गायब भी हो सकती है!""
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"*इबोक: मणिपुरी भाषा में नानीमाँ"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
""मैं वह वजह हूं जिसके जादू से इस प्लेट में यह स्वादिष्ट चीज़ें आई हैं!" यह कहने के साथ ही उन्होंने प्लेट पर ढका नैपकिन हटा दिया। प्लेट में गर्मागर्म वड़े रखे हुए थे।"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
""और हम वह वजह हैं जो इन्हें गायब कर देंगे?" यह कहते हुए लांगलेन ने किसी के कहने-सुनने का इंतजार किए बिना एक वड़ा उठाकर अपने मुँह में भर लिया।"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"इम्मा: मणिपुरी भाषा में माँ"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"पुफ़ू: मणिपुरी भाषा में नानाजी"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"इबोक: मणिपुरी भाषा में नानीमाँ"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"गड्ढाः ठुड्डी के बीच का दबा हिस्सा जिससे ठुड्डी या ठोड़ी दो हिस्सों में बंटी हुई लगती है"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"अनुवांशिकता: माता-पिता से विशेषताओं का बच्चों में जाना"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"पीढ़ीः एक ही समय में जन्म लेने और रहने वाले लोग"
कहाँ गये गालों के गड्ढे?
"एक गाँव में एक लड़का और उसका परिवार रहता था। उसके परिवार में दादा, दादी, माँ और दीदी थे। भाई-बहन दोनों साथ-साथ स्कूल में पढ़ते थे।"
और दीदी स्कूल जाने लगी
"एक दिन स्कूल में उसकी टीचर बोली, "बेटा, तुम रोज़ स्कूल आते हो लेकिन तुम्हारी दीदी क्यों नहीं आती?" उस लड़के ने टीचर को बताया कि माँ बोलती है कि दीदी पढ़ कर क्या करेगी? यह सुनकर उसकी टीचर बोली, “बेटा, अपनी माँ से कहना कि वह कल आकर मुझसे बात करें।”"
और दीदी स्कूल जाने लगी
"टीचर की बात लड़के की माँ को समझ में आ गई और उन्होंने अपनी बेटी को रोज़ स्कूल भेजना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनको देखकर गाँव के सभी लोग अपने बच्चों को रोज़ स्कूल भेजने लगे और फिर उनका गाँव बदलने लगा।"
और दीदी स्कूल जाने लगी
"“अरे हाँ! वह तो हमारी कक्षा में आया था। यह देखने कि हमारी दीदी क्यों चिल्लाई थीं!”"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"“लेकिन मैं तुम्हारी कक्षा में गयी थी, वहाँ तो कोई भी नहीं था!” अम्मा बोलीं।"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"“हम सब तो शिक्षकों के कमरे में छुपे हुए थे,” मीरा ने कहा। “क्योंकि रोहन का साँप हमारी कक्षा में जो था!”"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"“पर मीरा जब मैं शिक्षकों के कमरे में गयी, मुझे तो वहाँ कोई नहीं दिखा!”"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"“जब मैं बड़ी दीदी के कमरे में गयी, वह तो खाली था!” अम्मा ने कहा।"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"“और मैं तुम्हारी राह देखती रही, स्कूल में बिलकुल अकेले!” अम्मा ने कहा।"
अम्मा जब स्कूल गयीं
"वह एक चिड़िया घर में काम करता था।"
कहाँ गया गोगो?
"अब की बार तोतो ने नदी में छलाँग लगा दी।"
कहाँ गया गोगो?
"तोतो को बात समझ में आई।"
कहाँ गया गोगो?
"तोतो की समझ में नहीं आया कि वह क्या कहे!"
कहाँ गया गोगो?
"क्या आप कभी चिड़िया घर में काम करना पसंद करेंगे?"
कहाँ गया गोगो?
"वहाँ कौन सा काम करने में सबसे ज़्यादा मज़ा आएगा?"
कहाँ गया गोगो?
"गोरिल्ला एक बार में कितने केले खाता होगा?"
कहाँ गया गोगो?